महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब तुम्हारे पुत्रके लिये क्या कहा जाय? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११० ॥
गयं चामूर्तरयसं मृतं शुश्रुम संजय ।
यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥ १११ ॥
‘संजय! सुननेमें आया है कि अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयकी भी मृत्यु हुई थी। उन्होंने सौ वर्षोंतक होमसे अवशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ॥ १११ ॥
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गयः ।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ॥ ११२ ॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन ।
‘एक समय अग्निदेवने उन्हें वर माँगनेके लिये कहा, तब राजा गयने ये वर माँगे, ‘अग्निदेव! आपकी कृपासे दान करते हुए मेरे पास अक्षय धनका भंडार भरा रहे। धर्ममें मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदा सत्यमें ही अनुरक्त रहे’ ॥ ११२½ ॥
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति नः श्रुतम् ॥ ११३ ॥
दर्शैश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यैः पुनः पुनः ।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११४ ॥
‘सुना है कि उन्हें अग्निदेवसे वे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो गये थे। उन्होंने एक हजार वर्षोंतक बारंबार दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य तथा अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ११३-११४ ॥
शतं गवां सहस्राणि शतमश्वतराणि च ।
उत्थायोत्थाय वै प्रादात् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११५ ॥
‘वे हजार वर्षोंतक प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर एक-एक लाख गौओं और सौ-सौ खच्चरोंका दान करते थे ॥ ११५ ॥
तर्पयामास सोमेन देवान् वित्तैर्द्विजानपि ।
पितॄन् स्वधाभिः कामैश्च स्त्रियः स पुरुषर्षभ ॥ ११६ ॥
‘पुरुषप्रवर! इन्होंने सोमरसके द्वारा देवताओंको, धनके द्वारा ब्राह्मणोंको, श्राद्धकर्मसे पितरोंको और कामभोगद्वारा स्त्रियोंको तृप्त किया था ॥ ११६ ॥
सौवर्णीं पृथिवीं कृत्वा दशव्यामां द्विरायताम् ।
दक्षिणामददद् राजा वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११७ ॥
‘राजा गयने महायज्ञ अश्वमेधमें दस व्याम (पचास हाथ) चौड़ी और इससे दूनी लंबी सोनेकी पृथिवी बनवाकर दक्षिणारूपसे दान की थी ॥ ११७ ॥
यावत्यः सिकता राजन् गङ्गायां पुरुषर्षभ ।
तावतीरेव गाः प्रादादामूर्तरयसो गयः ॥ ११८ ॥