महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1978, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! वही आग जब हवाका सहारा पाकर प्रबल हो जाती है, तब सम्पूर्ण पृथ्वीको भी तत्काल भस्म कर सकती है ।। २० ।। तद्वज्जातबलो योगी दीप्ततेजा महाबलः । अन्तकाल इवादित्यः कृत्स्नं संशोषयेज्जगत् ॥ २१ ॥ इसी तरह योगीका भी योगबल बढ़ जानेसे जब वह उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न और महान् शक्तिशाली हो जाता है, तब वह जैसे प्रलयकालीन सूर्य समस्त जगत्को सुखा डालता है, वैसे ही समस्त रागादि दोषोंका नाश कर देता है ।। २१ ।। दुर्बलश्च यथा राजन् स्रोतसा ह्रियते नरः । बलहीनस्तथा योगो विषयैर्ह्रियतेऽवशः ॥ २२ ॥ राजन्! जैसे दुर्बल मनुष्य पानीके वेगसे बह जाता है, उसी तरह दुर्बल योगी विवश होकर विषयोंकी ओर खिंच जाता है ।। २२ ।। तदेव च महास्रोतो विष्टम्भयति वारणः । तद्वद् योगबलं लब्ध्वा व्यूहते विषयान् बहून् ॥ २३ ॥ परंतु जलके उसी महान् स्रोतको जैसे गजराज रोक देता है अर्थात् उसमें नहीं बहता, उसी प्रकार योगका महान् बल पाकर योगी भी उन सभी बहुसंख्यक विषयोंको अवरुद्ध कर देता है अर्थात् उनके प्रवाहमें नहीं बहता ।। २३ ।। विशन्ति चावशाः पार्थ योगाद् योगबलान्विताः । प्रजापतीनृषीन् देवान् महाभूतानि चेश्वराः ॥ २४ ॥ कुन्तीनन्दन! योगशक्तिसम्पन्न पुरुष स्वतन्त्रता-पूर्वक प्रजापति, ऋषि, देवता और पञ्चमहाभूतोंमें प्रवेश कर जाते हैं। उनमें ऐसा करनेकी सामर्थ्य आ जाती है ।। २४ ।। न यमो नान्तकः क्रुद्धो न मृत्युर्भीमविक्रमः । ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजसः ॥ २५ ॥ नरेश्वर! अमित तेजस्वी योगीपर क्रोधमें भरे हुए यमराज, अन्तक और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी शासन नहीं चलता है ।। २५ ।। आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । योगः कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! योगी योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता है और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता है ।। २६ ।। प्राप्नुयाद् विषयांश्चैव पुनश्चोग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव ॥ २७ ॥ तात! वह उन शरीरोंद्वारा विषयोंका सेवन और उग्र तपस्या भी करता है। तदनन्तर अपनी तेजोमयी किरणोंको समेट लेनेवाले सूर्यकी भाँति सभी रूपोंको अपनेमें लीन कर लेता है ।। २७ ।।