महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1993, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र तान् प्रवहो वायुः प्रतिगृह्णाति भारत । वीतरागान् यतीन् सिद्धान् वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ॥ ७४ ॥ वहाँ प्रवहनामक वायु-अभिमानी देवता उन वीतराग शक्तिसम्पन्न सिद्ध तपोधन महापुरुषोंको सूर्य-अभिमानी देवतासे अपने अधिकारमें ले लेता है ॥ ७४ ॥
सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत । सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान् गच्छति यः शुभान् । स तान् वहति कौन्तेय नभसः परमां गतिम् ॥ ७५ ॥ भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, सुखस्पर्श एवं सातों वायुओंमें श्रेष्ठ जो वायुदेव शुभ लोकोंमें जाते हैं, वे फिर उन कल्याणमय सांख्ययोगियोंको आकाशकी ऊँची स्थितिमें पहुँचा देते हैं ॥ ७५ ॥
नभो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् । रजो वहति राजेन्द्र सत्त्वस्य परमां गतिम् ॥ ७६ ॥ सत्त्वं वहति शुद्धात्मन् परं नारायणं प्रभुम् । प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ॥ ७७ ॥ परमात्मानमासाद्य तद्भूतायतनामलाः । अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो ॥ ७८ ॥ लोकेश्वर! आकाशाभिमानी देवता उन योगियोंको रजोगुणकी परमागतितक वहन करता है। अर्थात् तेजोमय विद्युत्-अभिमानी देवताओंके पास पहुँचा देता है। राजेन्द्र! वह रजोगुण अर्थात् विद्युदभिमानी देवता उनको सत्त्वकी परमगतितक अर्थात् जहाँ श्रीनारायणके पार्षदगण उनको लेनेके लिये प्रस्तुत रहते हैं, वहाँतक वहन करता है। शुद्धात्मन्! वहाँसे सत्त्वगुणयुक्त वे भगवान्के पार्षद उनको परम प्रभु श्रीनारायणके पास पहुँचा देते हैं। समर्थ राजन्! भगवान् नारायण स्वयं उनको विशुद्ध आत्मा परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट कर देते हैं। परमात्माको पाकर तद्रूप हुए वे निर्मल योगीजन अमृतभावसम्पन्न हो जाते हैं, फिर नहीं लौटते ॥ ७६—७८ ॥
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् । सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥ ७९ ॥ कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ॥ ७९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः । आजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत न वानघ ॥ ८० ॥ यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ।