महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2090, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च । अपूर्वमक्षयं क्षय्यमेतत् प्रश्नमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ १८. राजन्! वेद्य क्या है? १९. अवेद्य क्या है? २०. चल क्या है? २१. अचल क्या है? २२. अपूर्व क्या है? २३. अक्षय क्या है? २४. और विनाशशील क्या है? ये ही उनके परम उत्तम प्रश्न हैं ॥ ३० ॥
अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः । पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम् ॥ ३१ ॥ मुहूर्तमुष्यतां तावद्यावदेवं विचिन्तये । बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥ ३२ ॥ महाराज! इन प्रश्नोंको सुनकर मैंने गन्धर्वशिरोमणि राजा विश्वावसुसे कहा—'राजन्! आपने क्रमशः बड़े उत्तम प्रश्न उपस्थित किये हैं। आप अर्थके ज्ञाता हैं। थोड़ी देर ठहर जाइये, तबतक मैं आपके इन प्रश्नोंपर विचार कर लेता हूँ।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वराज चुपचाप बैठे रहे ॥ ३१-३२ ॥
ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् । मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥ ३३ ॥ तदनन्तर मैंने पुनः सरस्वतीदेवीका मन-ही-मन चिन्तन किया। फिर तो जैसे दहीसे घी निकल आता है, उसी प्रकार उन प्रश्नोंका उत्तर निकल आया ॥ ३३ ॥
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव । मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥ ३४ ॥ राजन्! तात! उस समय मैं वहाँ उपनिषद्, उसके परिशिष्ट भाग और परम उत्तम आन्वीक्षिकी विद्यापर दृष्टिपात करके मनके द्वारा उन सबका मन्थन करने लगा ॥ ३४ ॥
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी । उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशादधिष्ठिता ॥ ३५ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह आन्वीक्षिकी विद्या (त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—इन तीन विद्याओंकी अपेक्षासे) चौथी बतायी गयी है। यह मोक्षमें सहायक है। पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे अधिष्ठित उस विद्याका मैंने तुमसे प्रतिपादन किया था (वही विश्वावसुके निकट भी कही गयी) ॥
अथोक्तस्तु मया राजन् राजा विश्वावसुस्तदा । श्रूयतां यद् भवानस्मान् प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ॥ ३६ ॥ राजन्! उस समय मैंने राजा विश्वावसुसे कहा—'गन्धर्वराज! आपने यहाँ मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर सुनिये ॥ ३६ ॥
विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि । विश्वाव्यक्तं परं विद्याद् भूतभव्यभयंकरम् ॥ ३७ ॥