महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘संजय! नहुषपुत्र राजा ययाति भी जीवित न रह सके—यह हमने सुना है। उन्होंने समुद्रोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर शम्यापातके* द्वारा पृथ्वीको नाप-नापकर यज्ञकी वेदियाँ बनायीं, जिनसे भूतलकी विचित्र शोभा होने लगी। उन्हीं वेदियोंपर मुख्य-मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए उन्होंने सारी भारतभूमिकी परिक्रमा कर डाली ।। ९४-९५ ।।
इष्ट्वा क्रतुसहस्रेण वाजपेयशतेन च । तर्पयामास विप्रेन्द्रांस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ।। ९६ ।।
‘उन्होंने एक हजार श्रौतयज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके तीन पर्वत दान करके पूर्णतः संतुष्ट किया ।। ९६ ।।
व्यूढेनासुरयुद्धेन हत्वा दैतेयदानवान् । व्यभजत् पृथिवीं कृत्स्नां ययातिर्नहुषात्मजः ।। ९७ ।।
‘नहुषपुत्र ययातिने व्यूह-रचनायुक्त आसुर युद्धके द्वारा दैत्यों और दानवोंका संहार करके यह सारी पृथ्वी अपने पुत्रोंको बाँट दी थी ।। ९७ ।।
अन्त्येषु पुत्रान् निक्षिप्य यदुद्रुह्युपुरोगमान् । पुरुं राज्येऽभिषिच्याथ सदारः प्राविशद् वनम् ।। ९८ ।।
‘उन्होंने किनारेके प्रदेशोंपर अपने तीन पुत्र यदु, द्रुह्यु तथा अनुको स्थापित करके मध्य भारतके राज्यपर पूरुको अभिषिक्त किया; फिर अपनी स्त्रियोंके साथ वे वनमें चले गये ।। ९८ ।।
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ९९ ।।
‘संजय! वे तुम्हारी अपेक्षा चारों कल्याणमय गुणोंमें बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारा पुत्र किस गिनतीमें है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।। ९९ ।।
अम्बरीषं च नाभागं मृतं संजय शुश्रुम । यं प्रजा वव्रिरे पुण्यं गोप्तारं नृपसत्तमम् ।। १०० ।।
‘संजय! हमने सुना है कि नाभागके पुत्र अम्बरीष भी मृत्युके अधीन हो गये थे। उन नृपश्रेष्ठ अम्बरीषको सारी प्रजाने अपना पुण्यमय रक्षक माना था ।। १०० ।।
यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञामयुतयाजिनाम् । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः सुसंहितः ।। १०१ ।।
‘ब्राह्मणोंके प्रति अनुराग रखनेवाले राजा अम्बरीषने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमण्डपमें दस लाख ऐसे राजाओंको उन ब्राह्मणोंकी सेवामें नियुक्त किया था, जो स्वयं भी दस-दस हजार यज्ञ कर चुके थे ।। १०१ ।।
नैतत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । इत्यम्बरीषं नाभागिमन्वमोदन्त दक्षिणाः ।। १०२ ।।