महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1958, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा तिलानामिह पुष्पसंश्रयात् पृथक्पृथग्याति गुणोऽतिसौम्यताम् । तथा नराणां भुवि भावितात्मनां यथाऽऽश्रयं सत्त्वगुणः प्रवर्तते ॥ १३ ॥ जैसे तिलका तेल भिन्न-भिन्न प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंसे वासित होकर अत्यन्त मनोरम गन्ध ग्रहण करता है, वैसे ही पृथ्वीपर शुद्धचित्त पुरुषोंका स्वभाव सत्पुरुषोंके संगके अनुसार सत्त्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १३ ॥
जहाति दारांश्च जहाति सम्पदः पदं च यानं विविधाश्च याः क्रियाः । त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर- स्तदास्य बुद्धिविषयेषु भिद्यते ॥ १४ ॥ जिस समय मनुष्य सर्वोत्तम पद पानेके लिये उत्सुक हो जाता है, उस समय उसकी बुद्धि विषयोंसे विलग हो जाती है तथा वह स्त्री, सम्पत्ति, पद, वाहन और नाना प्रकारकी जो क्रियाएँ हैं, उनका भी परित्याग कर देता है ॥ १४ ॥
प्रसक्तबुद्धिर्विषयेषु यो नरो न बुध्यते ह्यात्महितं कथंचन । स सर्वभावानुगतेन चेतसा नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते ॥ १५ ॥ परंतु जिसकी बुद्धि विषयोंमें आसक्त हो जाती है, वह मनुष्य किसी तरह अपने हितकी बात नहीं समझता। राजन्! जैसे मछली काँटेमें गुँथे हुए मांसपर आकृष्ट होती है और दुःख पाती है, उसी तरह वह सब प्रकारकी वासनाओंसे वासित चित्तके द्वारा विषयोंकी ओर आकृष्ट होता है और दुःख भोगता है ॥ १५ ॥
संघातवन्मर्त्यलोकः परस्परमपाश्रितः । कदलीगर्भनिःसारो नौरिवाप्सु निमज्जति ॥ १६ ॥ जैसे शरीरके अंग-प्रत्यंग एक-दूसरेके आश्रित हैं, उसी प्रकार यह मर्त्यलोक—स्त्री-पुत्र और पशु आदिका समुदाय आपसमें एक-दूसरेपर अवलम्बित है। यह संसार केलेके भीतरी भागके समान निस्सार है। जैसे नौका पानीमें डूब जाती है, उसी प्रकार यह सब कुछ कालके प्रवाहमें निमग्न हो जाता है ॥ १६ ॥
न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते । सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ॥ १७ ॥