भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1995

क्योंकि वह सूक्ष्म आत्मा उन इन्द्रियोंद्वारा ही बाह्य विषयोंका दर्शन या प्रकाशन करता है (मुक्तावस्थामें मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध न रहनेके कारण ही उसमें इन्द्रियजनित विशेष ज्ञानका अभाव देखा जाता है) ।। ८६ ।।

आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु । विनश्यन्ति न संदेहः फेना इव महार्णवे ।। ८७ ।। जैसे महासागरमें उठे हुए फेन नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर मनुष्यकी काठ और दीवारकी भाँति जड इन्द्रियाँ प्रकृतिमें विलीन हो जाती हैं, इसमें संदेह नहीं है ।। ८७ ।।

इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन । सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ।। ८८ ।। शत्रुओंको ताप देनेवाले नरेश! जब शरीरधारी प्राणी इन्द्रियोंसहित निद्रित हो जाता है, तब उसका सूक्ष्मशरीर आकाशमें वायुके समान सर्वत्र विचरण करने लगता है अर्थात् स्वप्न देखने लगता है ।। ८८ ।।

स पश्यति यथान्यायं स्पर्शान् स्पृशति वा विभो । बुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ।। ८९ ।। प्रभो! भरतनन्दन! वह जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति स्वप्नमें भी यथोचित रीतिसे दृश्य वस्तुओंको देखता है तथा स्पृश्य पदार्थोंका स्पर्श करता है। सारांश यह कि सम्पूर्ण विषयोंका वह जाग्रत्के समान ही अनुभव करता है ।। ८९ ।।

इन्द्रियाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि । अनीशत्वात् प्रलीयन्ते सर्पा हतविषा इव ।। ९० ।। फिर सुषुप्ति-अवस्था होनेपर विषय-ज्ञानमें असमर्थ हुई सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थानमें उसी प्रकार विधिवत् लीन हो जाती हैं, जैसे विषहीन सर्प (भयसे) छिपे रहते हैं ।। ९० ।।

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां स्वस्थानेष्वेव सर्वशः । आक्रम्य गतयः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशयः ।। ९१ ।। स्वप्नावस्थामें अपने-अपने स्थानोंमें स्थित हुई सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी समस्त गतियोंको आक्रान्त करके जीवात्मा सूक्ष्म विषयोंमें विचरण करता है, इसमें संदेह नहीं है ।। ९१ ।।

सत्त्वस्य च गुणान् कृत्स्नान् रजसश्च गुणान् पुनः । गुणांश्च तमसः सर्वान् गुणान् बुद्धेश्च भारत ।। ९२ ।। गुणांश्च मनसश्चापि नभसश्च गुणांश्च सः । गुणान् वायोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान् पुनः ।। ९३ ।। अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि । सर्वाण्येव गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञेषु युधिष्ठिर ।। ९४ ।।