महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1994, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वदृते पुरुषं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ॥ ८१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— निष्पाप पितामह! स्थिरतापूर्वक श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले वे सांख्ययोगी महात्मा भगवान् नारायणको एवं उत्तम परमात्मपद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेनेपर अपने जन्मसे लेकर मृत्युकके बीते हुए वृत्तान्तको फिर कभी याद करते हैं या नहीं? (मोक्षावस्थामें विशेष-विशेष बातोंका ज्ञान रहता है या नहीं? यही मेरा प्रश्न है।) इस विषयमें जो तथ्य बात है, उसे आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। कुरुनन्दन! आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषसे मैं ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ ८०-८१ ॥
मोक्षे दोषो महानेष प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन् ।
यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे ॥ ८२ ॥
प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप ।
मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं नु दुःखतरं भवेत् ॥ ८३ ॥
सिद्धावस्थाको प्राप्त ऋषियोंके लिये मोक्षमें यह एक बड़ा दोष प्रतीत होता है। वह यह कि यदि मोक्ष प्राप्त होनेपर भी वे यतिलोग विशेष ज्ञानमें ही विचरण करते हैं अर्थात् उनको पहलेकी स्मृति रहती है, तब तो मैं प्रवृत्तिरूप धर्मको ही सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। यदि कहें, मुक्तावस्थामें विशेष विज्ञानका अनुभव नहीं होता तब तो उस परम ज्ञानमें डूब जानेपर विशेष जानकारीका अभाव हो जाता है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता सकता है? ॥ ८२-८३ ॥
यथान्यायं त्वया तात प्रश्नः पृष्टः सुसंकटः ।
बुधानामपि सम्मोहः प्रश्नेऽस्मिन् भरतर्षभ ॥ ८४ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! भरतश्रेष्ठ! तुमने यथोचित रीतिसे यह बहुत ही जटिल प्रश्न उपस्थित किया। इस प्रश्नपर विचार करते समय बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ॥ ८४ ॥
अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ् मयेरितम् ।
बुद्धिश्च परमा यत्र कापिलानां महात्मनाम् ॥ ८५ ॥
इस विषयमें भी जो परम तत्त्व है, उसे मैं भलीभाँति बता रहा हूँ, सुनो। यहाँ कपिलजीके द्वारा प्रतिपादित सांख्यमतका अनुसरण करनेवाले महात्मा पुरुषोंका जो उत्तम विचार है, वही प्रस्तुत किया जाता है ॥ ८५ ॥
इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप ।
कारणान्यात्मनस्तानी सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥ ८६ ॥
नरेश्वर! देहधारियोंके अपने-अपने शरीरमें जो इन्द्रियाँ हैं, वे ही विशेष-विशेष विषयोंको देखती या अनुभव करती हैं; वे ही आत्माको विभिन्न ज्ञान करानेमें कारण हैं;