भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1962, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1962

भार्या पुत्रश्च दासश्च स्वमर्थमनुयुज्यते ॥ ३८ ॥ कोई-न-कोई संकल्प (मनोरथ) लेकर ही लोग मित्र बनते हैं, कुटुम्बी जन भी किसी हेतुसे ही नाता रखते हैं, पत्नी, पुत्र और सेवक सभी अपने-अपने स्वार्थका ही अनुसरण करते हैं ॥ ३८ ॥ न माता न पिता किंचित् कस्यचित् प्रतिपद्यते । दानपथ्यौदनो जन्तुः स्वकर्मफलमश्नुते ॥ ३९ ॥ माता और पिता भी परलोक-साधनमें किसीकी कुछ सहायता नहीं कर सकते। परलोकके पथमें तो अपना किया हुआ दान अर्थात् त्याग ही राहखर्चका काम देता है। प्रत्येक जीव अपने कर्मका ही फल भोगता है ॥ ३९ ॥ माता पुत्रः पिता भ्राता भार्या मित्रजनस्तथा । अष्टापदपदस्थाने लक्षमुद्रेव लक्ष्यते ॥ ४० ॥ माता, पिता, पुत्र, भ्राता, भार्या और मित्रगण—ये सब सुवर्णके सिक्कोंके स्थानपर रखी हुई लाखकी मुद्राके समान देखे जाते हैं ॥ ४० ॥ सर्वाणि कर्माणि पुरा कृतानि शुभाशुभान्यात्मनो यान्ति जन्तोः । उपस्थितं कर्मफलं विदित्वा बुद्धिं तथा चोदयतेऽन्तरात्मा ॥ ४१ ॥ पूर्वजन्मके किये हुए सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्म जीवका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार प्राप्त हुई परिस्थितिको अपने कर्मोंका फल जानकर जिसका मन अन्तर्मुख हो गया है, वह अपनी बुद्धिको वैसी शुभ प्रेरणा देता है जिससे भविष्यमें दुःख न भोगना पड़े ॥ व्यवसायं समाश्रित्य सहायान् योऽधिगच्छति । न तस्य कश्चिदारम्भः कदाचिदवसीदति ॥ ४२ ॥ जो दृढ़ निश्चय एवं पूर्ण उद्योगका सहारा ले तदनुकूल सहायकोंका संग्रह करता है, उसका कोई भी कार्य कभी भी व्यर्थ नहीं होता ॥ ४२ ॥ अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम् । न श्रीः संत्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः ॥ ४३ ॥ जिसके मनमें दुविधा नहीं होती, जो उद्योगी, शूरवीर, धीर और विद्वान् होता है, उसे सम्पत्ति उसी तरह कभी नहीं छोड़ती, जैसे किरणें सूर्यको ॥ ४३ ॥ आस्तिक्यव्यवसायाभ्यामुपायाद् विस्मयाद् धिया । समारभेदनिन्द्यात्मा न सोऽर्थः परिषीदति ॥ ४४ ॥ जिसका हृदय उदार एवं प्रशस्त है, जो आस्तिक भाव, निश्चय एवं आवश्यक उपायसे गर्वहीनताके साथ उत्तम बुद्धिपूर्वक कार्य आरम्भ करता है, उसका वह कार्य कभी असफल नहीं होता है ॥ ४४ ॥