भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1989

उसपर भी दृष्टिपात करे ।। ४१ ।।

वासं कुलेषु जन्तूनां दुःखं विज्ञाय भारत ।

ब्रह्मघ्नानां गतिं ज्ञात्वा पतितानां सुदारुणाम् ।। ४२ ।।

भरतनन्दन प्राणियोंका घरोंमें निवास करना भी दुःखरूप ही है, इस बातको अच्छी

तरह समझे तथा ब्रह्मघाती और पतित मनुष्योंकी जो अत्यन्त भयंकर दुर्गति होती है,

उसको भी जाने ।। ४२ ।।

सुरापाने च सक्तानां ब्राह्मणानां दुरात्मनाम् ।

गुरुदारप्रसक्तानां गतिं विज्ञाय चाशुभाम् ।। ४३ ।।

मदिरापानमें आसक्त दुरात्मा ब्राह्मणोंकी तथा गुरुपत्नीगामी मनुष्योंकी जो अशुभ गति

होती है, उसका भी विचार करे ।। ४३ ।।

जननीषु च वर्तन्ते ये न सम्यग् युधिष्ठिर ।

सदेवकेषु लोकेषु ये न वर्तन्ति मानवाः ।। ४४ ।।

तेन ज्ञानेन विज्ञाय गतिं चाशुभकर्मणाम् ।

तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय गतयः पृथक् ।। ४५ ।।

युधिष्ठिर! जो मनुष्य माताओं, देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंके प्रति उत्तम बर्ताव नहीं

करते हैं, उनकी दुर्गतिका ज्ञान जिससे होता है, उसी ज्ञानसे पापाचारी पुरुषोंकी

अधोगतिका ज्ञान प्राप्त करे तथा तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी जो विभिन्न गतियाँ होती

हैं, उनको भी जान ले ।।४४-४५ ।।

वेदवादांस्तथा चित्रानृतूनां पर्यायांस्तथा ।

क्षयं संवत्सराणां च मासानां च क्षयं तथा ।। ४६ ।।

पक्षक्षयं तथा दृष्ट्वा दिवसानां च संक्षयम् ।

क्षयं वृद्धिं च चन्द्रस्य दृष्ट्वा प्रत्यक्षतस्तथा ।। ४७ ।।

वृद्धिं दृष्ट्वा समुद्राणां क्षयं तेषां तथा पुनः ।

क्षयं धनानां दृष्ट्वा च पुनर्वृद्धिं तथैव च ।। ४८ ।।

वेदोंके भाँति-भाँतिके विचित्र वचन, ऋतुओंके परिवर्तन तथा दिन, पक्ष, मास और

संवत्सर आदि काल जो प्रतिक्षण बीत रहा है, उसकी ओर भी ध्यान दे। चन्द्रमाकी

ह्रासवृद्धि तो प्रत्यक्ष दिखायी देती है। समुद्रोंका ज्वारभाटा भी प्रत्यक्ष ही है। धनवानोंके

धनका नाश और नाशके बाद पुनः वृद्धिका क्रम भी दृष्टिगोचर होता ही रहता है। इन

सबको देखकर अपने कर्तव्यका निश्चय करे ।। ४६—४८ ।।

संयोगानां क्षयं दृष्ट्वा युगानां च विशेषतः ।

क्षयं च दृष्ट्वा शैलानां क्षयं च सरितां तथा ।। ४९ ।।

वर्णानां च क्षयं दृष्ट्वा क्षयान्तं च पुनः पुनः ।

जरामृत्युं तथा जन्म दृष्ट्वा दुःखानि चैव ह ।। ५० ।।