भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

बलस्थस्य हि योगस्य बन्धनेशस्य पार्थिव । विमोक्षप्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशयम् ॥ २८ ॥ पृथ्वीनाथ! बलवान् योगी बन्धनोंको तोड़नेमें समर्थ होता है, उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति आ जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ बलानि योगप्राप्तानि मयैतानि विशाम्पते । निदर्शनार्थं सूक्ष्माणि वक्ष्यामि च पुनस्तव ॥ २९ ॥ प्रजापालक नरेश! मैं दृष्टान्तके लिये योगसे प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियोंका पुनः तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २९ ॥ आत्मनश्च समाधाने धारणां प्रति वा विभो । निदर्शनानि सूक्ष्माणि शृणु मे भरतर्षभ ॥ ३० ॥ प्रभो! भरतश्रेष्ठ! आत्मसमाधिके लिये जो धारणा की जाती है, उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाता हूँ, सुनो ॥ ३० ॥ अप्रमत्तो तथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः । युक्तः सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ३१ ॥ जैसे सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके बाण चलानेपर लक्ष्यको अवश्य बींध डालता है, उसी प्रकार जो योगी मनको परमात्माके ध्यानमें लगा देता है, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥ स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम् । पुरुषो युक्त आरोहेत् सोपानं युक्तमानसः ॥ ३२ ॥ युक्तस्तथायमात्मानं योगः पार्थिव निश्चलम् । करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम् ॥ ३३ ॥ पृथ्वीनाथ! जैसे सिरपर रखे हुए तेलसे भरे पात्रकी ओर मनको स्थिरभावसे लगाये रखनेवाला पुरुष एकाग्रचित्त हो सीढ़ियोंपर चढ़ जाता है और जरा भी तेल नहीं छलकता, उसी तरह योगी भी योगयुक्त होकर जब आत्माको परमात्मामें स्थिर करता है, उस समय उसका आत्मा अत्यन्त निर्मल तथा अचल सूर्यके समान तेजस्वी हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ यथा च नावं कौन्तेय कर्णधारः समाहितः । महार्णवगतां शीघ्रं नयेत् पार्थिवसत्तम ॥ ३४ ॥ तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित् । दुर्गमें स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप ॥ ३५ ॥ कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्रमें पड़ी हुई नौकाको शीघ्र ही किनारेपर लगा देता है, उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर इस देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान (परमधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥

सारथिश्च यथा युक्त्वा सदश्वान् सुसमाहितः ।

देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ ।। ३६ ।।

तथैव नृपते योगी धारणासु समाहितः ।

प्राप्नोत्याशु परं स्थानं लक्ष्यं मुक्त इवाशुगः ।। ३७ ।।

पुरुषप्रवर! राजन्! जिस तरह अत्यन्त सावधान रहनेवाला सारथि अच्छे घोड़ोंको

रथमें जोतकर धनुर्धर योद्धाको तुरंत ही अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देता है, वैसे ही धारणाओंमें

एकाग्रचित्त हुआ योगी लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी भाँति शीघ्र परम पदको प्राप्त हो

जाता है ।। ३६-३७।।

प्रवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्ठति योऽचलः ।

पापं हन्ति पुनीतानां पदमाप्नोति सोऽजरम् ।। ३८ ।।

जो योगी समाधिके द्वारा आत्माको परमात्मामें स्थिर करके अचल हो जाता है, वह

अपने पापको नष्ट कर देता है और पवित्र पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले अविनाशी पदको पा

लेता है ।। ३८ ।।

नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः ।

दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ।। ३९ ।।

स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः ।

आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्वि शाम्पते ।। ४० ।।

स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् ।

उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ।। ४१ ।।

अमित पराक्रमी नरेश! योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि,

कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्थानोंमें

धारणाके द्वारा सूक्ष्म आत्माको परमात्माके साथ भलीभाँति संयुक्त करता है, वह यदि

इच्छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मोंको शीघ्र ही भस्म करके उत्तम

योगका आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है ।। ३९-४१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

आहारान् कीदृशान् कृत्वा कानि जित्वा च भारत ।

योगी बलमवाप्नोति तद् भवान् वक्तुमर्हसि ।। ४२ ।।

युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन! योगी कैसे आहार करके और किन-किनको जीतकर

योगशक्ति प्राप्त कर लेता है, यह आप मुझे बतानेकी कृपा करें ।। ४२ ।।

भीष्म उवाच

कणानां भक्षणे युक्तः पिण्याकस्य च भारत ।

स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी बलमवाप्नुयात् ।। ४३ ।।

भीष्मजीने कहा— भारत! जो धानकी खुद्दी और तिलकी खली खाता तथा घी-तेलका परित्याग कर देता है, उसी योगीको योगबलकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥
भुञ्जानो यावकं रूक्षं दीर्घकालमरिंदम ।
एकाहारो विशुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥
शत्रुदमन नरेश! जो दीर्घकालतक एक समय जौका रूखा दलिया खाता है, वह योगी शुद्धचित्त होकर योगबलकी प्राप्ति कर सकता है ॥ ४४ ॥
पक्षान् मासानृतूंश्चैतान् संवत्सरानहस्तथा ।
अपः पीत्वा पयोमिश्रा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४५ ॥
जो योगी दुग्धमिश्रित जलको दिनमें एक बार पीता है; फिर पंद्रह दिनोंमें एक बार पीता है। तत्पश्चात् एक महीनेमें, एक ऋतुमें और एक वर्षमें एक बार उसे ग्रहण करता है, उसको योगशक्ति प्राप्त होती है ॥ ४५ ॥
अखण्डमपि वा मांसं सततं मनुजेश्वर ।
उपोष्‍य सम्यक् शुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४६ ॥
नरेश्वर! जो लगातार जीवनभरके लिये मांस नहीं खाता है और विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करके अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह योगी भी योगशक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ४६ ॥
कामं जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च ।
भयं शोकं तथा श्वासं पौरुषान् विषयांस्तथा ॥ ४७ ॥
अरतिं दुर्जयां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव ।
स्पर्शं निद्रां तथा तन्द्रीं दुर्जयां नृपसत्तम ॥ ४८ ॥
दीपयन्ति महात्मानः सूक्ष्ममात्मानमात्मना ।
वीतरागा महाप्राज्ञा ध्यानाध्ययनसम्पदा ॥ ४९ ॥
पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! काम, क्रोध, सर्दी, गर्मी, वर्षा, भय, शोक, श्वास, मनुष्योंको प्रिय लगनेवाले विषय, दुर्जय असंतोष, घोर तृष्णा, स्पर्श, निद्रा तथा दुर्जय आलस्यको जीतकर वीतराग, महान् एवं उत्तम बुद्धिसे युक्त महात्मा योगी स्वाध्याय तथा ध्यानका सम्पादन करके बुद्धिके द्वारा सूक्ष्म आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥
दुर्गस्त्वेष मतः पन्था ब्राह्मणानां विपश्चिताम् ।
यः कश्चिद् व्रजति ह्यस्मिन् क्षेमेण भरतर्षभ ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ! विद्वान् ब्राह्मणोंने योगके इस मार्गको दुर्गम माना है। कोई बिरला ही इस मार्गको कुशलपूर्वक तै कर सकता है ॥ ५० ॥
यथा कश्चिद् वनं घोरं बहुसर्पसरीसृपम् ।
श्वभ्रवत् तोयहीनं च दुर्गमें बहुकण्टकम् ॥ ५१ ॥
अभक्तमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम् ।

पन्थानं तस्कराकीर्णं क्षेमेणाभिपतेद् युवा ॥ ५२ ॥
योगमार्गं तथाऽऽसाद्य यः कश्चिद् व्रजते द्विजः ।
क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद् बहुदोषो हि स स्मृतः ॥ ५३ ॥
जैसे कोई-कोई बिरला नवयुवक ही अनेकानेक सर्पों तथा विच्छू आदिसे भरे हुए गड्डों और बहुत-से काँटोंवाले, जलशून्य, दुर्गम एवं घोर वनमें सकुशल यात्रा कर सकता है तथा जहाँ भोजन मिलना असम्भव है, जिसमें प्रायः जंगल-ही-जंगल पड़ता है, जहाँके वृक्ष दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं तथा जो चोर-डाकुओंसे भरा हुआ है, ऐसे मार्गको सकुशल तै कर सकता है; उसी प्रकार योगमार्गका आश्रय लेकर कोई बिरला ही द्विज उसपर कुशलतापूर्वक चल पाता है, क्योंकि वह बहुत-से दोषों (कठिनाइयों)-से भरा हुआ बताया गया है ॥ ५१—५३ ॥

सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते ।
धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभिः ॥ ५४ ॥
पृथ्वीपते! छुरेकी तीखी धारपर कोई सुखपूर्वक खड़ा रह सकता है; किंतु जिनका चित्त शुद्ध नहीं है, ऐसे मनुष्योंका योगकी धारणाओंमें स्थिर रहना नितान्त कठिन है ॥ ५४ ॥

विपन्ना धारणास्तात नयन्ति न शुभां गतिम् ।
नेतृहीना यथा नावः पुरुषानर्णवे नृप ॥ ५५ ॥
तात! नरेश्वर! जैसे समुद्रमें बिना नाविककी नाव मनुष्योंको पार नहीं लगा सकती, उसी प्रकार यदि योगकी धारणाएँ सिद्ध न हुईं तो वे शुभगतिकी प्राप्ति नहीं करा सकतीं ॥ ५५ ॥

यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि ।
मरणं जन्म दुःखं च सुखं च स विमुञ्चति ॥ ५६ ॥
कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योगकी धारणाओंमें स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुखके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५६ ॥

नानाशास्त्रेषु निष्पन्नं योगेष्विदमुदाहृतम् ।
परं योगस्य यत् कृत्यं निश्चितं तद् द्विजातिषु ॥ ५७ ॥
यह मैंने तुम्हें योगविषयक नाना शास्त्रोंका सिद्धान्त बतलाया है। योग-साधनाका जो-जो कृत्य है, वह द्विजातियोंके लिये ही निश्चित किया गया है अर्थात् उन्हींका उसमें अधिकार है ॥ ५७ ॥

परं हि तद् ब्रह्म महन्महात्मन्
ब्रह्माणमीशं वरदं च विष्णुम् ।
भवं च धर्मं च षडाननं च
यद् ब्रह्मपुत्रांश्च महानुभावान् ॥ ५८ ॥

तमश्च कष्टं सुमहद् रजश्च सत्त्वं विशुद्धं प्रकृतिं परां च । सिद्धिं च देवीं वरुणस्य पत्नीं तेजश्च कृत्स्नं सुमहच्च धैर्यम् ॥ ५९ ॥ ताराधिपं खे विमलं सतारं विश्वांश्च देवानुरगान् पितॄंश्च । शैलांश्च कृत्स्नानुदधींश्च घोरान् नदीश्च सर्वाः सवनान् घनांश्च ॥ ६० ॥ नागान् नगान् यक्षगणान् दिशश्च गन्धर्वसंघान् पुरुषान् स्त्रियश्च । परस्परं प्राप्य महान्महात्मा विशेत योगी न चिराद् विमुक्तः ॥ ६१ ॥ महात्मन्! योगसिद्ध महात्मा पुरुष यदि चाहे तो तुरंत ही मुक्त होकर महान् परब्रह्मके स्वरूपको प्राप्त कर लेता है अथवा वह अपने योगबलसे भगवान् ब्रह्मा, वरदायक विष्णु, महादेवजी, धर्म, छः मुखोंवाले कार्त्तिकेय, ब्रह्माजीके महानुभाव पुत्र सनकादि, कष्ट-दायक तमोगुण, महान् रजोगुण, विशुद्ध सत्त्वगुण, मूल प्रकृति, वरुणपत्नी सिद्धिदेवी, सम्पूर्ण तेज, महान् धैर्य, ताराओंसहित आकाशमें प्रकाशित होनेवाले निर्मल तारापति चन्द्रमा, विश्वेदेव, नाग, पितर, सम्पूर्ण पर्वत, भयंकर समुद्र, सम्पूर्ण नदी-समुदाय, वन, मेघ, नाग, वृक्ष, यक्ष, दिशा, गन्धर्वगण, समस्त पुरुष और स्त्री—इनमेंसे प्रत्येकके पास पहुँचकर उसके भीतर प्रवेश कर सकता है ॥ ५८–६१ ॥

कथा च येयं नृपते प्रसक्ता देवे महावीर्यमतौ शुभेयम् । योगी स सर्वानभिभूय मर्त्यान् नारायणात्मा कुरुते महात्मा ॥ ६२ ॥ नरेश्वर! महान् बल और बुद्धिसे सम्पन्न परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली यह कल्याणमयी वार्ता मैंने प्रसंगवश तुम्हें सुनायी है। योगसिद्ध महात्मा पुरुष सब मनुष्योंसे ऊपर उठकर नारायणस्वरूप हो जाता है और संकल्पमात्रसे सृष्टि करने लगता है ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगविधौ त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगविधिविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥

सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

सम्यक् त्वयाऽयं नृपते वर्णितः शिष्टसम्मतः ।
योगमार्गो यथान्यायं शिष्यायेह हितैषिणा ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महाराज! आप मेरे हितैषी हैं, आपने मुझ शिष्यके प्रति शिष्ट पुरुषोंके मतके अनुसार इस योगमार्गका यथोचितरूपसे वर्णन किया ॥ १ ॥
सांख्ये त्विदानीं कार्त्स्न्येन विधिं प्रब्रूहि पृच्छते ।
त्रिषु लोकेषु यज्ज्ञानं सर्वं तद् विदितं हि ते ॥ २ ॥
अब मैं सांख्यविषयक सम्पूर्ण विधि पूछ रहा हूँ। आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें; क्योंकि तीनों लोकोंमें जो ज्ञान है, वह सब आपको विदित है ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

शृणु मे त्वमिदं सूक्ष्मं सांख्यानां विदितात्मनाम् ।
विहितं यतिभिः सर्वैः कपिलादिभिरीश्वरैः ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! आत्मतत्त्वके जाननेवाले सांख्यशास्त्रके विद्वानोंका यह सूक्ष्म ज्ञान तुम मुझसे सुनो। इसे ईश्वरकोटिके कपिल आदि सम्पूर्ण यतियोंने प्रकाशित किया है ॥ ३ ॥
यस्मिन् न विभ्रमाः केचिद् दृश्यन्ते मनुजर्षभ ।
गुणाश्च यस्मिन् बहवो दोषहानिश्च केवला ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! इस मतमें किसी प्रकारकी भूल नहीं दिखायी देती। इसमें गुण तो बहुत-से हैं; किंतु दोषोंका सर्वथा अभाव है ॥ ४ ॥
ज्ञानेन परिसंख्याय सदोषान् विषयान् नृप ।
मानुषान् दुर्जयान् कृत्स्नान् पैशाचान् विषयांस्तथा ॥ ५ ॥
राक्षसान् विषयान् ज्ञात्वा यक्षाणां विषयांस्तथा ।
विषयानौरगान् ज्ञात्वा गान्धर्वविषयांस्तथा ॥ ६ ॥
पितॄणां विषयान् ज्ञात्वा तिर्यक्षु चरतां नृप ।
सुपर्णविषयान् ज्ञात्वा मरुतां विषयांस्तथा ॥ ७ ॥
राजर्षिविषयान् ज्ञात्वा ब्रह्मर्षिविषयांस्तथा ।
आसुरान् विषयान् ज्ञात्वा वैश्वदेवांस्तथैव च ॥ ८ ॥
देवर्षिविषयान् ज्ञात्वा योगानामपि चेश्वरान् ।

प्रजापतीनां विषयान् ब्रह्मणो विषयांस्तथा ।। ९ ।।
आयुषश्च परं कालं लोके विज्ञाय तत्त्वतः ।
सुखस्य च परं तत्त्वं विज्ञाय वदतां वर ।। १० ।।
प्राप्ते काले च यद् दुःखं सततं विषयैषिणाम् ।
तिर्यक्षु पततां दुःखं पततां नरके च यत् ।। ११ ।।
स्वर्गस्य च गुणान् कृत्स्नान् दोषान् सर्वांश्च भारत ।
वेदवादेऽपि ये दोषा गुणा ये चापि वैदिकाः ।। १२ ।।
ज्ञानयोगे च ये दोषा गुणा योगे च ये नृप ।
सांख्यज्ञाने च ये दोषास्तथैव च गुणा नृप ।। १३ ।।
सत्त्वं दशगुणं ज्ञात्वा रजो नवगुणं तथा ।
तमश्चाष्टगुणं ज्ञात्वा बुद्धिं सप्तगुणां तथा ।। १४ ।।
षड्गुणं च मनो ज्ञात्वा नभः पञ्चगुणं तथा ।
बुद्धिं चतुर्गुणां ज्ञात्वा तमश्च त्रिगुणं तथा ।। १५ ।।
द्विगुणं च रजो ज्ञात्वा सत्त्वमेकगुणं पुनः ।
मार्गं विज्ञाय तत्त्वेन प्रलये प्रेक्षणे तथा ।। १६ ।।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः कारणैर्भाविताः शुभाः ।
प्राप्नुवन्ति शुभं मोक्षं सूक्ष्मा इव नभः परम् ।। १७ ।।

वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! जो ज्ञानके द्वारा मनुष्य, पिशाच, राक्षस, यक्ष, सर्प, गन्धर्व, पितर, तिर्यग्योनि, गरुड़, मरुद्गण, राजर्षि, ब्रह्मर्षि, असुर, विश्वेदेव, देवर्षि, योगी, प्रजापति तथा ब्रह्माजीके भी सम्पूर्ण दुर्जय विषयोंको सदोष जानकर, संसारके मनुष्योंका परमायुकाल तथा सुखके परमतत्त्वका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और विषयोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको समय-समयपर जो दुःख प्राप्त होता है, उसको, तिर्यग्योनि और नरकमें पड़नेवाले जीवोंके दुःखोंको, स्वर्ग तथा वेदकी फल-श्रुतियोंके सम्पूर्ण गुण-दोषोंको जानकर ज्ञानयोग, सांख्यज्ञान और योगमार्गके गुण-दोषोंको भी समझ लेते हैं तथा भरतनन्दन! सत्त्वगुणके दस¹, रजोगुणके नौ², तमोगुणके आठ³, बुद्धिके सात४, मनके छः¹ और आकाशके पाँच३ गुणोंका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिके दूसरे चार³, तमोगुणके दूसरे तीन४, रजोगुणके दूसरे दो५ और सत्त्वगुणके पुनः एक६ गुणको जानकर आत्माकी प्राप्ति करानेवाले मार्ग—प्राकृत प्रलय तथा आत्मविचारको ठीक-ठीक जान लेते हैं, वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा मोक्षोपयोगी साधनोंके अनुष्ठानसे शुद्धचित्त हुए कल्याणमय सांख्ययोगी परम आकाशको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्म भूतोंके समान मंगलमय मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं ।। ५-१७ ।।

रूपेण दृष्टिं संयुक्तां घ्राणं गन्धगुणेन च ।

शब्दे सक्तं तथा श्रोत्रं जिह्वा रसगुणेषु च ॥ १८ ॥ नेत्र रूप-गुणसे संयुक्त हैं। घ्राणेन्द्रिय गन्ध नामक गुणसे सम्बन्ध रखती है। श्रोत्रेन्द्रिय शब्दमें आसक्त है और रसना रसगुणमें ॥ १८ ॥

तनुं स्पर्शे तथा सक्तां वायुं नभसि चाश्रितम् । मोहं तमसि संयुक्तं लोभमर्थेषु संश्रितम् ॥ १९ ॥ त्वचा स्पर्शनामक गुणमें आसक्त है। इसी प्रकार वायुका आश्रय आकाश, मोहका आश्रय तमोगुण और लोभका आश्रय इन्द्रियोंके विषय हैं ॥ १९ ॥

विष्णुं क्रान्ते बले शक्रं कोष्ठे सक्तं तथानलम् । अप्सु देवीं समाासक्तामपस्तेजसि संश्रिताः ॥ २० ॥ तेजो वायौ तु संसक्तं वायुं नभसि चाश्रितम् । नभो महति संयुक्तं महद् बुद्धौ च संश्रितम् ॥ २१ ॥ गतिका आधार विष्णु, बलका इन्द्र, उदरका अग्नि तथा पृथ्वीदेवीका आधार जल है। जलका तेज, तेजका वायु, वायुका आकाश, आकाशका आश्रय महत्तत्त्व अर्थात् महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है और अहंकारका अधिष्ठान समष्टि बुद्धि है ॥ २०-२१ ॥

बुद्धिं तमसि संसक्तां तमो रजसि संश्रितम् । रजः सत्त्वे तथा सक्तं सत्त्वं सक्तं तथाऽऽत्मनि ॥ २२ ॥ सक्तमात्मानमीशे च देवे नारायणो तथा । देवं मोक्षे च संसक्तं मोक्षं सक्तं तु न क्वचित् ॥ २३ ॥ बुद्धिका आश्रय तमोगुण, तमोगुणका आश्रय रजोगुण और रजोगुणका आश्रय सत्त्वगुण है। सत्त्वगुण जीवात्माके आश्रित है। जीवात्माको भगवान् नारायण-देवके आश्रित समझो। भगवान् नारायणका आश्रय है मोक्ष (परब्रह्म), परंतु मोक्षका कोई भी आश्रय नहीं है (वह अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है) ॥ २२-२३ ॥

ज्ञात्वा सत्त्वगुणं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः । स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा देहसमाश्रिते ॥ २४ ॥ मध्यस्थमेकमात्मानं पापं यस्मिन् न विद्यते । द्वितीयं कर्म विज्ञाय नृपते विषयैषिणाम् ॥ २५ ॥ इन बातोंको भलीभाँति जानकर तथा सत्त्वगुणको, मनसहित ग्यारह इन्द्रिय, पाँच प्राण-इन सोलह गुणोंसे घिरे हुए सूक्ष्म शरीरको, शरीरके आश्रित रहनेवाले स्वभाव और चेतनाको जाने। नरेश्वर! जिसमें पापका लेश भी नहीं है, वह एकमात्र जीवात्मा शरीरके भीतर हृदयरूपी गुफामें उदासीन-भावसे विद्यमान है, इस बातको जाने। विषयकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंका जो कर्म है, वह शरीरके भीतर आत्माके अतिरिक्त दूसरा तत्त्व है। यह भी अच्छी तरह जान ले ॥ २५ ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च सर्वानात्मनि संश्रितान् ।

दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् ॥ २६ ॥ इन्द्रिय और इन्द्रियोंके विषय—ये सब-के-सब शरीरके भीतर स्थित हैं। मोक्ष परम दुर्लभ वस्तु है। इन सब बातोंको वेदोंके स्वाध्यायपूर्वक भलीभाँति समझ ले ॥

प्राणापानौ समानं च व्यानोदानौ च तत्त्वतः । अधश्चैवानिलं ज्ञात्वा प्रवहं चानिलं पुनः ॥ २७ ॥ सप्त वातांस्तथा ज्ञात्वा सप्तधा विहितान् पुनः । प्रजापतीनृषींश्चैव मार्गांश्चैव बहून् वरान् ॥ २८ ॥ प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच प्राणवायु हैं। अधोगामी वायु छठा और ऊर्ध्वगामी प्रवह नामक वायु सातवाँ है। ये वायुके जो सात भेद हैं, इनमेंसे प्रत्येकके सात-सात भेद और हो जाते हैं। इस प्रकार कुल उन्चास वायु होते हैं। अनेक प्रजापति, अनेक ऋषि तथा मुक्तिके अनेकानेक उत्तम मार्ग हैं। इन सबकी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥

सप्तर्षींश्च बहून् ज्ञात्वा राजर्षींश्च परंतप । सुरर्षीन् महतश्चान्यान् ब्रह्मर्षीन् सूर्यसंनिभान् ॥ २९ ॥ परंतप! सप्तर्षियों, बहुसंख्यक राजर्षियों, देवर्षियों, अन्यान्य महापुरुषों तथा सूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंका भी ज्ञान प्राप्त करे ॥ २९ ॥

ऐश्वर्याच्च्यावितान् दृष्ट्वा कालेन महता नृप । महतां भूतसंघानां श्रुत्वा नाशं च पार्थिव ॥ ३० ॥ गतिं चाप्यशुभां ज्ञात्वा नृपते पापकर्मिणाम् । वैतरण्यां च यद् दुःखं पतितानां यमक्षये ॥ ३१ ॥ पृथ्वीनाथ! महान् कालकी प्रेरणासे मनुष्य ऐश्वर्यसे भ्रष्ट कर दिये जाते हैं। बड़े-बड़े जो भूत-समुदाय हैं, उनका भी कालके द्वारा नाश हो जाता है। यह सब देख-सुनकर पापकर्मों मनुष्योंको जो अशुभ गति प्राप्त होती है तथा यमलोकमें जाकर वैतरणी नदीमें गिरे हुए प्राणियोंको जो दुःख होता है, उसको भी जाने ॥ ३१ ॥

योनीषु च विचित्रासु संसारानशुभांस्तथा । जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने ॥ ३२ ॥ श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते । शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे ॥ ३३ ॥ शिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ । विज्ञाय हितमात्मानं योगांश्च विविधान् नृप ॥ ३४ ॥ प्राणियोंको विचित्र-विचित्र योनियोंमें अशुभ जन्म धारण करने पड़ते हैं। रक्त और मूत्रके पात्ररूप अपवित्र गर्भाशयमें निवास करना पड़ता है, जहाँ कफ, मूत्र और मल भरा होता है तथा तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त रहती है, जो रज और वीर्यका समुदायमात्र है, मज्जा एवं

स्नायुका संग्रह है, सैकड़ों नस-नाड़ियोंमें व्याप्त है तथा जिसमें नौ द्वार हैं; उस अपवित्र पुर अर्थात् शरीरमें जीवको रहना पड़ता है। नरेश्वर! इन सब बातोंको जानकर अपने परम हितस्वरूप आत्माको और उसकी प्राप्तिके लिये शास्त्रोंद्वारा बताये हुए नाना प्रकारके योगों (साधनों) की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ ३२-३४ ॥

तामसानां च जन्तूनां रमणीयावृतात्मनाम् । सात्त्विकानां च जन्तूनां कुत्सितं भरतर्षभ ॥ ३५ ॥ गर्हितं महतामर्थे सांख्यानां विदितात्मनाम् । भरतश्रेष्ठ! तामस, राजस और सात्त्विक—इन तीन प्रकारके प्राणियोंके जो तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषोंद्वारा निन्दित मोक्षविरोधी व्यवहार हैं, उनको भी जानना चाहिये ॥

उपप्लवांस्तथा घोरान् शशिनस्तेजसस्तथा ॥ ३६ ॥ ताराणां पतनं दृष्ट्वा नक्षत्राणां च पर्ययम् । द्वन्द्वानां विप्रयोगं च विज्ञाय कृपणं नृप ॥ ३७ ॥ नरेश्वर! घोर उत्पात, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, ताराओंका टूटकर गिरना, नक्षत्रोंकी गतिमें उलट-फेर होना तथा पति-पत्नियोंका दुःखदायक वियोग होना आदि बातें, जो इस जगत्में घटित होती हैं, उनको भी जानकर अपने कल्याणका उपाय करना चाहिये ॥ ३६-३७ ॥

अन्योन्यभक्षणं दृष्ट्वा भूतानामपि चाशुभम् । बाल्ये मोहं च विज्ञाय क्षयं देहस्य चाशुभम् ॥ ३८ ॥ रागे मोहे च सम्प्राप्ते क्वचित् सत्त्वं समाश्रितम् । सहस्रेषु नरः कश्चिन्मोक्षबुद्धिं समाश्रितः ॥ ३९ ॥ संसारके प्राणी एक-दूसरेको खा जाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है। इसपर दृष्टिपात करो। बाल्यावस्थामें मनपर मोह छाया रहता है और वृद्धावस्थामें शरीरका अमंगलकारी विनाश उपस्थित होता है। राग और मोह प्राप्त होनेपर अनेक दोष उत्पन्न होते हैं, इन सबको जानकर कहीं किसी-किसीको ही सत्त्वगुणसे युक्त देखा जाता है। सहस्रों मनुष्योंमेंसे कोई बिरला ही मोक्षविषयक बुद्धिका आश्रय लेता है ॥ ३८-३९ ॥

दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् । बहुमानमलब्धेषु लब्धे मध्यस्थतां पुनः ॥ ४० ॥ वेद-वाक्योंके श्रवणद्वारा मुक्तिकी दुर्लभताको जानकर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न होनेपर भी उस परिस्थितिके प्रति अधिक आदर-बुद्धि रखे और मनोवांछित वस्तु प्राप्त हो जाय, तो भी उसकी ओरसे उदासीन ही रहे ॥ ४० ॥

विषयाणां च दौरात्म्यं विज्ञाय नृपते पुनः । गतासूनां च कौन्तेय देहान् दृष्ट्वा तथाशुभान् ॥ ४१ ॥ नरेश्वर! शब्द-स्पर्श आदि विषय दुःखरूप ही हैं, इस बातको जाने। कुन्तीनन्दन! जिनके प्राण चले जाते हैं, उन मनुष्योंके शरीरोंकी जो अशुभ एवं बीभत्स दशा होती है,

उसपर भी दृष्टिपात करे ।। ४१ ।।

वासं कुलेषु जन्तूनां दुःखं विज्ञाय भारत ।

ब्रह्मघ्नानां गतिं ज्ञात्वा पतितानां सुदारुणाम् ।। ४२ ।।

भरतनन्दन प्राणियोंका घरोंमें निवास करना भी दुःखरूप ही है, इस बातको अच्छी

तरह समझे तथा ब्रह्मघाती और पतित मनुष्योंकी जो अत्यन्त भयंकर दुर्गति होती है,

उसको भी जाने ।। ४२ ।।

सुरापाने च सक्तानां ब्राह्मणानां दुरात्मनाम् ।

गुरुदारप्रसक्तानां गतिं विज्ञाय चाशुभाम् ।। ४३ ।।

मदिरापानमें आसक्त दुरात्मा ब्राह्मणोंकी तथा गुरुपत्नीगामी मनुष्योंकी जो अशुभ गति

होती है, उसका भी विचार करे ।। ४३ ।।

जननीषु च वर्तन्ते ये न सम्यग् युधिष्ठिर ।

सदेवकेषु लोकेषु ये न वर्तन्ति मानवाः ।। ४४ ।।

तेन ज्ञानेन विज्ञाय गतिं चाशुभकर्मणाम् ।

तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय गतयः पृथक् ।। ४५ ।।

युधिष्ठिर! जो मनुष्य माताओं, देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंके प्रति उत्तम बर्ताव नहीं

करते हैं, उनकी दुर्गतिका ज्ञान जिससे होता है, उसी ज्ञानसे पापाचारी पुरुषोंकी

अधोगतिका ज्ञान प्राप्त करे तथा तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी जो विभिन्न गतियाँ होती

हैं, उनको भी जान ले ।।४४-४५ ।।

वेदवादांस्तथा चित्रानृतूनां पर्यायांस्तथा ।

क्षयं संवत्सराणां च मासानां च क्षयं तथा ।। ४६ ।।

पक्षक्षयं तथा दृष्ट्वा दिवसानां च संक्षयम् ।

क्षयं वृद्धिं च चन्द्रस्य दृष्ट्वा प्रत्यक्षतस्तथा ।। ४७ ।।

वृद्धिं दृष्ट्वा समुद्राणां क्षयं तेषां तथा पुनः ।

क्षयं धनानां दृष्ट्वा च पुनर्वृद्धिं तथैव च ।। ४८ ।।

वेदोंके भाँति-भाँतिके विचित्र वचन, ऋतुओंके परिवर्तन तथा दिन, पक्ष, मास और

संवत्सर आदि काल जो प्रतिक्षण बीत रहा है, उसकी ओर भी ध्यान दे। चन्द्रमाकी

ह्रासवृद्धि तो प्रत्यक्ष दिखायी देती है। समुद्रोंका ज्वारभाटा भी प्रत्यक्ष ही है। धनवानोंके

धनका नाश और नाशके बाद पुनः वृद्धिका क्रम भी दृष्टिगोचर होता ही रहता है। इन

सबको देखकर अपने कर्तव्यका निश्चय करे ।। ४६—४८ ।।

संयोगानां क्षयं दृष्ट्वा युगानां च विशेषतः ।

क्षयं च दृष्ट्वा शैलानां क्षयं च सरितां तथा ।। ४९ ।।

वर्णानां च क्षयं दृष्ट्वा क्षयान्तं च पुनः पुनः ।

जरामृत्युं तथा जन्म दृष्ट्वा दुःखानि चैव ह ।। ५० ।।

संयोगोंका, युगोंका, पर्वतोंका और सरिताओंका जो क्षय होता है, उसपर दृष्टि डाले। वर्णोंका क्षय और क्षयका अन्त भी बारंबार देखे। जन्म, मृत्यु और जरावस्थाके दुःखोंपर दृष्टिपात करे ॥ ४९-५० ॥ देहदोषांस्तथा ज्ञात्वा तेषां दुःखं च तत्त्वतः ।
देहविकलवतां चैव सम्यग् विज्ञाय तत्त्वतः ॥ ५१ ॥
देहके दोषोंको जानकर उनसे मिलनेवाले दुःखका भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे। शरीरकी व्याकुलताको भी ठीक-ठीक जाननेका प्रयत्न करे ॥ ५१ ॥
आत्मदोषांश्च विज्ञाय सर्वान्नात्मनि संश्रितान् ।
स्वदेहादुत्थितान् गन्धांस्तथा विज्ञाय चाशुभान् ॥ ५२ ॥
अपने शरीरमें स्थित जो अपने ही दोष हैं, उन सबको जानकर शरीरसे जो निरन्तर दुर्गन्ध उठती रहती है, उसकी ओर भी ध्यान दे (तथा विरक्त होकर परमात्माका चिन्तन करते हुए भवबन्धनसे मुक्त होनेका प्रयत्न करे) ॥ ५२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कान् स्वगात्रोद्द्भवान् दोषान् पश्यस्यमितविक्रम ।
एतन्मे संशयं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ५३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी पितामह! आपके देखनेमें कौन-कौन-से दोष ऐसे हैं, जो अपने ही शरीरसे उत्पन्न होते हैं? आप मेरे इस सम्पूर्ण संदेहका यथार्थरूपसे समाधान करनेकी कृपा करें ॥ ५३ ॥

भीष्म उवाच

पञ्च दोषान् प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः ।
मार्गज्ञाः कापिलाः सांख्याः शृणु तानरिसूदन ॥ ५४ ॥
भीष्मजीने कहा— प्रभो! शत्रुसूदन! कपिल सांख्यमतके अनुसार चलनेवाले उत्तम मार्गोंके ज्ञाता मनीषी पुरुष इस देहके भीतर पाँच दोष बतलाते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ५४ ॥
कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते ।
एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम् ॥ ५५ ॥
काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्वास—ये पाँच दोष समस्त देहधारियोंके शरीरोंमें देखे जाते हैं ॥ ५५ ॥
छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात् ।
सत्त्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद् भयं तथा ॥ ५६ ॥
छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासमल्पाहारतया नृप ॥ ५७ ॥

सत्पुरुष क्षमासे क्रोधका, संकल्पके त्यागसे कामका, सत्त्वगुणके सेवनसे निद्राका, प्रमादके त्यागसे भयका तथा अल्पाहारके सेवनद्वारा पाँचवें श्वास-दोषका नाश करते हैं ।। ५६-५७ ।।

गुणान् गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान् दोषशतैरपि ।
हेतून् हेतुशतैश्चित्रैश्छित्रान् विज्ञाय तत्त्वतः ।। ५८ ।।
अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्मायाशतैर्वृतम् ।
चित्रभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ।। ५९ ।।
तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षबुद्बुदसंनिभम् ।
नाशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमिहावशम् ।। ६० ।।
रजस्तमसि सम्मग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् ।
सांख्या राजन् महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा स्नेहं प्रजाकृतम् ।। ६१ ।।
ज्ञानयोगेन सांख्येन व्यापिना महता नृप ।
राजसानशुभान् गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् ।। ६२ ।।
पुण्यांश्च सात्त्विकान् गन्धान् स्पर्शजान् देहसंश्रितान् ।
छित्त्वाऽऽशु ज्ञानशस्त्रेण तपोदण्डेन भारत ।। ६३ ।।

राजन्! भरतनन्दन! महाबुद्धिमान् सांख्यके विद्वान् सैकड़ों गुणोंके द्वारा गुणोंको, सैकड़ों दोषोंके द्वारा दोषोंको तथा सैकड़ों विचित्र हेतुओंसे विचित्र हेतुओंको तत्त्वतः जानकर व्यापक ज्ञानके प्रभावसे संसारको पानीके फेनके समान नश्वर, विष्णुकी सैकड़ों मायाओंसे ढँका हुआ, दीवारपर बने हुए चित्रके समान, नरकुलके समान सारहीन, अन्धकारसे भरे हुए गड्ढेकी भाँति भयंकर, वर्षाकालके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभंगुर, सुखहीन, पराधीन, नष्टप्राय तथा कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह रजोगुण और तमोगुणमें मग्न समझते हैं। इसलिये वे संतान आदिकी आसक्तिको दूर करके तपरूप दण्डसे युक्त विवेकरूपी शस्त्रसे राजस-तामस अशुभ गन्धोंको और सुन्दर शोभनीय सात्त्विक गन्धोंको तथा स्पर्शेन्द्रियके देहाश्रित भोगोंकी आसक्तिको शीघ्र ही काट डालते हैं ।। ५८—६३ ।।

ततो दुःखोदकं घोरं चिन्ताशोकमहाह्रदम् ।
व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभयमहोरगम् ।। ६४ ।।
तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञया संतरन्त्युत ।
स्नेहपङ्कं जरादुर्गं ज्ञानद्वीपमरिंदम ।। ६५ ।।
कर्मगाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमरिंदम ।
हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारससमाकरम् ।। ६६ ।।
नानाप्रीतिमहारत्नं दुःखज्वरसमीरणम् ।
शोकत्तृष्णामहावर्तं तीक्ष्णव्याधिमहागजम् ।। ६७ ।।

अस्थिसंघातसंघट्टं श्लेष्मफेनमरिंदम ।
दानमुक्ताकरं घोरं शोणितह्रदविद्रुमम् ॥ ६८ ॥
हसितोत्क्रुष्टनिर्घोषं नानाज्ञानसुदुस्तरम् ।
रोदनाश्रुमलक्षारं संगत्यागपरायणम् ॥ ६९ ॥
पुत्रदारजलौकौघं मित्रबान्धवपत्तनम् ।
अहिंसासत्यमर्यादं प्राणत्यागमहोर्मिणम् ॥ ७० ॥
वेदान्तगमनद्वीपं सर्वभूतदयोदधिम् ।
मोक्षदुर्लभविषयं वडवामुखसागरम् ॥ ७१ ॥
तरन्ति यतयः सिद्धा ज्ञानयानेन भारत ।
तीर्त्वातिदुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभः ॥ ७२ ॥

शत्रुसूदन! तदनन्तर वे सिद्ध यति प्रज्ञारूपी नौकाके द्वारा उस संसाररूपी घोर सागरको तर जाते हैं, जिसमें दुःखरूपी जल भरा है। चिन्ता और शोकके बड़े-बड़े कुण्ड हैं। नाना प्रकारके रोग और मृत्यु विशाल ग्राहोंके समान हैं। महान् भय ही महानागोंके समान हैं। तमोगुण कछुए और रजोगुण मछलियाँ हैं। स्नेह ही कीचड़ है। बुढ़ापा ही उससे पार होनेमें कठिनाई है। ज्ञान ही उसका द्वीप है। नाना प्रकारके कर्मोंद्वारा वह अगाध बना हुआ है। सत्य ही उसका तीर है। नियम-व्रत आदि स्थिरता है। हिंसा ही उसका शीघ्रगामी महान् वेग है। वह नाना प्रकारके रसोंका भण्डार है। अनेक प्रकारकी प्रीतियाँ ही उस भवसागरके महारत्न हैं। दुःख और संताप ही वहाँकी वायु है। शोक और तृष्णाकी बड़ी-बड़ी भँवरें उठती रहती हैं। तीव्र व्याधियाँ उसके भीतर रहनेवाले महान् जलहस्ती हैं। हड्डियाँ ही उसके घाट हैं। कफ फेन हैं। दान मोतियोंकी राशि हैं। रक्त उसके कुण्डमें रहनेवाले मूँगा हैं। हँसना और चिल्लाना ही उस सागरकी गम्भीर गर्जना है। अनेक प्रकारके अज्ञान ही इसे अत्यन्त दुस्तर बनाये हुए हैं। रोदनजनित आँसू ही उसमें मलिन खारे जलके समान हैं। आसक्तियोंका त्याग ही उसमें परम आश्रय या दूसरा तट है। स्त्री-पुत्र जोंकके समान हैं। मित्र और बन्धु-बान्धव तटवर्ती नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमा हैं। प्राणोंका परित्याग ही उसकी उत्ताल तरंगें हैं। वेदान्तज्ञान द्वीप है। समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव इसकी जलराशि हैं। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकारके संताप उस संसारसागरके बड़वानल हैं। भरतनन्दन! उससे पार होकर वे आकाशस्वरूप निर्मल परब्रह्ममें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ६८—७२ ॥

तत्र तान् सुकृतीन् सांख्यान् सूर्यो बहति रश्मिभिः ।
पद्मतन्तुवदाविश्य प्रवहन् विषयान् नृप ॥ ७३ ॥

राजन्! उन पुण्यात्मा सांख्ययोगी सिद्ध पुरुषोंको अपनी रश्मियोंद्वारा उनमें प्रविष्ट हुआ सूर्य अर्चिमार्गसे उस ब्रह्मलोकमें ले जानेके लिये ऊपरके लोकोंमें उसी प्रकार वहन करता है, जैसे कमलकी नाल सरोवरके जलको खींच लेती है ॥ ७३ ॥

तत्र तान् प्रवहो वायुः प्रतिगृह्णाति भारत । वीतरागान् यतीन् सिद्धान् वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ॥ ७४ ॥ वहाँ प्रवहनामक वायु-अभिमानी देवता उन वीतराग शक्तिसम्पन्न सिद्ध तपोधन महापुरुषोंको सूर्य-अभिमानी देवतासे अपने अधिकारमें ले लेता है ॥ ७४ ॥

सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत । सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान् गच्छति यः शुभान् । स तान् वहति कौन्तेय नभसः परमां गतिम् ॥ ७५ ॥ भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, सुखस्पर्श एवं सातों वायुओंमें श्रेष्ठ जो वायुदेव शुभ लोकोंमें जाते हैं, वे फिर उन कल्याणमय सांख्ययोगियोंको आकाशकी ऊँची स्थितिमें पहुँचा देते हैं ॥ ७५ ॥

नभो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् । रजो वहति राजेन्द्र सत्त्वस्य परमां गतिम् ॥ ७६ ॥ सत्त्वं वहति शुद्धात्मन् परं नारायणं प्रभुम् । प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ॥ ७७ ॥ परमात्मानमासाद्य तद्भूतायतनामलाः । अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो ॥ ७८ ॥ लोकेश्वर! आकाशाभिमानी देवता उन योगियोंको रजोगुणकी परमागतितक वहन करता है। अर्थात् तेजोमय विद्युत्-अभिमानी देवताओंके पास पहुँचा देता है। राजेन्द्र! वह रजोगुण अर्थात् विद्युदभिमानी देवता उनको सत्त्वकी परमगतितक अर्थात् जहाँ श्रीनारायणके पार्षदगण उनको लेनेके लिये प्रस्तुत रहते हैं, वहाँतक वहन करता है। शुद्धात्मन्! वहाँसे सत्त्वगुणयुक्त वे भगवान्‌के पार्षद उनको परम प्रभु श्रीनारायणके पास पहुँचा देते हैं। समर्थ राजन्! भगवान् नारायण स्वयं उनको विशुद्ध आत्मा परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट कर देते हैं। परमात्माको पाकर तद्रूप हुए वे निर्मल योगीजन अमृतभावसम्पन्न हो जाते हैं, फिर नहीं लौटते ॥ ७६—७८ ॥

परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् । सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥ ७९ ॥ कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ॥ ७९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः । आजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत न वानघ ॥ ८० ॥ यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ।

त्वदृते पुरुषं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ॥ ८१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— निष्पाप पितामह! स्थिरतापूर्वक श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले वे सांख्ययोगी महात्मा भगवान् नारायणको एवं उत्तम परमात्मपद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेनेपर अपने जन्मसे लेकर मृत्युकके बीते हुए वृत्तान्तको फिर कभी याद करते हैं या नहीं? (मोक्षावस्थामें विशेष-विशेष बातोंका ज्ञान रहता है या नहीं? यही मेरा प्रश्न है।) इस विषयमें जो तथ्य बात है, उसे आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। कुरुनन्दन! आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषसे मैं ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ ८०-८१ ॥
मोक्षे दोषो महानेष प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन् ।
यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे ॥ ८२ ॥
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप ।
मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं नु दुःखतरं भवेत् ॥ ८३ ॥
सिद्धावस्थाको प्राप्त ऋषियोंके लिये मोक्षमें यह एक बड़ा दोष प्रतीत होता है। वह यह कि यदि मोक्ष प्राप्त होनेपर भी वे यतिलोग विशेष ज्ञानमें ही विचरण करते हैं अर्थात् उनको पहलेकी स्मृति रहती है, तब तो मैं प्रवृत्तिरूप धर्मको ही सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। यदि कहें, मुक्तावस्थामें विशेष विज्ञानका अनुभव नहीं होता तब तो उस परम ज्ञानमें डूब जानेपर विशेष जानकारीका अभाव हो जाता है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता सकता है? ॥ ८२-८३ ॥

<div align="center">भीष्म उवाच</div>

यथान्यायं त्वया तात प्रश्नः पृष्टः सुसंकटः ।
बुधानामपि सम्मोहः प्रश्नेऽस्मिन् भरतर्षभ ॥ ८४ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! भरतश्रेष्ठ! तुमने यथोचित रीतिसे यह बहुत ही जटिल प्रश्न उपस्थित किया। इस प्रश्नपर विचार करते समय बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ॥ ८४ ॥
अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ् मयेरितम् ।
बुद्धिश्च परमा यत्र कापिलानां महात्मनाम् ॥ ८५ ॥
इस विषयमें भी जो परम तत्त्व है, उसे मैं भलीभाँति बता रहा हूँ, सुनो। यहाँ कपिलजीके द्वारा प्रतिपादित सांख्यमतका अनुसरण करनेवाले महात्मा पुरुषोंका जो उत्तम विचार है, वही प्रस्तुत किया जाता है ॥ ८५ ॥
इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप ।
कारणान्यात्मनस्तानी सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥ ८६ ॥
नरेश्वर! देहधारियोंके अपने-अपने शरीरमें जो इन्द्रियाँ हैं, वे ही विशेष-विशेष विषयोंको देखती या अनुभव करती हैं; वे ही आत्माको विभिन्न ज्ञान करानेमें कारण हैं;

क्योंकि वह सूक्ष्म आत्मा उन इन्द्रियोंद्वारा ही बाह्य विषयोंका दर्शन या प्रकाशन करता है (मुक्तावस्थामें मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध न रहनेके कारण ही उसमें इन्द्रियजनित विशेष ज्ञानका अभाव देखा जाता है) ।। ८६ ।।

आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु । विनश्यन्ति न संदेहः फेना इव महार्णवे ।। ८७ ।। जैसे महासागरमें उठे हुए फेन नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर मनुष्यकी काठ और दीवारकी भाँति जड इन्द्रियाँ प्रकृतिमें विलीन हो जाती हैं, इसमें संदेह नहीं है ।। ८७ ।।

इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन । सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ।। ८८ ।। शत्रुओंको ताप देनेवाले नरेश! जब शरीरधारी प्राणी इन्द्रियोंसहित निद्रित हो जाता है, तब उसका सूक्ष्मशरीर आकाशमें वायुके समान सर्वत्र विचरण करने लगता है अर्थात् स्वप्न देखने लगता है ।। ८८ ।।

स पश्यति यथान्यायं स्पर्शान् स्पृशति वा विभो । बुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ।। ८९ ।। प्रभो! भरतनन्दन! वह जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति स्वप्नमें भी यथोचित रीतिसे दृश्य वस्तुओंको देखता है तथा स्पृश्य पदार्थोंका स्पर्श करता है। सारांश यह कि सम्पूर्ण विषयोंका वह जाग्रत्के समान ही अनुभव करता है ।। ८९ ।।

इन्द्रियाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि । अनीशत्वात् प्रलीयन्ते सर्पा हतविषा इव ।। ९० ।। फिर सुषुप्ति-अवस्था होनेपर विषय-ज्ञानमें असमर्थ हुई सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थानमें उसी प्रकार विधिवत् लीन हो जाती हैं, जैसे विषहीन सर्प (भयसे) छिपे रहते हैं ।। ९० ।।

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां स्वस्थानेष्वेव सर्वशः । आक्रम्य गतयः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशयः ।। ९१ ।। स्वप्नावस्थामें अपने-अपने स्थानोंमें स्थित हुई सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी समस्त गतियोंको आक्रान्त करके जीवात्मा सूक्ष्म विषयोंमें विचरण करता है, इसमें संदेह नहीं है ।। ९१ ।।

सत्त्वस्य च गुणान् कृत्स्नान् रजसश्च गुणान् पुनः । गुणांश्च तमसः सर्वान् गुणान् बुद्धेश्च भारत ।। ९२ ।। गुणांश्च मनसश्चापि नभसश्च गुणांश्च सः । गुणान् वायोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान् पुनः ।। ९३ ।। अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि । सर्वाण्येव गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञेषु युधिष्ठिर ।। ९४ ।।

मनोऽनु याति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे । शिष्या इव महात्मानमिन्द्रियाणि च तं प्रभो ॥ ९५ ॥ प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् । परं नारायणात्मानं निर्द्वन्द्वं प्रकृतेः परम् ॥ ९६ ॥ भरतनन्दन! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर! परब्रह्म परमात्मा सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको एवं बुद्धि, मन, आकाश, वायु, तेज, जल, और पृथ्वी-इन सबके सम्पूर्ण गुणोंको तथा अन्य सब वस्तुओंको भी अपने गुणोंद्वारा व्याप्त करके सभी क्षेत्रज्ञों (जीवात्माओं) में स्थित हैं, प्रभो! जैसे शिष्य अपने गुरुके पीछे चलते हैं, उसी प्रकार मन, इन्द्रियाँ और शुभाशुभ कर्म भी उस जीवात्माके पीछे-पीछे चलते हैं। जब जीवात्मा इन्द्रियों और प्रकृतिको भी लाँघकर जाता है, तब उस नारायणस्वरूप अविनाशी परमात्माको प्राप्त हो जाता है, जो द्वन्द्वरहित और मायासे अतीत है ॥ ९२—९६ ॥

विमुक्तः पुण्यपापेभ्यः प्रविष्टस्तमनामयम् । परमात्मानमगुणं न निवर्तति भारत ॥ ९७ ॥ भारत! पुण्य-पापसे रहित हुआ सांख्ययोगी मुक्त होकर जब उन्हीं निर्गुण-निर्विकार नारायणस्वरूप परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है, फिर वह इस संसारमें नहीं लौटता है ॥ ९७ ॥

शिष्टं तत्र मनस्तात इन्द्रियाणि च भारत । आगच्छन्ति यथाकालं गुरोः संदेशकारिणः ॥ ९८ ॥ भरतनन्दन! इस प्रकार जीवन्मुक्त पुरुषका आत्मा तो परमात्मामें मिल जाता है, परंतु प्रारब्धवश जबतक शरीर रहता है, तबतक उसके मन और इन्द्रियाँ शेष रहते हैं और गुरुके आदेश पालन करनेवाले शिष्योंके समान यथासमय यहाँ गमनागमन करते हैं ॥ ९८ ॥

शक्यं चाल्पेन कालेन शान्तिं प्राप्तुं गुणार्थिना । एवमुक्तेन कौन्तेय युक्तज्ञानेन मोक्षिणा ॥ ९९ ॥ कुन्तीनन्दन! इस प्रकार बताये हुए ज्ञानसे सम्पन्न मोक्षाधिकारी तथा आध्यात्मिक उन्नतिकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष थोड़े ही समयमें परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ॥ ९९ ॥

सांख्या राजन् महाप्राज्ञा गच्छन्ति परमां गतिम् । ज्ञानेनानेन कौन्तेय तुल्यं ज्ञानं न विद्यते ॥ १०० ॥ राजन्! कुन्तीकुमार! महाज्ञानी सांख्ययोगी ऊपर बताए हुए इसी परमगतिको प्राप्त होते हैं। इस ज्ञानके समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है ॥ १०० ॥

अत्र ते संशयो मा भूज्ज्ञानं सांख्यं परं मतम् । अक्षरं ध्रुवमेवोक्तं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ १०१ ॥

सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया है। इस विषयमें तुम्हें तनिक भी संशय नहीं होना चाहिये। इसमें अक्षर, ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्मका ही प्रतिपादन हुआ है ॥ १०१ ॥ अनादिमध्यनिधनं निर्द्वन्द्वं कर्तृ शाश्वतम् । कूटस्थं चैव नित्यं च यद् वदन्ति मनीषिणः ॥ १०२ ॥ वह ब्रह्म आदि, मध्य और अन्तसे रहित, निर्द्वन्द्व, जगत्की उत्पत्तिका हेतुभूत, शाश्वत, कूटस्थ और नित्य है, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ १०२ ॥ यतः सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यच्च शंसन्ति शास्त्रेषु वदन्ति परमर्षयः ॥ १०३ ॥ संसारकी सृष्टि और प्रलयरूप सारे विकार उसीसे सम्भव होते हैं। महर्षि अपने शास्त्रोंमें उसीकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०३ ॥ सर्वे विप्राश्च देवाश्च तथा शमविदो जनाः । ब्रह्माणं परमं देवमनन्तं परमच्युतम् ॥ १०४ ॥ प्रार्थयन्तश्च तं विप्रा वदन्ति गुणबुद्धयः । सम्यग्युक्तास्तथा योगाः सांख्याश्चामितदर्शनाः ॥ १०५ ॥ समस्त ब्राह्मण, देवता और शान्तिका अनुभव करनेवाले लोग उसी अनन्त, अच्युत, ब्राह्मणहितैषी तथा परमदेव परमात्माकी स्तुति-प्रार्थना करते हैं। उनके गुणोंका चिन्तन करते हुए उनकी महिमाका गान करते हैं। योगमें उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए योगी तथा अपार ज्ञानवाले सांख्यवेत्ता पुरुष भी उसीके गुण गाते हैं ॥ अमूर्तस्तस्य कौन्तेय सांख्यं मूर्तिरिति श्रुतिः । अभिज्ञानानि तस्याहुर्मतं हि भरतर्षभ ॥ १०६ ॥ कुन्तीनन्दन! ऐसी प्रसिद्धि है कि यह सांख्यशास्त्र ही उस निराकार परमात्माका आकार है। भरतश्रेष्ठ! जितने ज्ञान हैं, वे सब सांख्यकी ही मान्यताका प्रतिपादन करते हैं ॥ १०६ ॥ द्विविधानीह भूतानि पृथिव्यां पृथिवीपते । जङ्गमागमसंज्ञानि जङ्गमं तु विशिष्यते ॥ १०७ ॥ पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर स्थावर और जंगम—दो प्रकारके प्राणी उपलब्ध होते हैं। उनमें भी जंगम ही श्रेष्ठ है ॥ १०७ ॥ ज्ञानं महद् यद्धि महत्सु राजन् वेदेषु सांख्येषु तथैव योगे । यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणे सांख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ॥ १०८ ॥ राजन्! नरेश्वर! महात्मा पुरुषोंमें, वेदोंमें, सांख्यों (दर्शनों) में, योगशास्त्रमें तथा पुराणोंमें जो नाना प्रकारका उत्तम ज्ञान देखा जाता है, वह सब सांख्यसे ही आया हुआ

है ।। १०८ ।। यच्चेतिहासेषु महत्सु दृष्टं यच्चार्थशास्त्रे नृप शिष्टजुष्टे । ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन् ।। १०९ ।। नरेश! महात्मन्! बड़े-बड़े इतिहासोंमें, सत्पुरुषों-द्वारा सेवित अर्थशास्त्रमें तथा इस संसारमें जो कुछ भी महान् ज्ञान देखा गया है, वह सब सांख्यसे ही प्राप्त हुआ है ।। १०९ ।। शमश्च दृष्टः परमं बलं च ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् । तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव सांख्ये यथावद् विहितानि राजन् ।। ११० ।। राजन्! प्रत्यक्ष प्राप्त मन और इन्द्रियोंका संयम, उत्तम बल, सूक्ष्मज्ञान तथा परिणाममें सुख देनेवाले जो सूक्ष्म तप बतलाये गये हैं, उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है ।। ११० ।। विपर्यये तस्य हि पार्थ देवान् गच्छन्ति सांख्याः सततं सुखेन । तांश्चानुसंचार्य ततः कृतार्थाः पतन्ति विप्रेषु यतेषु भूयः ।। १११ ।। कुन्तीकुमार! यदि साधनमें कुछ त्रुटि रह जानेके कारण सांख्यका सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ हो तो भी सांख्ययोगके साधक देवलोकमें अवश्य जाते हैं और वहाँ निरन्तर सुखसे रहते हुए देवताओंका आधिपत्य पाकर कृतार्थ हो जाते हैं। तदनन्तर पुण्यक्षयके पश्चात् वे इस लोकमें आकर पुनः साधनके लिये यत्नशील ब्राह्मणोंके यहाँ जन्म ग्रहण करते हैं ।। १११ ।। हित्वा च देहं प्रविशन्ति देवं दिवौकसो द्यामिव पार्थ सांख्याः । अतोऽधिकं तेऽभिरता महार्हे सांख्ये द्विजाः पार्थिव शिष्टजुष्टे ।। ११२ ।। पार्थ! सांख्यज्ञानी शरीर-त्यागके पश्चात् परमदेव परमात्मामें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे देवता स्वर्गमें। पृथ्वीनाथ! अतः शिष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित परम पूजनीय सांख्यशास्त्रमें वे सभी द्विज अधिक अनुरक्त रहते हैं ।। ११२ ।। तेषां न तिर्यग्गमनं हि दृष्टं नार्वाग्गतिः पापकृताधिवासः ।