महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2087, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता । ओङ्कारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥ मेरे स्मरण करते ही स्वर और व्यंजन-वर्णोंसे विभूषित अत्यन्त मंगलमयी सरस्वतीदेवी ॐकारको आगे करके मेरे सम्मुख प्रकट हुई ॥ १४ ॥ ततोऽहमर्घ्यं विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयम् । तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥ तब मैंने सरस्वतीदेवी तथा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् भास्करको अर्घ्य निवेदन किया और उन्हींका चिन्तन करता हुआ बैठ गया ॥ १५ ॥ ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥ उस समय बड़े हर्षके साथ मैंने रहस्य, संग्रह और परिशिष्टभागसहित समस्त शतपथका संकलन किया ॥ १६ ॥ कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् । विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः । व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥ १८ ॥ महाराज! तदनन्तर मैंने अपने सौ उत्तम शिष्योंको शतपथका अध्ययन कराया। इसके बाद शिष्यसहित अपने महामनस्वी मामाका (जो पहले मुझे तिरस्कृत कर चुके थे) अप्रिय करनेके लिये किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति शिष्योंसे सुशोभित हो मैंने तुम्हारे पिता महात्मा राजा जनकके यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ १७-१८ ॥ मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम् । स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥ १९ ॥ उस समय अपने वेदकी दक्षिणाके लिये मामाके द्वारा विशेष आग्रह होनेपर महर्षि देवलके सामने ही मैंने आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ग्रहण की ॥ १९ ॥ सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै । पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥ २० ॥ तदनन्तर सुमन्तु, पैल, जैमिनि, तुम्हारे पिता तथा अन्य ऋषि-मुनियोंने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥ दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ । तथैव रोमहर्षण पुराणमवधारितम् ॥ २१ ॥ निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने सूर्यदेवसे शुक्लयजुर्वेदकी पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी तरह रोमहर्षण सूतसे मैंने पुराणोंका अध्ययन किया ॥ २१ ॥ बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ।