महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1988, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्नायुका संग्रह है, सैकड़ों नस-नाड़ियोंमें व्याप्त है तथा जिसमें नौ द्वार हैं; उस अपवित्र पुर अर्थात् शरीरमें जीवको रहना पड़ता है। नरेश्वर! इन सब बातोंको जानकर अपने परम हितस्वरूप आत्माको और उसकी प्राप्तिके लिये शास्त्रोंद्वारा बताये हुए नाना प्रकारके योगों (साधनों) की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ ३२-३४ ॥
तामसानां च जन्तूनां रमणीयावृतात्मनाम् । सात्त्विकानां च जन्तूनां कुत्सितं भरतर्षभ ॥ ३५ ॥ गर्हितं महतामर्थे सांख्यानां विदितात्मनाम् । भरतश्रेष्ठ! तामस, राजस और सात्त्विक—इन तीन प्रकारके प्राणियोंके जो तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषोंद्वारा निन्दित मोक्षविरोधी व्यवहार हैं, उनको भी जानना चाहिये ॥
उपप्लवांस्तथा घोरान् शशिनस्तेजसस्तथा ॥ ३६ ॥ ताराणां पतनं दृष्ट्वा नक्षत्राणां च पर्ययम् । द्वन्द्वानां विप्रयोगं च विज्ञाय कृपणं नृप ॥ ३७ ॥ नरेश्वर! घोर उत्पात, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, ताराओंका टूटकर गिरना, नक्षत्रोंकी गतिमें उलट-फेर होना तथा पति-पत्नियोंका दुःखदायक वियोग होना आदि बातें, जो इस जगत्में घटित होती हैं, उनको भी जानकर अपने कल्याणका उपाय करना चाहिये ॥ ३६-३७ ॥
अन्योन्यभक्षणं दृष्ट्वा भूतानामपि चाशुभम् । बाल्ये मोहं च विज्ञाय क्षयं देहस्य चाशुभम् ॥ ३८ ॥ रागे मोहे च सम्प्राप्ते क्वचित् सत्त्वं समाश्रितम् । सहस्रेषु नरः कश्चिन्मोक्षबुद्धिं समाश्रितः ॥ ३९ ॥ संसारके प्राणी एक-दूसरेको खा जाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है। इसपर दृष्टिपात करो। बाल्यावस्थामें मनपर मोह छाया रहता है और वृद्धावस्थामें शरीरका अमंगलकारी विनाश उपस्थित होता है। राग और मोह प्राप्त होनेपर अनेक दोष उत्पन्न होते हैं, इन सबको जानकर कहीं किसी-किसीको ही सत्त्वगुणसे युक्त देखा जाता है। सहस्रों मनुष्योंमेंसे कोई बिरला ही मोक्षविषयक बुद्धिका आश्रय लेता है ॥ ३८-३९ ॥
दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् । बहुमानमलब्धेषु लब्धे मध्यस्थतां पुनः ॥ ४० ॥ वेद-वाक्योंके श्रवणद्वारा मुक्तिकी दुर्लभताको जानकर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न होनेपर भी उस परिस्थितिके प्रति अधिक आदर-बुद्धि रखे और मनोवांछित वस्तु प्राप्त हो जाय, तो भी उसकी ओरसे उदासीन ही रहे ॥ ४० ॥
विषयाणां च दौरात्म्यं विज्ञाय नृपते पुनः । गतासूनां च कौन्तेय देहान् दृष्ट्वा तथाशुभान् ॥ ४१ ॥ नरेश्वर! शब्द-स्पर्श आदि विषय दुःखरूप ही हैं, इस बातको जाने। कुन्तीनन्दन! जिनके प्राण चले जाते हैं, उन मनुष्योंके शरीरोंकी जो अशुभ एवं बीभत्स दशा होती है,