भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2013, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2013

कभी विधिपूर्वक चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करता और अनेक प्रकारके धार्मिक चिह्न धारण करता है। कभी चारों आश्रमोंके मार्गपर चलता और कभी विपरीत पथका भी आश्रय लेता है ॥ २१ ॥

उपाश्रमानप्यपरान् पाषण्डान् विविधानपि ।
विविक्ताश्च शिलाच्छायास्तथा प्रस्रवणानि च ॥ २२ ॥
कभी नाना प्रकारके उपाश्रमों तथा भाँति-भाँतिके पाखण्डोंको अपनाता है। कभी एकान्तमें शिलाखण्डोंकी छायामें बैठता और कभी झरनोंके समीप निवास करता है ॥ २२ ॥

पुलिनानि विविक्तानि विविक्तानि वनानि च ।
देवस्थानानि पुण्यानि विविक्तानि सरांसि च ॥ २३ ॥
कभी नदियोंके एकान्त तटोंमें, कभी निर्जन वनोंमें, कभी पवित्र देवमन्दिरोंमें तथा कभी एकान्त सरोवरोंके आसपास रहता है ॥ २३ ॥

विविक्ताश्चापि शैलानां गुहा गृहनिभोपमाः ।
विविक्तानि च जप्यानि व्रतानि विविधानि च ॥ २४ ॥
नियमान् विविधांश्चापि विविधानि तपांसि च ।
यज्ञांश्च विविधाकारान् विधींश्च विविधांस्तथा ॥ २५ ॥
कभी पर्वतोंकी एकान्त गुफाओंमें, जो गृहके समान ही होती हैं, निवास करता है। उन स्थानोंमें नाना प्रकारके गोपनीय जप, व्रत, नियम, तप, यज्ञ तथा अन्य भाँति-भाँतिके कर्मोंका अनुष्ठान करता है ॥ २४-२५ ॥

वणिक्यथं द्विजं क्षत्रं वैश्यशूद्रांस्तथैव च ।
दानं च विविधाकारं दीनान्धकृपणादिषु ॥ २६ ॥
वह कभी व्यापार करता, कभी ब्राह्मण और क्षत्रियोंके कर्तव्यका पालन करता तथा कभी वैश्यों और शूद्रोंके कर्मोंका आश्रय लेता। दीन-दुखी और अन्धोंको नाना प्रकारके दान देता है ॥ २६ ॥

अभिमन्यत्यसम्बोधात् तथैव त्रिविधान् गुणान् ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव धर्मार्थौ काम एव च ॥ २७ ॥
अज्ञानवश वह अपनेमें सत्त्व, रज, तम-इन त्रिविध गुणों और धर्म, अर्थ एवं कामका अभिमान कर लेता है ॥

प्रकृत्याऽऽत्मानमेवात्मा एवं प्रविभजत्युत ।
स्वधाकारवषट्कारौ स्वाहाकारनमस्क्रियाः ॥ २८ ॥
इस प्रकार आत्मा प्रकृतिके द्वारा अपने ही स्वरूपके अनेक विभाग करता है। वह कभी स्वाहा, कभी स्वधा, कभी वषट्कार और कभी नमस्कारमें प्रवृत्त होता है ॥

याजनाध्यापनं दानं तथैवाहुः प्रतिग्रहम् ।

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