महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिये ।। ४९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ५० ।। ‘संजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है। अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ५० ।।
रामं दाशरथिं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम । योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।। ५१ ।। ‘संजय! सुननेमें आया है कि दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामजी भी यहाँसे परम धामको चले गये थे, जो सदा अपनी प्रजापर वैसी ही कृपा रखते थे, जैसे-पिता अपने औरस पुत्रोंपर रखता है ।। ५१ ।।
विधवा यस्य विषये नानाथाः काश्चनाभवन् । सदैवासीत् पितृसमो रामो राज्यं यदन्वशात् ।। ५२ ।। ‘उनके राज्यमें कोई भी स्त्री अनाथ-विधवा नहीं हुई। श्रीरामचन्द्रजीने जबतक राज्यका शासन किया, तबतक वे अपनी प्रजाके लिये सदा ही पिताके समान कृपालु बने रहे ।। ५२ ।।
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि समपादयत् । नित्यं सुभिक्षमेवासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५३ ।। ‘मेघ समयपर वर्षा करके खेतीको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता था—उसे बढ़ने और फूलने-फलनेका अवसर देता था। रामके राज्य-शासनकालमें सदा सुकाल ही रहता था (कभी अकाल नहीं पड़ता था) ।।
प्राणिनो नाप्सु मज्जन्ति नान्यथा पावकोऽदहत् । रुजाभयं न तत्रासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५४ ।। ‘रामके राज्यका शासन करते समय कभी कोई प्राणी जलमें नहीं डूबते थे, आग अनुचितरूपसे कभी किसीको नहीं जलाती थी तथा किसीको रोगका भय नहीं होता था ।। ५४ ।।
आसन् वर्षसहस्रिण्यस्तथा वर्षसहस्रकाः । अरोगाः सर्वसिद्धार्था रामे राज्यं प्रशासति ।। ५५ ।। ‘श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों हजार वर्षतक जीनेवाली स्त्रियाँ और सहस्रों वर्षतक जीवित रहनेवाले पुरुष थे। किसीको कोई रोग नहीं सताता था, सभीके सारे मनोरथ सिद्ध होते थे ।।
नान्योऽन्येन विवादोऽभूत् स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् ।