भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 204

'पुरुषप्रवर नरेश! गंगाजीमें जितने बालूके कण हैं, अमूर्तरयाके पुत्र गयने उतनी ही गौओंका दान किया था।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ११९ ।। 'संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।। ११९ ।। रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं संजय शुश्रुम । सम्यगाराध्य यः शक्राद् वरं लेभे महातपाः ।। १२० ।। अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन ।। १२१ ।। 'संजय! संकृतिके पुत्र राज रन्तिदेव भी कालके गालमें चले गये, यह हमारे सुननेमें आया है। उन महातपस्वी नरेशने इन्द्रकी अच्छी तरह आराधना करके उनसे यह वर माँगा कि 'हमारे पास अन्न बहुत हो, हम सदा अतिथियोंकी सेवाका अवसर प्राप्त करें, हमारी श्रद्धा दूर न हो और हम किसीसे कुछ भी न माँगें' ।। उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम् । ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ।। १२२ ।। 'कठोर व्रतका पालन करनेवाले, यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेवके पास गाँवों और जंगलोंके पशु अपने-आप यज्ञके लिये उपस्थित हो जाते थे ।। १२२ ।। महानदी चर्मराशेरुत्क्लेदात् ससृजे यतः । ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ।। १२३ ।। 'वहाँ भीगी चर्मराशिसे जो जल बहता था, उससे एक विशाल नदी प्रकट हो गयी, जो चर्मण्वती (चम्बल) के नामसे विख्यात हुई ।। १२३ ।। ब्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान् सदसि प्रतते नृपः । तुभ्यं निष्कं तुभ्यं निष्कमिति क्रोशन्ति वै द्विजाः ।। १२४ ।। सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा ब्राह्मणान् सम्प्रपद्यते । 'राजा अपने विशाल यज्ञमें ब्राह्मणोंको सोनेके निष्क दिया करते थे। वहाँ द्विजलोग पुकार-पुकारकर कहते कि 'ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिये निष्क है, यह तुम्हारे लिये निष्क है' परंतु कोई लेनेवाला आगे नहीं बढ़ता था। फिर वे यह कहकर कि 'तुम्हारे लिये एक सहस्र निष्क है', लेनेवाले ब्राह्मणोंको उपलब्ध कर पाते थे ।। १२४ १/२ ।। अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् ।। १२५ ।। घटाः पात्र्यः कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च । नासीत् किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ।। १२६ ।।

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