महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2082, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राण त्यागनेपर दिशाओंकी अधिष्ठात्री देवियोंको प्राप्त होता है ।। ५ ।। घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यामग्निमेव च । भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ।। ६ ।। नासिकासे प्राणोंका उत्क्रमण हो तो मनुष्य वायुदेवताको, दोनों नेत्रोंसे हो तो अग्निदेवताको, दोनों भौंहोंसे हो तो अश्विनीकुमारोंको और ललाटसे हो तो पितरोंको प्राप्त होता है ।। ६ ।। ब्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा । एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर ।। ७ ।। मस्तकसे प्राणोंका परित्याग करनेपर मनुष्य देवताओंके अग्रज भगवान् ब्रह्माजीके लोकको जाता है। मिथिलेश्वर! ये प्राणोंके निष्क्रमणके स्थान बताये गये हैं ।। ७ ।। अरिष्टानि प्रवक्ष्यामि विहितानि मनीषिभिः । संवत्सरवियोगस्य सम्भवन्ति शरीरिणः ।। ८ ।। अब मैं ज्ञानी पुरुषोंद्वारा नियत किये हुए अमंगल अथवा मृत्युको सूचित करनेवाले उन चिह्नोंका वर्णन करता हूँ, जो देहधारीके शरीर छूटनेमें केवल एक वर्ष शेष रह जानेपर उसके सामने प्रकट होते हैं ।। ८ ।। योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वां कदाचन । तथैव ध्रुवमित्याहुः पूर्णेन्दुं दीपमेव च ।। ९ ।। खण्डाभासं दक्षिणतस्तेऽपि संवत्सरायुषः । जो कभी पहलेकी देखी हुई अरुन्धती और ध्रुवको न देख पाता हो तथा पूर्णचन्द्रमाका मण्डल और दीपककी शिखा जिसे दाहिने भागसे खण्डित जान पड़े, ऐसे लोग केवल एक वर्षतक जीवित रहनेवाले होते हैं ।। ९ १/२ ।। परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव ।। १० ।। आत्मच्छायाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सरायुषः । पृथ्वीनाथ! जो लोग दूसरेके नेत्रोंमें अपनी परछाईं न देख सकें, उनकी आयु भी एक ही वर्षतक शेष समझनी चाहिये ।। १० १/२ ।। अतिद्युतिरतिप्रज्ञा अप्रज्ञा चाद्युतिस्तथा ।। ११ ।। प्रकृतेर्विक्रियापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । यदि मनुष्यकी बहुत बढ़ी-चढ़ी कान्ति भी अत्यन्त फीकी पड़ जाय, अधिक बुद्धिमत्ता भी बुद्धिहीनतामें परिणत हो जाय और स्वभावमें भी भारी उलट-फेर हो जाय तो यह उसके छः महीनेके भीतर ही होनेवाली मृत्युका सूचक है ।। ११ १/२ ।। दैवतान्यवजानाति ब्राह्मणैश्च विरुध्यते ।। १२ ।।