भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1979, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1979

बलस्थस्य हि योगस्य बन्धनेशस्य पार्थिव । विमोक्षप्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशयम् ॥ २८ ॥ पृथ्वीनाथ! बलवान् योगी बन्धनोंको तोड़नेमें समर्थ होता है, उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति आ जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ बलानि योगप्राप्तानि मयैतानि विशाम्पते । निदर्शनार्थं सूक्ष्माणि वक्ष्यामि च पुनस्तव ॥ २९ ॥ प्रजापालक नरेश! मैं दृष्टान्तके लिये योगसे प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियोंका पुनः तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २९ ॥ आत्मनश्च समाधाने धारणां प्रति वा विभो । निदर्शनानि सूक्ष्माणि शृणु मे भरतर्षभ ॥ ३० ॥ प्रभो! भरतश्रेष्ठ! आत्मसमाधिके लिये जो धारणा की जाती है, उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाता हूँ, सुनो ॥ ३० ॥ अप्रमत्तो तथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः । युक्तः सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ३१ ॥ जैसे सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके बाण चलानेपर लक्ष्यको अवश्य बींध डालता है, उसी प्रकार जो योगी मनको परमात्माके ध्यानमें लगा देता है, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥ स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम् । पुरुषो युक्त आरोहेत् सोपानं युक्तमानसः ॥ ३२ ॥ युक्तस्तथायमात्मानं योगः पार्थिव निश्चलम् । करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम् ॥ ३३ ॥ पृथ्वीनाथ! जैसे सिरपर रखे हुए तेलसे भरे पात्रकी ओर मनको स्थिरभावसे लगाये रखनेवाला पुरुष एकाग्रचित्त हो सीढ़ियोंपर चढ़ जाता है और जरा भी तेल नहीं छलकता, उसी तरह योगी भी योगयुक्त होकर जब आत्माको परमात्मामें स्थिर करता है, उस समय उसका आत्मा अत्यन्त निर्मल तथा अचल सूर्यके समान तेजस्वी हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ यथा च नावं कौन्तेय कर्णधारः समाहितः । महार्णवगतां शीघ्रं नयेत् पार्थिवसत्तम ॥ ३४ ॥ तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित् । दुर्गमें स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप ॥ ३५ ॥ कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्रमें पड़ी हुई नौकाको शीघ्र ही किनारेपर लगा देता है, उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर इस देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान (परमधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥