भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1987, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1987

दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् ॥ २६ ॥ इन्द्रिय और इन्द्रियोंके विषय—ये सब-के-सब शरीरके भीतर स्थित हैं। मोक्ष परम दुर्लभ वस्तु है। इन सब बातोंको वेदोंके स्वाध्यायपूर्वक भलीभाँति समझ ले ॥

प्राणापानौ समानं च व्यानोदानौ च तत्त्वतः । अधश्चैवानिलं ज्ञात्वा प्रवहं चानिलं पुनः ॥ २७ ॥ सप्त वातांस्तथा ज्ञात्वा सप्तधा विहितान् पुनः । प्रजापतीनृषींश्चैव मार्गांश्चैव बहून् वरान् ॥ २८ ॥ प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच प्राणवायु हैं। अधोगामी वायु छठा और ऊर्ध्वगामी प्रवह नामक वायु सातवाँ है। ये वायुके जो सात भेद हैं, इनमेंसे प्रत्येकके सात-सात भेद और हो जाते हैं। इस प्रकार कुल उन्चास वायु होते हैं। अनेक प्रजापति, अनेक ऋषि तथा मुक्तिके अनेकानेक उत्तम मार्ग हैं। इन सबकी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥

सप्तर्षींश्च बहून् ज्ञात्वा राजर्षींश्च परंतप । सुरर्षीन् महतश्चान्यान् ब्रह्मर्षीन् सूर्यसंनिभान् ॥ २९ ॥ परंतप! सप्तर्षियों, बहुसंख्यक राजर्षियों, देवर्षियों, अन्यान्य महापुरुषों तथा सूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंका भी ज्ञान प्राप्त करे ॥ २९ ॥

ऐश्वर्याच्च्यावितान् दृष्ट्वा कालेन महता नृप । महतां भूतसंघानां श्रुत्वा नाशं च पार्थिव ॥ ३० ॥ गतिं चाप्यशुभां ज्ञात्वा नृपते पापकर्मिणाम् । वैतरण्यां च यद् दुःखं पतितानां यमक्षये ॥ ३१ ॥ पृथ्वीनाथ! महान् कालकी प्रेरणासे मनुष्य ऐश्वर्यसे भ्रष्ट कर दिये जाते हैं। बड़े-बड़े जो भूत-समुदाय हैं, उनका भी कालके द्वारा नाश हो जाता है। यह सब देख-सुनकर पापकर्मों मनुष्योंको जो अशुभ गति प्राप्त होती है तथा यमलोकमें जाकर वैतरणी नदीमें गिरे हुए प्राणियोंको जो दुःख होता है, उसको भी जाने ॥ ३१ ॥

योनीषु च विचित्रासु संसारानशुभांस्तथा । जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने ॥ ३२ ॥ श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते । शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे ॥ ३३ ॥ शिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ । विज्ञाय हितमात्मानं योगांश्च विविधान् नृप ॥ ३४ ॥ प्राणियोंको विचित्र-विचित्र योनियोंमें अशुभ जन्म धारण करने पड़ते हैं। रक्त और मूत्रके पात्ररूप अपवित्र गर्भाशयमें निवास करना पड़ता है, जहाँ कफ, मूत्र और मल भरा होता है तथा तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त रहती है, जो रज और वीर्यका समुदायमात्र है, मज्जा एवं