भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2086

दूसरे किसीके उपयोगमें नहीं आये हैं' ।। ५ ।। ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज । सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ।। ६ ।। ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु । विवृतं च ततो मेऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ।। ७ ।। तब भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं तुम्हें यजुर्वेद प्रदान करता हूँ। तुम अपना मुँह खोलो। वाङ्मयी सरस्वती देवी तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करेंगी।' यह सुनकर मैंने मुँह खोल दिया और सरस्वती देवी उसमें प्रविष्ट हो गयीं ।। ६-७ ।। ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ । अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! सरस्वतीके प्रवेश करते ही मैं तापसे जलने लगा और जलमें घुस गया। महात्मा भास्करकी महिमाको न जानने तथा अपनेमें सहनशीलता न होनेके कारण मुझे उस समय विशेष कष्ट हुआ था ।। ८ ।। ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान् रविः । मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ।। ९ ।। तदनन्तर मुझे तापसे दग्ध होता देख भगवान् सूर्यने कहा—'तात! तुम दो घड़ीतक इस तापको सहन करो। फिर यह स्वयं ही शीतल एवं शान्त हो जायगा' ।। शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः । प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ।। १० ।। जब मैं पूर्ण शीतल हो गया, तब मुझे देखकर भगवान् भास्करने कहा—'विप्रवर! खिल और उपनिषदों-सहित सम्पूर्ण वेद तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित होंगे ।। १० ।। कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ । तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ।। ११ ।। 'द्विजश्रेष्ठ! तुम सम्पूर्ण शतपथका भी प्रणयन (सम्पादन) करोगे। इसके बाद तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें स्थिर होगी ।। ११ ।। प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत् सांख्ययोगेप्सितं पदम् । एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ।। १२ ।। 'तुम उस अभीष्ट पदको प्राप्त करोगे, जिसे सांख्यवेत्ता तथा योगी भी पाना चाहते हैं।' इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अदृश्य हो गये ।। १२ ।। ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ । गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ।। १३ ।। मैंने सूर्यदेवका वह कथन सुना। फिर जब वे चले गये, तब मैंने घर आकर प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका चिन्तन किया ।। १३ ।।