महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1897, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहे ।। ३५ ।। ततो वासं परीक्षेत धर्मनित्येषु साधुषु । मनुष्येषु वदान्येषु स्वधर्मनिरतेषु च ।। ३६ ।। मनुष्यको सदा धर्ममें लगे रहनेवाले साधु-महात्माओं तथा स्वधर्मपरायण उदार पुरुषोंके समीप निवास करनेकी इच्छा रखनी चाहिये ।। ३६ ।। चतुर्णां यत्र वर्णानां धर्मव्यतिकरो भवेत् । न तत्र वासं कुर्वीत श्रेयोऽर्थी वै कथंचन ।। ३७ ।। जहाँ चारों वर्णोंके धर्मोंका उल्लङ्घन होता हो, वहाँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषको किसी तरह भी नहीं रहना चाहिये ।। ३७ ।। निरारम्भोऽप्ययमिह यथालब्धोपजीवनः । पुण्यं पुण्येषु विमलं पापं पापेषु चाप्नुयात् ।। ३८ ।। किसी कर्मका आरम्भ न करनेवाला और जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करनेवाला पुरुष भी यदि पुण्यात्माओंके समाजमें रहे तो उसे निर्मल पुण्यकी प्राप्ति होती है और पापियोंके संसर्गमें रहे तो वह पापका ही भागी होता है ।। ३८ ।। अपामग्नेस्तथेन्दोश्च स्पर्शं वेदयते यथा । तथा पश्यामहे स्पर्शमुभयोः पुण्यपापयोः ।। ३९ ।। जैसे जल, अग्नि और चन्द्रमाकी किरणोंके संसर्गमें आनेपर मनुष्य क्रमशः शीत, उष्ण और सुखदायी स्पर्शका अनुभव करता है, उसी प्रकार हम पुण्यात्मा और पापियोंके संगसे पुण्य और पाप दोनोंके स्पर्शका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ।। ३९ ।। अपश्यन्तोऽनुविषयं भुञ्जते विघसाशिनः । भुञ्जानांश्चात्मविषयान् विषयान् विद्धि कर्मणाम् ।। ४० ।। जो विघसाशी (भृत्यवर्ग ओर अतिथि आदिको भोजन करानेके बाद बचा हुआ भोजन करनेवाले) हैं, वे तिक्त-मधुर रस या स्वादकी आलोचना न करते हुए अन्न ग्रहण करते हैं; किंतु जो अपनी रसनाका विषय समझकर स्वादु और अस्वादुका विचार रखते हुए भोजन करते हैं, उन्हें कर्मपाशमें बँधा हुआ ही समझना चाहिये ।। ४० ।। यत्रागमयमानानामसत्कारेण पृच्छताम् । प्रब्रूयाद् ब्राह्मणो धर्मं त्यजेत् तं देशमात्मवान् ।। ४१ ।। जहाँ ब्राह्मण अनादर एवं अन्यायपूर्वक धर्म-शास्त्रविषयक प्रश्न करनेवाले पुरुषोंको धर्मका उपदेश करता हो, आत्मपरायण साधकको उस देशका परित्याग कर देना चाहिये ।। ४१ ।। शिष्योपाध्यायिकावृत्तिर्यत्र स्यात् सुसमाहिता । यथावच्छास्त्रसम्पन्ना कस्तं देशं परित्यजेत् ।। ४२ ।।