महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1961, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशयानं यान्तमासीनं प्रवृत्तं विषयेषु च।
शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा ॥ ३१ ॥
मनुष्य सोता हो, बैठा हो, चलता हो या विषय-भोगमें लगा हो, उसके शुभाशुभ कर्म सदा उसे प्राप्त होते रहते हैं॥ ३१ ॥
न ह्यन्यत् तीरमासाद्य पुनस्तर्तुं व्यवस्यति।
दुर्लभो दृश्यते ह्यस्य विनिपातो महार्णवे ॥ ३२ ॥
जैसे समुद्रके परलेपार पहुँचकर पुनः कोई उसमें तैरनेका विचार नहीं करता, उसी प्रकार संसार-सागरसे पार हुए मनुष्यका फिर उसमें पड़ना अर्थात् वापस आना दुर्लभ दिखायी देता है॥ ३२ ॥
यथा भावावसन्ना हि नौर्महाम्भसि तन्तुना।
तथा मनोभियोगाद् वै शरीरं प्रचिकीर्षति ॥ ३३ ॥
जैसे गम्भीर जलमें पड़ी हुई नौका नाविकद्वारा रस्सीसे खींची जानेपर उसके मनोभावके अधीन होकर चलती है, उसी प्रकार यह जीव इस शरीररूपी नौकाको अपने मनके अभिप्रायानुसार चलाना चाहता है॥ ३३ ॥
यथा समुद्रमभितः संश्रिताः सरितोऽपराः।
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंश्रीयते सदा ॥ ३४ ॥
जैसे बहुत-सी नदियाँ सब ओरसे आकर समुद्रमें मिल जाती हैं, उसी प्रकार योगसे वशमें किया हुआ मन सदाके लिये मूल प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ३४ ॥
स्नेहपाशैर्बहुविधैरासक्तमनसो नराः।
प्रकृतिस्था विषीदन्ति जले सैकतवेश्मवत् ॥ ३५ ॥
जिनका मन नाना प्रकारके स्नेह-बन्धनोंमें जकड़ा हुआ है, वे प्रकृतिमें स्थित हुए जीव जलमें ढह जानेवाले बालूके मकानकी भाँति महान् दुःखसे नष्टप्राय हो जाते हैं॥ ३५ ॥
शरीरगृहसंज्ञस्य शौचतीर्थस्थ देहिनः।
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ॥ ३६ ॥
शरीर ही जिसका घर है, जो बाहर-भीतरकी पवित्रताको ही तीर्थ मानता है तथा बुद्धिपूर्वक कल्याणके मार्गपर चलता है, उस देहधारी जीवको इहलोक और परलोकमें भी सुख मिलता है॥ ३६ ॥
विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः।
परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥ ३७ ॥
क्रियाओंका विस्तार क्लेशदायक होता है और संक्षेप सुखदायक है। सभी कर्मविस्तार परार्थरूप अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये होते हैं, परंतु त्याग अपने लिये हितकर माना गया है॥ ३७ ॥
संकल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातयः कारणात्मकाः।