भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2001, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2001

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द्व्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

वसिष्ठ और करालजनकका संवाद—क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति

युधिष्ठिर उवाच

किं तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते पुनः ।
किं च तत्क्षरमित्युक्तं यस्मादावर्तते पुनः ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! वह अक्षर तत्त्व क्या है, जिसे प्राप्त कर लेनेपर जीव फिर इस संसारमें नहीं लौटता तथा वह क्षर पदार्थ क्या है, जिसको जानने या पा लेनेपर भी पुनः इस संसारमें लौटना पड़ता है? ॥ १ ॥

अक्षरक्षरयोर्व्यक्तिं पृच्छाम्यरिनिषूदन ।
उपलब्धं महाबाहो तत्त्वेन कुरुनन्दन ॥ २ ॥

शत्रुसूदन! महाबाहु! कुरुनन्दन! क्षर और अक्षरके स्वरूपको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये ही मैंने आपसे यह प्रश्न किया है ॥ २ ॥

त्वं हि ज्ञाननिधिर्विप्रैरुच्यसे वेदपारगैः ।
ऋषिभिश्च महाभागैर्यतिभिश्च महात्मभिः ॥ ३ ॥

वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण, महाभाग महर्षि तथा महात्मा यति भी आपको ज्ञाननिधि कहते हैं ॥ ३ ॥

शेषमल्पं दिनानां ते दक्षिणायनभास्करे ।
आवृत्ते भगवत्यर्के गन्तासि परमां गतिम् ॥ ४ ॥

अब सूर्यके दक्षिणायनमें रहनेके थोड़े ही दिन शेष हैं। भगवान् सूर्यके उत्तरायणमें पदार्पण करते ही आप परमधामको पधारेंगे ॥ ४ ॥

त्वयि प्रतिगते श्रेयः कुतः श्रोष्यामहे वयम् ।
कुरुवंशप्रदीपस्त्वं ज्ञानदीपेन दीप्यसे ॥ ५ ॥

आपके चले जानेपर हमलोग अपने कल्याणकी बातें किससे सुनेंगे? आप कुरुवंशको प्रकाशित करनेवाले प्रदीप हैं और ज्ञानदीपसे उद्भासित हो रहे हैं ॥ ५ ॥

तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुकुलोद्वह ।
न तृप्यामीह राजेन्द्र शृण्वन्नमृतमीदृशम् ॥ ६ ॥

अतः कुरुकुलधुरन्धर! राजेन्द्र! मैं आपकेही मुँहसे यह सब सुनना चाहता हूँ। आपके इन अमृतमय वचनोंको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती है (अतएव आप मुझे यह क्षर-अक्षरका विषय बताइये)। ॥ ६ ॥

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