महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1980, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसारथिश्च यथा युक्त्वा सदश्वान् सुसमाहितः ।
देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ ।। ३६ ।।
तथैव नृपते योगी धारणासु समाहितः ।
प्राप्नोत्याशु परं स्थानं लक्ष्यं मुक्त इवाशुगः ।। ३७ ।।
पुरुषप्रवर! राजन्! जिस तरह अत्यन्त सावधान रहनेवाला सारथि अच्छे घोड़ोंको
रथमें जोतकर धनुर्धर योद्धाको तुरंत ही अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देता है, वैसे ही धारणाओंमें
एकाग्रचित्त हुआ योगी लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी भाँति शीघ्र परम पदको प्राप्त हो
जाता है ।। ३६-३७।।
प्रवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्ठति योऽचलः ।
पापं हन्ति पुनीतानां पदमाप्नोति सोऽजरम् ।। ३८ ।।
जो योगी समाधिके द्वारा आत्माको परमात्मामें स्थिर करके अचल हो जाता है, वह
अपने पापको नष्ट कर देता है और पवित्र पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले अविनाशी पदको पा
लेता है ।। ३८ ।।
नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः ।
दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ।। ३९ ।।
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः ।
आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्वि शाम्पते ।। ४० ।।
स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् ।
उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ।। ४१ ।।
अमित पराक्रमी नरेश! योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि,
कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्थानोंमें
धारणाके द्वारा सूक्ष्म आत्माको परमात्माके साथ भलीभाँति संयुक्त करता है, वह यदि
इच्छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मोंको शीघ्र ही भस्म करके उत्तम
योगका आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है ।। ३९-४१ ।।
युधिष्ठिर उवाच
आहारान् कीदृशान् कृत्वा कानि जित्वा च भारत ।
योगी बलमवाप्नोति तद् भवान् वक्तुमर्हसि ।। ४२ ।।
युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन! योगी कैसे आहार करके और किन-किनको जीतकर
योगशक्ति प्राप्त कर लेता है, यह आप मुझे बतानेकी कृपा करें ।। ४२ ।।
भीष्म उवाच
कणानां भक्षणे युक्तः पिण्याकस्य च भारत ।
स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी बलमवाप्नुयात् ।। ४३ ।।