महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1986, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दे सक्तं तथा श्रोत्रं जिह्वा रसगुणेषु च ॥ १८ ॥ नेत्र रूप-गुणसे संयुक्त हैं। घ्राणेन्द्रिय गन्ध नामक गुणसे सम्बन्ध रखती है। श्रोत्रेन्द्रिय शब्दमें आसक्त है और रसना रसगुणमें ॥ १८ ॥
तनुं स्पर्शे तथा सक्तां वायुं नभसि चाश्रितम् । मोहं तमसि संयुक्तं लोभमर्थेषु संश्रितम् ॥ १९ ॥ त्वचा स्पर्शनामक गुणमें आसक्त है। इसी प्रकार वायुका आश्रय आकाश, मोहका आश्रय तमोगुण और लोभका आश्रय इन्द्रियोंके विषय हैं ॥ १९ ॥
विष्णुं क्रान्ते बले शक्रं कोष्ठे सक्तं तथानलम् । अप्सु देवीं समाासक्तामपस्तेजसि संश्रिताः ॥ २० ॥ तेजो वायौ तु संसक्तं वायुं नभसि चाश्रितम् । नभो महति संयुक्तं महद् बुद्धौ च संश्रितम् ॥ २१ ॥ गतिका आधार विष्णु, बलका इन्द्र, उदरका अग्नि तथा पृथ्वीदेवीका आधार जल है। जलका तेज, तेजका वायु, वायुका आकाश, आकाशका आश्रय महत्तत्त्व अर्थात् महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है और अहंकारका अधिष्ठान समष्टि बुद्धि है ॥ २०-२१ ॥
बुद्धिं तमसि संसक्तां तमो रजसि संश्रितम् । रजः सत्त्वे तथा सक्तं सत्त्वं सक्तं तथाऽऽत्मनि ॥ २२ ॥ सक्तमात्मानमीशे च देवे नारायणो तथा । देवं मोक्षे च संसक्तं मोक्षं सक्तं तु न क्वचित् ॥ २३ ॥ बुद्धिका आश्रय तमोगुण, तमोगुणका आश्रय रजोगुण और रजोगुणका आश्रय सत्त्वगुण है। सत्त्वगुण जीवात्माके आश्रित है। जीवात्माको भगवान् नारायण-देवके आश्रित समझो। भगवान् नारायणका आश्रय है मोक्ष (परब्रह्म), परंतु मोक्षका कोई भी आश्रय नहीं है (वह अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है) ॥ २२-२३ ॥
ज्ञात्वा सत्त्वगुणं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः । स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा देहसमाश्रिते ॥ २४ ॥ मध्यस्थमेकमात्मानं पापं यस्मिन् न विद्यते । द्वितीयं कर्म विज्ञाय नृपते विषयैषिणाम् ॥ २५ ॥ इन बातोंको भलीभाँति जानकर तथा सत्त्वगुणको, मनसहित ग्यारह इन्द्रिय, पाँच प्राण-इन सोलह गुणोंसे घिरे हुए सूक्ष्म शरीरको, शरीरके आश्रित रहनेवाले स्वभाव और चेतनाको जाने। नरेश्वर! जिसमें पापका लेश भी नहीं है, वह एकमात्र जीवात्मा शरीरके भीतर हृदयरूपी गुफामें उदासीन-भावसे विद्यमान है, इस बातको जाने। विषयकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंका जो कर्म है, वह शरीरके भीतर आत्माके अतिरिक्त दूसरा तत्त्व है। यह भी अच्छी तरह जान ले ॥ २५ ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च सर्वानात्मनि संश्रितान् ।