भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2012

फलकं परिधानश्च तथा कण्टकवस्त्रधृक् । कीटकावसनश्चैव चीरवासास्तथैव च ॥ १४ ॥ कभी फलकवस्त्र (भोजपत्रकी छाल), कभी साधारण वस्त्र और कभी कण्टकवस्त्र धारण करता है। कभी कीड़ोंसे निकले हुए रेशमके मुलायम वस्त्र पहनता है तो कभी चिथड़े पहनकर रहता है ॥ १४ ॥

वस्त्राणि चान्यानि बहून्यभिमन्यत्यबुद्धिमान् । भोजनानि विचित्राणि रत्नानि विविधानि च ॥ १५ ॥ वह अज्ञानी जीव इनके अतिरिक्त भी नाना प्रकारके वस्त्र पहनता, विचित्र-विचित्र भोजनोंके स्वाद लेता और भाँति-भाँतिके रत्न धारण करता है ॥ १५ ॥

एकरात्रान्तराशित्वमेककालिकभोजनम् । चतुर्थाष्टमकालश्च षष्ठकालिक एव च ॥ १६ ॥ कभी एक रातका अन्तर देकर भोजन करता है, कभी दिन-रातमें एक बार अन्न ग्रहण करता है और कभी दिनके चौथे, छठे या आठवें पहरमें भोजन करता है ॥ १६ ॥

षड्ररात्रभोजनश्चैव तथैवाष्टहभोजनः । सप्तरात्रदशाहारो द्वादशाहिकभोजनः ॥ १७ ॥ कभी छः रात बिताकर खाता है और कभी सात, आठ, दस अथवा बारह दिनोंके बाद अन्न ग्रहण करता है ॥ १७ ॥

मासोपवासी मूलाशी फलाहारस्तथैव च । वायुभक्षोऽम्बुपिण्याकदधिगोमयभोजनः ॥ १८ ॥ कभी लगातार एक मासतक उपवास करता है। कभी फल खाकर रहता है और कभी कन्द-मूलके भोजनसे निर्वाह करता है। कभी पानी-हवा पीकर रह जाता है। कभी तिलकी खली, कभी दही और कभी गोबर खाकर ही रहता है ॥ १८ ॥

गोमूत्रभोजनश्चैव शाकपुष्पाद एव च । शैवालभोजनश्चैव तथाऽऽचामेन वर्तयन् ॥ १९ ॥ कभी वह गोमूत्रका भोजन करनेवाला बनता है। कभी वह साग, फूल या सेवार खाता है तथा कभी जलका आचमन मात्र करके जीवन-निर्वाह करता है ॥

वर्तयन् शीर्णपर्णैश्च प्रकीर्णफलभोजनः । विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सिद्धिकाङ्क्षया ॥ २० ॥ कभी सूखे पत्ते और पेड़से गिरे हुए फलोंको ही खाकर रह जाता है। इस प्रकार सिद्धि पानेकी अभिलाषासे वह नाना प्रकारके कठोर नियमोंका सेवन करता है ॥

चान्द्रायणानि विधिवल्लिङ्गानि विविधानि च । चातुराश्रम्यपन्थानमाश्रयत्यपथानपि ॥ २१ ॥