भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2083

कृष्णश्यावच्छविच्छायः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् ।
जो काले रंगका होकर भी पीला पड़ने लगे, देवताओंका अनादर करे और ब्राह्मणोंके साथ विरोध करे, वह भी छः महीनेसे अधिक नहीं जी सकता, यह उक्त लक्षणोंसे सूचित होता है ।। १२ १/२ ।।
ऊर्णनाभेर्यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति ।। १३ ।।
तथैव च सहस्रांशुं सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ।
जो मनुष्य सूर्य और चन्द्रमाके मण्डलको मकड़ीके जालेके समान छिद्रयुक्त देखता है, वह सात रातमें ही मृत्युका भागी होता है ।। १३ १/२ ।।
शवगन्धमुपाघ्राति सुरभिं प्राप्य यो नरः ।। १४ ।।
देवतायतनस्थस्तु सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ।
जो देवमन्दिरमें बैठकर वहाँकी सुगन्धित वस्तुमें सड़े मुर्देकी-सी दुर्गन्धका अनुभव करता है, वह सात दिनमें ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है ।। १४ १/२ ।।
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता ।। १५ ।।
संज्ञालोपो निरूष्मत्वं सद्योमृत्युनिदर्शनम् ।
अकस्माच्च स्रवेद् यस्य वाममक्षि नराधिप ।। १६ ।।
मूर्धतश्चोत्पतेद् धूमः सद्यो मृत्युनिदर्शनम् ।
नरेश्वर! जिसके नाक और कान टेढ़े हो जायँ, दाँत और नेत्रोंका रंग बिगड़ जाय, जिसे बेहोशी होने लगे, जिसका शरीर ठंडा पड़ जाय तथा जिसकी बायीं आँखसे अकस्मात् आँसू बहने और मस्तकसे धुआँ उठने लगे, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। उपर्युक्त लक्षण तत्काल होनेवाली मृत्युके सूचक हैं ।।
एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽत्मवान् ।। १७ ।।
निशि चाहनि चात्मानं योजयेत् परमात्मनि ।
प्रतीक्षमाणस्तत्कालं यत्कालं प्रेतता भवेत् ।। १८ ।।
इन मृत्युसूचक लक्षणोंको जानकर मनको वशमें रखनेवाला साधक रात-दिन परमात्माका ध्यान करे और जिस समय मृत्यु होनेवाली हो, उस कालकी प्रतीक्षा करता रहे ।। १७-१८ ।।
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रियाम् ।
सर्वगन्धान् रसांश्चैव धारयीत नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! यदि योगीको मृत्यु अभीष्ट न हो, अभी वह इस जगत्में रहना चाहे तो यह क्रिया करे। पूर्वोक्त रीतिसे पंचभूतविषयक धारणा करके पृथ्वी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करते हुए सम्पूर्ण गन्धों, रसों तथा रूप आदि विषयोंको अपने वशमें करे* ।। १९ ।।