महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमिमं पृथिवी सर्वा एकाह्ना समपद्यत । धर्मात्मानं महात्मानं शूरमिन्द्रसमं युधि ॥ ८७ ॥ 'राजा मान्धाता बड़े धर्मात्मा और महामनस्वी थे। युद्धमें इन्द्रके समान शौर्य प्रकट करते थे। यह सारी पृथ्वी एक ही दिनमें उनके अधिकारमें आ गयी थी।।
यश्चाङ्गारं तु नृपतिं मरुत्तमसितं गयम् । अङ्गं बृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजयत् ॥ ८८ ॥ 'मान्धाताने समरांगणमें राजा अंगार, मरुत्त, असित, गय तथा अंगराज बृहद्रथको भी पराजित कर दिया था ।।
यौवनाश्वो यदाङ्गारं समरे प्रत्ययुध्यत । विस्फारैर्धनुषो देवा द्यौरभेदीति मेनिरे ॥ ८९ ॥ 'जिस समय युवनाश्वपुत्र मान्धाताने रणभूमिमें राजा अङ्गारके साथ युद्ध किया था, उस समय देवताओंने ऐसा समझा कि 'उनके धनुषकी टंकारसे सारा आकाश ही फट पड़ा है' ।। ८९ ।।
यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ९० ॥ 'जहाँ सूर्य उदय होते हैं वहाँसे लेकर जहाँ अस्त होते हैं वहाँतकका सारा देश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका ही राज्य कहलाता था ।। ९० ।।
अश्वमेधशतेनेष्ट्वा राजसूयशतेन च । अददाद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते ॥ ९१ ॥ हैरण्यान् योजनोत्सेधानायतान् दशयोजनम् । अतिरिक्तान् द्विजातिभ्यो व्यभजंस्त्वितरे जनाः ॥ ९२ ॥ 'प्रजानाथ! उन्होंने सौ अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे तथा एक योजन ऊँचे बहुत-से सोनेके रोहित नामक मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणोंको दान किये थे। ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो बच गये, उन्हें दूसरे लोगोंने बाँट लिया ।। ९१-९२ ।।
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रनुतप्यथाः ॥ ९३ ॥ 'सृंजय! राजा मान्धाता चारों कल्याणमय गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मारे गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बिसात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।।
ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम । य इमां पृथिवीं कृत्स्नां विजित्य सहसागराम् ॥ ९४ ॥ शम्यापातेनाभ्यतीयाद् वेदीभिश्चित्रयन् महीम् । ईजानः क्रतुभिर्मुख्यैः पर्यगच्छद् वसुन्धराम् ॥ ९५ ॥