भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1957, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1957

वसन् विषयमध्येऽपि न वसत्येव बुद्धिमान् । संवसत्येव दुर्बुद्धिरसत्सु विषयेष्वपि ॥ ६ ॥ बुद्धिमान् पुरुष विषयोंके बीचमें रहता हुआ भी (असंग होनेके कारण) उनमें नहीं रहनेके बराबर ही है; किंतु जिसकी बुद्धि दूषित होती है, वह विषयोंके निकट न होनेपर भी सदा उन्हींमें रहता है ॥ ६ ॥

नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञं पयः पुष्करपर्णवत् । अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतुकाष्ठवत् ॥ ७ ॥ जैसे पानी कमलके पत्तेको लिपायमान नहीं कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको अधर्म लिप्त नहीं कर सकता; परंतु जैसे लाह काठमें चिपक जाती है, उसी प्रकार पाप अज्ञानी मनुष्यमें अधिक लिप्त हो जाता है ॥ ७ ॥

नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति । कर्ता खलु यथाकालं ततः समभिपद्यते ॥ ८ ॥ अधर्म फल प्रदानके अवसरकी प्रतीक्षा करनेवाला है, अतः वह कर्ताका पीछा नहीं छोड़ता। समय आनेपर उस कर्ताको उस पापका फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ ८ ॥

न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः । बुद्धिकर्मेन्द्रियाणां हि प्रमत्तो यो न बुद्ध्यते । शुभाशुभे प्रसक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद् भयम् ॥ ९ ॥ पवित्र अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानी पुरुष कर्मोंके शुभाशुभ फलोंसे कभी विचलित नहीं होते हैं। जो प्रमादवश ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंद्वारा होनेवाले पापोंपर विचार नहीं करता तथा शुभ एवं अशुभमें आसक्त रहता है, उसे महान् भयकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥

वीतरागो जितक्रोधः सम्यग् भवति यः सदा । विषये वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ॥ १० ॥ परंतु जो वीतराग होकर क्रोधको जीत लेता और नित्य सदाचारका पालन करता है, वह विषयोंमें वर्तमान रहकर भी पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं जोड़ता है ॥ १० ॥

मर्यादायां धर्मसेतुर्निबद्धो नैव सीदति । पुष्टस्रोत इवासक्तः स्फीतो भवति संचयः ॥ ११ ॥ जैसे नदीमें बँधा हुआ मजबूत बाँध टूटता नहीं है और उसके कारण वहाँ जलका स्रोत बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्राचीन मर्यादापर बँधा हुआ धर्मरूपी बाँध नष्ट नहीं होता है तथा उससे आसक्तिरहित संचित तपकी वृद्धि होने लगती है ॥ ११ ॥

यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना । आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ॥ १२ ॥ नृपश्रेष्ठ! जिस प्रकार शुद्ध सूर्यकान्तमणि सूर्यके तेजको ग्रहण कर लेती है, उसी प्रकार योगका साधक समाधिके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको ग्रहण करता है ॥ १२ ॥