महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1895, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्य बोलना भी श्रेयस्कर है; परंतु सत्यको यथार्थरूपसे जानना कठिन है। मैं तो उसीको सत्य कहता हूँ, जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो ॥ अहंकारस्य च त्यागः प्रमादस्य च निग्रहः। संतोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥ २१ ॥ अहंकारका त्याग, प्रमादको रोकना, संतोष और एकान्तवास—यह सुनिश्चित श्रेय कहलाता है ॥ २१ ॥ धर्मेण वेदाध्ययनं वेदान्तानां तथैव च। ज्ञानार्थानां च जिज्ञासा श्रेय एतदसंशयम् ॥ २२ ॥ धर्माचरणपूर्वक वेद और वेदाङ्गोंका स्वाध्याय करना तथा उनके सिद्धान्तको जाननेकी इच्छाको जगाये रखना निस्संदेह कल्याणका साधन है ॥ २२ ॥ शब्दरूपरसस्पर्शान् सह गन्धेन केवलान्। नात्यर्थमुपसेवेत श्रेयसोऽर्थी कथंचन ॥ २३ ॥ जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उस मनुष्यको किसी तरह भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥ नक्तंचर्यां दिवास्वप्रमालस्यं पैशुनं मदम्। अतियोगमयोगं च श्रेयसोऽर्थी परित्यजेत् ॥ २४ ॥ कल्याण चाहनेवाला पुरुष रातमें घूमना, दिनमें सोना, आलस्य, चुगली, मादक वस्तुका सेवन, आहार-विहारका अधिक मात्रामें सेवन और उसका सर्वथा त्याग—ये सब बातें त्याग दे ॥ २४ ॥ आत्मोत्कर्षं न मार्गेत परेषां परिनिन्दया। स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्षं पृथग्जनात् ॥ २५ ॥ निर्गुणास्त्वेव भूयिष्ठमात्मसम्भाविता नराः। दोषैरन्यान् गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षयात् ॥ २६ ॥ दूसरोंकी निन्दा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेका प्रयत्न न करे। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा जो अपनी उत्कृष्टता है, उसे अपने गुणोंद्वारा ही सिद्ध करे (बातोंसे नहीं)। गुणहीन मनुष्य ही अधिकतर अपनी प्रशंसा किया करते हैं। वे अपनेमें गुणोंकी कमी देखकर दूसरे गुणवान् पुरुषोंके गुणोंमें दोष बताकर उनपर आक्षेप किया करते हैं ॥ २५-२६ ॥ अनूच्यमानास्तु पुनस्ते मन्यन्तु महाजनात्। गुणवत्तरमात्मानं स्वेन मानेन दर्पिताः ॥ २७ ॥ यदि उनको उत्तर दिया जाय तो फिर वे घमंडमें भरकर अपने-आपको महापुरुषोंसे भी अधिक गुणवान् मानने लगें ॥ २७ ॥ अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन्। विपश्चिद् गुणसम्पन्नः प्राप्नोत्येव महत् यशः ॥ २८ ॥