महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1896, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु जो दूसरे किसीकी निन्दा तथा अपनी प्रशंसा नहीं करता, ऐसा उत्तम गुणसम्पन्न विद्वान् पुरुष ही महान् यशका भागी होता है ॥ २८ ॥ अब्रुवन् वाति सुरभिर्गन्धः सुमनसां शुचिः । तथैवाव्याहरन् भाति विमलो भानुरम्बरे ॥ २९ ॥ फूलोंकी पवित्र एवं मनोरम सुगन्ध बिना कुछ बोले ही महक उठती है। निर्मल सूर्य अपनी प्रशंसा किये बिना ही आकाशमें प्रकाशित होने लगते हैं ॥ २९ ॥ एवमादीनि चान्यानि परित्यक्तानि मेधया । ज्वलन्ति यशसा लोके यानि न व्याहरन्ति च ॥ ३० ॥ इस प्रकार संसारमें और भी बहुत-सी ऐसी बुद्धिसे रहित वस्तुएँ हैं, जो अपनी प्रशंसा नहीं करती हैं, किंतु अपने यशसे जगमगाती रहती हैं ॥ ३० ॥ न लोके दीप्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया । अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ३१ ॥ मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा करनेसे ही जगत्में ख्याति नहीं पा सकता। विद्वान् पुरुष गुफामें छिपा रहे तो भी उसकी सर्वत्र प्रसिद्धि हो जाती है ॥ असदुच्चैरपि प्रोक्तः शब्दः समुपशाम्यति । दीप्यते त्वेव लोकेषु शनैरपि सुभाषितम् ॥ ३२ ॥ बुरी बात जोर-जोरसे कही गयी हो तो भी वह शून्यमें विलीन हो जाती है, लोकमें उसका आदर नहीं होता है; किंतु अच्छी बात धीरेसे कही जाय तो भी वह संसारमें प्रकाशित होती है—उसका आदर होता और प्रभाव बढ़ता है ॥ ३२ ॥ मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु । दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ॥ ३३ ॥ घमंडी मूर्खोंकी कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्तःकरणका ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्तमणिके योगसे अपने दाहक अग्निरूपको ही प्रकट करता है ॥ ३३ ॥ एतस्मात् कारणात् प्रज्ञां मृगयन्ते पृथग्विधाम् । प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति मे ॥ ३४ ॥ इस कारण कल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधु पुरुष अनेक शास्त्रोंके अध्ययनसे नाना प्रकारकी प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि) का ही अनुसंधान करते हैं। मुझे तो सभी प्राणियोंके लिये प्रज्ञाका लाभ ही उत्तम जान पड़ता है ॥ नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्नाप्यन्यायेन पृच्छतः । ज्ञानवानपि मेधावी जडवत् समुपाविशेत् ॥ ३५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूछे किसीको कोई उपदेश न करे। अन्यायपूर्वक पूछनेपर भी किसीके प्रश्नका उत्तर न दे। जडकी भाँति चुपचाप बैठा