भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1894, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1894

तान् सर्वाननुपश्य त्वं समाश्रित्येति गालव ।। १२ ।। **नारदजीने कहा—**तात! आश्रम चार हैं और शास्त्रोंमें उनकी पृथक्-पृथक् व्यवस्था की गयी है। गालव! तुम ज्ञानका आश्रय लेकर उन सबको यथार्थरूपसे जानो ।। १२ ।। तेषां तेषां यथा हि त्वमाश्रमाणां ततस्ततः । नानारूपगुणोद्देशं पश्य विप्र स्थितं पृथक् ।। १३ ।। विप्रवर! उन-उन आश्रमोंके जो नाना प्रकारसे गुण-सम्पन्न धर्म बताये गये हैं, उनकी पृथक्-पृथक् स्थिति है। इस बातको तुम देखो और समझो ।। १३ ।। न यान्ति चैव ते सम्यगभिप्रेतमसंशयम् । अन्येऽपश्यंस्तथा सम्यगाश्रमाणां परां गतिम् ।। १४ ।। जो साधारण मनुष्य हैं, वे उन आश्रमोंके वास्तविक अभिप्रायको भलीभाँति संशयरहित नहीं जान पाते, किंतु उनसे भिन्न जो तत्त्वज्ञ हैं, वे इन आश्रमोंके परमतत्त्वको ठीक-ठीक समझते हैं ।। १४ ।। यत् तु निःश्रेयसं सम्यक् तच्चैवासंशयात्मकम् ।। १५ ।। अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् । संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिणः ।। १६ ।। जो अच्छी तरह कल्याण करनेवाला साधन होता है, वह सर्वथा संशयरहित होता है। सुहृदोंपर अनुग्रह करना, शत्रुभाव रखनेवाले दुष्टोंको दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और कामका संग्रह करना—इसे मनीषी पुरुष श्रेय कहते हैं ।। १५-१६ ।। निवृत्तिः कर्मणः पापात् सततं पुण्यशीलता । सद्भिश्च समुदाचारः श्रेय एतदसंशयम् ।। १७ ।। पापकर्मसे दूर रहना, निरन्तर पुण्यकर्मोंमें लगे रहना और सत्पुरुषोंके साथ रहकर सदाचारका ठीक-ठीक पालन करना—यह संशयरहित कल्याणका मार्ग है ।। मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् । वाक् चैव मधुरा प्रोक्ता श्रेय एतदसंशयम् ।। १८ ।। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करना, व्यवहारमें सरल होना तथा मीठे वचन बोलना—यह भी कल्याणका संदेहरहित मार्ग है ।। १८ ।। दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि । असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम् ।। १९ ।। देवताओं, पितरों और अतिथियोंको उनका भाग देना तथा भरण-पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंका त्याग न करना—यह कल्याणका निश्चित साधन है ।। १९ ।। सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् । यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं ब्रवीम्यहम् ।। २० ।।