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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

वेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च । अपूर्वमक्षयं क्षय्यमेतत् प्रश्नमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ १८. राजन्! वेद्य क्या है? १९. अवेद्य क्या है? २०. चल क्या है? २१. अचल क्या है? २२. अपूर्व क्या है? २३. अक्षय क्या है? २४. और विनाशशील क्या है? ये ही उनके परम उत्तम प्रश्न हैं ॥ ३० ॥

अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः । पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम् ॥ ३१ ॥ मुहूर्तमुष्यतां तावद्यावदेवं विचिन्तये । बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥ ३२ ॥ महाराज! इन प्रश्नोंको सुनकर मैंने गन्धर्वशिरोमणि राजा विश्वावसुसे कहा—'राजन्! आपने क्रमशः बड़े उत्तम प्रश्न उपस्थित किये हैं। आप अर्थके ज्ञाता हैं। थोड़ी देर ठहर जाइये, तबतक मैं आपके इन प्रश्नोंपर विचार कर लेता हूँ।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वराज चुपचाप बैठे रहे ॥ ३१-३२ ॥

ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् । मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥ ३३ ॥ तदनन्तर मैंने पुनः सरस्वतीदेवीका मन-ही-मन चिन्तन किया। फिर तो जैसे दहीसे घी निकल आता है, उसी प्रकार उन प्रश्नोंका उत्तर निकल आया ॥ ३३ ॥

तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव । मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥ ३४ ॥ राजन्! तात! उस समय मैं वहाँ उपनिषद्, उसके परिशिष्ट भाग और परम उत्तम आन्वीक्षिकी विद्यापर दृष्टिपात करके मनके द्वारा उन सबका मन्थन करने लगा ॥ ३४ ॥

चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी । उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशादधिष्ठिता ॥ ३५ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह आन्वीक्षिकी विद्या (त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—इन तीन विद्याओंकी अपेक्षासे) चौथी बतायी गयी है। यह मोक्षमें सहायक है। पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे अधिष्ठित उस विद्याका मैंने तुमसे प्रतिपादन किया था (वही विश्वावसुके निकट भी कही गयी) ॥

अथोक्तस्तु मया राजन् राजा विश्वावसुस्तदा । श्रूयतां यद् भवानस्मान् प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ॥ ३६ ॥ राजन्! उस समय मैंने राजा विश्वावसुसे कहा—'गन्धर्वराज! आपने यहाँ मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर सुनिये ॥ ३६ ॥

विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि । विश्वाव्यक्तं परं विद्याद् भूतभव्यभयंकरम् ॥ ३७ ॥

गन्धर्वपते! आपने जो विश्वा और अविश्व इत्यादि कहकर यह प्रश्नावली उपस्थित की है, उसमें विश्वा अव्यक्त प्रकृतिका नाम है। यह संसार-बन्धनमें डालनेवाली होनेके कारण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें भयंकर है—इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें।।

त्रिगुणं गुणकर्तृत्वादविश्वो निष्कलस्तथा ।
अश्वश्चाश्वा च मिथुनमेवमेवानुदृश्यते ।। ३८ ।।
इस प्रकार विश्वा नामसे प्रसिद्ध जो अव्यक्त प्रकृति है, वह त्रिगुणमयी है; क्योंकि वही त्रिगुणात्मक जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली है। उससे भिन्न जो निष्कल (कलाओंसे रहित) आत्मा है, वही अविश्व कहलाता है। इसी तरह अश्व और अश्वाकी जोड़ी भी देखी जाती है (अर्थात् अश्वा अव्यक्त प्रकृति है और अश्व पुरुष) ।।

अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् ।
तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ।। ३९ ।।
अव्यक्त प्रकृतिको सगुण बताया गया है और पुरुषको निर्गुण। इसी प्रकार वरुणको प्रकृति समझना चाहिये और मित्रको पुरुष ।। ३९ ।।

ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेयं निष्कलमेव च ।
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ।। ४० ।।
(भौतिक) ज्ञान शब्दसे प्रकृतिका प्रतिपादन किया गया है और निष्कल आत्माको ज्ञेय बताया गया है। इसी तरह अज्ञ प्रकृति है और उससे भिन्न निष्कल पुरुषको ‘ज्ञाता’ बताया गया है ।। ४० ।।

कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोऽसौ पुरुष उच्यते ।
तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कलः स्मृतः ।। ४१ ।।
क, तपा और अतपाके विषयमें जो प्रश्न उपस्थित किया गया है, उसके विषयमें बताया जाता है। पुरुषको ही ‘क’ कहते हैं। प्रकृतिका ही नाम तपा है और निष्कल पुरुषको अतपा नाम दिया गया है ।। ४१ ।।

(सूर्यमव्यक्तमित्युक्तमतिसूर्यस्तु निष्कलः ।
अविद्या प्रकृतिर्ज्ञेया विद्या पुरुष उच्यते ।।)
अव्यक्त प्रकृतिको ही सूर्य और निष्कल पुरुषको अतिसूर्य कहा गया है। प्रकृतिको अविद्या जानना चाहिये और पुरुष विद्या कहलाता है ।।

तथैवावेद्यमव्यक्तं वेद्यः पुरुष उच्यते ।
चलाचलमिति प्रोक्तं त्वया तदपि मे शृणु ।। ४२ ।।
इसी तरह अवेद्य नामसे अव्यक्त प्रकृतिका और वेद्य नामसे पुरुषका प्रतिपादन किया जाता है। आपने जो चल और अचलके विषयमें प्रश्न किया है, उसका भी उत्तर सुनिये ।। ४२ ।।

चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षयसर्गयोः । आक्षेपसर्गयोः कर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ॥ ४३ ॥ सृष्टि और संहारकी कारणभूता प्रकृतिको 'चला' कहा गया है और सृष्टि तथा प्रलयका कर्ता पुरुष ही निश्चल पुरुष माना गया है ॥ ४३ ॥

तथैव वेद्यमव्यक्तमवेद्यः पुरुषस्तथा । अज्ञावुभौ ध्रुवौ चैव अक्षयौ चाप्युभावपि ॥ ४४ ॥ अजौ नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चयाः ॥ ४५ ॥ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति वेद्य (जाननेमें आनेवाली) है और पुरुष अवेद्य (जाननेमें न आनेवाला)। अध्यात्मतत्त्वका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अज्ञ हैं, दोनों ही निश्चल हैं और दोनों ही अक्षय, अजन्मा तथा नित्य हैं ॥ ४४-४५ ॥

अक्षयत्वात् प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् । अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४६ ॥ ज्ञानी पुरुषोंका कथन है कि जन्म ग्रहण करनेपर भी क्षयरहित होनेके कारण यहाँ पुरुषको अजन्मा, अविनाशी और अक्षय कहा गया है; क्योंकि उसका कभी क्षय नहीं होता है ॥ ४६ ॥

गुणक्षयत्वात् प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षयं बुधाः । एषा तेऽऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी साम्परायिकी ॥ ४७ ॥ गुणोंका क्षय होनेके कारण प्रकृति क्षयशील मानी गयी है और उसका प्रेरक होनेके कारण पुरुषको विद्वानोंने अक्षय कहा है। गन्धर्वराज! यह मैंने आपको चौथी आन्वीक्षिकी विद्या, जो मोक्षमें सहायक है, बतायी है ॥ ४७ ॥

विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि । एकान्तदर्शना वेदाः सर्वे विश्वावसो स्मृताः ॥ ४८ ॥ विश्वावसो! आन्वीक्षिकी विद्यासहित वेद-विद्यारूपी धनका उपार्जन करके प्रयत्नपूर्वक नित्यकर्ममें संलग्न रहना चाहिये। सभी वेद एकान्ततः स्वाध्याय और मनन करनेके योग्य माने गये हैं ॥ ४८ ॥

जायन्ते च म्रियन्ते च यस्मिन्नेते यतश्च्युताः । वेदार्थं ये न जानन्ति वेद्यं गन्धर्वसत्तम ॥ ४९ ॥ गन्धर्वराज! समस्त भूत जिसमें स्थित हैं, जिससे उत्पन्न होते और जिसमें लीन हो जाते हैं, उस वेदप्रतिपाद्य ज्ञेय परमात्माको जो नहीं जानते हैं, वे परमार्थसे भ्रष्ट होकर जन्मते और मरते रहते हैं ॥ ४९ ॥

साङ्गोपाङ्गानपि यदि यश्च वेदानधीयते । वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः ॥ ५० ॥

सांगोपांग वेद पढ़कर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेके योग्य परमेश्वरको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ ढोनेवाला है ।। ५० ।।
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद् गन्धर्वसत्तम ।
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम् ।। ५१ ।।
गन्धर्वशिरोमणे! जो घी पानेकी इच्छा रखकर गधीके दूधको मथता है, उसे वहाँ विष्ठा ही दिखायी देती है। उसे न तो वहाँ मक्खन ही मिलता है और न घी ही ।। ५१ ।।
तथा वेद्यमवेद्यं च वेदविद्यो न विन्दति ।
स केवलं मूढमतिर्ज्ञानभारवहः स्मृतः ।। ५२ ।।
इसी प्रकार जो वेदोंका अध्ययन करके भी वेद्य और अवेद्यका तत्त्व नहीं जानता, वह मूढ़बुद्धि मानव केवल ज्ञानका बोझ ढोनेवाला माना गया है ।। ५२ ।।
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना ।
तथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ।। ५३ ।।
मनुष्यको सदा ही तत्पर होकर अन्तरात्माके द्वारा इन दोनों प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जिससे बारंबार उसे जन्म-मृत्युके चक्करमें न पड़ना पड़े ।। ५३ ।।
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम् ।
परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थितः ।। ५४ ।।
संसारमें जन्म और मरणकी परम्परा निरन्तर चलती रहती है—ऐसा सोचकर वैदिक कर्मकाण्डमें बताये हुए सभी कर्मों और उनके फलोंको विनाशशील जानकर उनका परित्याग करके मनुष्यको यहाँ अक्षय धर्मका आश्रय लेना चाहिये ।। ५४ ।।
यदानुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।। ५५ ।।
कश्यपनन्दन! जब साधक प्रतिदिन परमात्माके स्वरूपका विचार एवं चिन्तन करने लगता है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित होकर छब्बीसवें तत्त्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।
अन्यश्च शाश्वतोऽव्यक्तस्तथान्यः पञ्चविंशकः ।
तस्य द्वावनुपश्येतां तमेकमिति साधवः ।। ५६ ।।
मूढ़बुद्धि मानव उस आत्माके सम्बन्धमें द्वैतभावसे युक्त धारणा रखते हुए कहते हैं—‘सनातन अव्यक्त परमात्मा दूसरा है और पचीसवाँ तत्त्वरूप जीवात्मा दूसरा, परंतु साधु पुरुष उन दोनोंको एक मानते हैं ।।
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् ।
जन्ममृत्युभयाद् योगाः सांख्याश्च परमैषिणः ।। ५७ ।।
वे जन्म और मृत्युके भयसे रहित होकर परमपद पानेकी इच्छा रखनेवाले सांख्यवेत्ता और योगी जीवात्मा और परमात्माको एक-दूसरेसे भिन्न नहीं मानते हैं। जीव और ईश्वरका

अभेद बतानेवाला जो यह पूर्वोक्त दर्शन अथवा साधुमत है, उसका वे भी अभिनन्दन करते ही हैं ।। ५७ ।।

विश्वावसुरुवाच

पञ्चविंशं यदेतत् ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम ।
तथा तन्न तथा चेति तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। ५८ ।।

**विश्वावसुने कहा—**ब्राह्मणशिरोमणे! आपने जो यह पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न बताया है, उसमें यह संदेह उठता है कि जीवात्मा वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न है या नहीं? अतः आप इस बातका स्पष्टरूपसे वर्णन करें ।। ५८ ।।

जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य मया श्रुतम् ।
पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ।। ५९ ।।
भृगोः पञ्चशिखस्यास्य कपिलस्य शुकस्य च ।
गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ।। ६० ।।
नारदस्यासुरेश्चैव पुलस्त्यस्य च धीमतः ।
सनत्कुमारस्य ततः शुक्रस्य च महात्मनः ।। ६१ ।।
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मया श्रुतम् ।

मैंने मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान् वार्षगण्य, भृगु, पञ्चशिख, कपिल, शुक, गौतम, आर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान् पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र तथा अपने पिता कश्यपजीके मुखसे भी पहले इस विषयका प्रतिपादन सुना था ।। ५९—६१ ½ ।।

तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ।। ६२ ।।
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैतेयेभ्यस्ततस्ततः ।
प्राप्तमेतन्मया कृत्स्नं वेद्यं नित्यं वदन्त्युत ।। ६३ ।।

तदनन्तर रुद्र, बुद्धिमान् विश्वरूप, अन्यान्य देवता, पितर तथा दैत्योंसे भी जहाँ-तहाँसे यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। वे सब लोग ज्ञेय तत्त्वको पूर्ण और नित्य बतलाते हैं ।। ६२-६३ ।।

तस्मात् तद् वै भवद्बुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि ब्राह्मण ।
भवान् प्रबर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिबुद्धिमान् ।। ६४ ।।

ब्राह्मणदेव! अब मैं इस विषयमें आपकी बुद्धिसे किये गये निर्णयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप विद्वानोंमें श्रेष्ठ, शास्त्रोंके प्रगल्भ पण्डित और अत्यन्त बुद्धिमान् हैं ।। ६४ ।।

न तवाविदितं किंचिद् भवान् श्रुतिनिधिः स्मृतः ।
कथ्यते देवलोके च पितृलोके च ब्राह्मण ।। ६५ ।।

ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हों। वैदिक ज्ञानके तो आप भण्डार ही माने जाते हैं। ब्रह्मन्! देवलोक और पितृलोकमें भी आपकी ख्याति है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः । पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥ ६६ ॥ ब्रह्मलोकमें गये हुए महर्षि भी आपकी महिमाका वर्णन करते हैं। तपनेवाले तेजस्वी ग्रहोंके पति अदितिनन्दन सनातन भगवान् सूर्यने आपको वेदका उपदेश किया है ॥ सांख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च । तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥ ६७ ॥ ब्रह्मन्! याज्ञवल्क्य! आपने सम्पूर्ण सांख्य तथा योगशास्त्रका भी विशेष ज्ञान प्राप्त किया है ॥ ६७ ॥ निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् । श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥ ६८ ॥ इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आप पूर्ण ज्ञानी हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत्को जानते हैं; अतः मैं माखनमय घीके समान स्वादिष्ट एवं सारभूत वह तत्त्वज्ञान आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥

याज्ञवल्क्य उवाच

कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम । जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ६९ ॥ याज्ञवल्क्यजीने कहा—अर्थात् मैंने उत्तर दिया—गन्धर्वशिरोमणे! आपको मैं निःसंदेह सम्पूर्ण ज्ञानोंको धारण करनेवाली मेधाशक्तिसे सम्पन्न मानता हूँ। राजन्! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे प्रश्न करते और मेरे विचारको जानना चाहते हैं; इसलिये मैंने जैसा सुना है, वह बताता हूँ सुनिये ॥ ६९ ॥ अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः । न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥ ७० ॥ गन्धर्व! प्रकृति जड है, इसलिये उसे पचीसवाँ तत्त्व—जीवात्मा तो जानता है; किंतु प्रकृति जीवात्माको नहीं जानती ॥ ७० ॥ अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् । सांख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥ सांख्य और योगके तत्त्वज्ञानी विद्वान् श्रुतिमें किये हुए निरूपणके अनुसार जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाके समान प्रकृतिमें ज्ञानस्वरूप जीवात्माके बोधका प्रतिबिम्ब पड़नेसे उस प्रकृतिको प्रधान कहते हैं ॥ ७१ ॥ पश्यंस्तथैव चापश्यन् पश्यत्यन्यः सदानघ ।

षड्विंशं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च पश्यति ।। ७२ ।।
निष्पाप गन्धर्व! जीवात्मा जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें सब कुछ देखता है। सुषुप्ति और समाधि अवस्थामें कुछ भी नहीं देखता है तथा परमात्मा सदा ही छब्बीसवें तत्त्वरूप अपने-आपको, पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको और चौबीसवें तत्त्वरूप प्रकृतिको भी देखता रहता है ।।

न तु पश्यति पश्यंस्तु यश्चैनमनुपश्यति ।
पञ्चविंशोऽभिमन्येत नान्योऽस्ति परतो मम ।। ७३ ।।
किंतु यदि जीवात्मा यह अभिमान करता है कि मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है तो जो परमात्मा उसे निरन्तर देखता है, उसे वह समझता हुआ भी नहीं समझता ।। ७३ ।।

न चतुर्विंशको ग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभिः ।
मत्स्यश्चोदकमन्वेति प्रवर्तेत प्रवर्त्तनात् ।। ७४ ।।
तत्त्वज्ञानी मनुष्योंको चाहिये कि वे प्रकृतिको आत्मभावसे ग्रहण न करें। जैसे मत्स्य जलका अनुसरण करता है, परंतु अपनेको उससे भिन्न ही मानता है, उसी प्रकार मनुष्य उसकी प्रवृत्तिके अनुसार स्वयं भी प्रवृत्त होवे; परंतु प्रकृतिको अपना स्वरूप न माने ।। ७४ ।।

यथैव बुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुबुध्यते ।
स स्नेहात् सहवासाच्च साभिमानाच्च नित्यशः ।। ७५ ।।
स निमज्जति कालस्य यदैकत्वं न बुध्यते ।
उन्मज्जति हि कालस्य समत्वेनाभिसंवृतः ।। ७६ ।।
जैसे मछली जलमें रहती हुई भी उस जलको अपनेसे भिन्न समझती है, उसी प्रकार यह जीवात्मा प्राकृत शरीरमें रहकर भी प्रकृतिसे अपनेको भिन्न समझता है तथापि वह शरीरके प्रति स्नेह, सहवास और अभिमानके कारण जब परमात्माके साथ अपनी एकताका अनुभव नहीं करता है, तब कालके समुद्रमें डूब जाता है। परंतु जब वह समत्वबुद्धिसे युक्त हो अपनी और परमात्माकी एकताको समझ लेता है, तब उस काल-समुद्रसे उसका उद्धार हो जाता है ।। ७५-७६ ।।

यदा तु मन्यतेऽन्योऽहमन्य एष इति द्विजः ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।। ७७ ।।
जब द्विज इस बातको समझ लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्राकृत शरीर अथवा अनात्म-जगत् मुझसे सर्वथा भिन्न है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ।।

अन्यश्च राजन्नवरस्थान्यः पञ्चविंशकः ।
तत्स्थानाच्चानुपश्यन्ति एक एवेति साधवः ।। ७८ ।।

राजन्! परमात्मा भिन्न है और जीवात्मा भिन्न; क्योंकि परमात्मा जीवात्माका आश्रय है; परंतु ज्ञानी संत-महात्मा उन दोनोंको एक ही देखते और समझते हैं।।

ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् । जन्ममृत्युभयाद् भीता योगाःसांख्याश्च काश्यप । षड्विंशमनुपश्यन्तः शुचयस्तत्परायणाः ॥ ७९ ॥

कश्यपनन्दन! जन्म और मृत्युके भयसे डरे हुए योग और सांख्यके साधक भगवत्परायण हो शुद्ध भावसे छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका दर्शन करते हुए जीवात्मा और परमात्माको एक समझते हैं और इस अभेद-दर्शनका सदा अभिनन्दन ही करते हैं ॥ ७९ ॥

यदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति । तदा स सर्वविद् विद्वान् न पुनर्जन्म विन्दति ॥ ८० ॥

जब जीवात्मा प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह सर्वज्ञ विद्वान् होकर इस संसारमें पुनर्जन्म नहीं पाता है ॥ ८० ॥

एवमप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ । बुद्धश्चोक्तो यथातत्त्वं मया श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ८१ ॥

निष्पाप गन्धर्वराज! इस प्रकार मैंने तुमसे जड प्रकृति, चेतन जीवात्मा और बोधस्वरूप परमात्माका श्रुतिके अनुसार यथावत्रूपसे निरूपण किया है ॥ ८१ ॥

पश्यापश्यं यो न पश्येत् क्षेम्यं तत्त्वं च काश्यप । केवलाकेवलं चाद्यं पञ्चविंशं परं च यत् ॥ ८२ ॥

कश्यपनन्दन! जो मनुष्य जीवात्माको और प्रकृति आदि जडवर्गको पृथक्-पृथक् नहीं जानता, मंगलकारी तत्त्वपर दृष्टि नहीं रखता, केवल (प्रकृति-संसर्गसे रहित), अकेवल (प्रकृति-संसर्गसे युक्त), सबके आदिकारण जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माको भी यथार्थरूपसे नहीं जानता (वह आवागमनके चक्करमें पड़ा रहता है) ॥ ८२ ॥

विश्वावसुरुवाच

तथ्यं शुभं चैतदुक्तं त्वया विभो सम्यक् क्षेम्यं दैवताद्यं यथावत् । स्वस्त्यक्षयं भवतश्चास्तु नित्यं बुद्ध्या सदा बुद्धियुक्तं मनस्ते ॥ ८३ ॥

विश्वावसुने कहा—प्रभो! आपने सब देवताओंके आदिकारण ब्रह्मके विषयमें जो यथावत् वर्णन किया है, वह सत्य, शुभ, सुन्दर तथा परम मंगलकारी है। आपका मन सदा ही इसी प्रकार ज्ञानमें स्थित रहे तथा आपको नित्य अक्षय कल्याणकी प्राप्ति हो (अच्छा, अब मैं जाता हूँ) ॥ ८३ ॥

याज्ञवल्क्य उवाच

एवमुक्त्वा सम्प्रयातो दिवं स विभ्राजन् वै श्रीमता दर्शनेन । दृष्टश्च तुष्ट्या परयाभिनन्द्य प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ॥ ८४ ॥

याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर महामना गन्धर्वराज विश्वावसु अपने कान्तिमान् दर्शनसे प्रकाशित होते हुए मेरी परिक्रमा और अभिनन्दन करके स्वर्गलोकको चले गये। उस समय मैंने भी बड़े संतोषसे उनकी ओर देखा था ॥ ८४ ॥

ब्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च ये चाधस्तात् संवसन्ते नरेन्द्र । तत्रैव तद्दर्शनं दर्शयन् वै सम्यक् क्षेम्यं ये पथं संश्रिता वै ॥ ८५ ॥

राजा जनक! आकाशमें विचरनेवाले जो ब्रह्मा आदि देवता हैं, पृथ्वीपर निवास करनेवाले जो मनुष्य हैं तथा जो पृथ्वीसे नीचेके लोकोंमें रहते हैं, उनमेंसे जो लोग कल्याणमय मोक्षमार्गका आश्रय लिये हुए थे, उन सबको उन्हीं स्थानोंमें जाकर विश्वावसुने मेरे बताये हुए इस सम्यक्-दर्शनका उपदेश दिया था ॥ ८५ ॥

सांख्याः सर्वे सांख्यधर्मे रताश्च तद्वद् योगा योगधर्मे रताश्च । ये चाप्यन्ये मोक्षकामा मनुष्या- स्तेषामेतद् दर्शनं ज्ञानदृष्टम् ॥ ८६ ॥

सांख्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले सम्पूर्ण सांख्यवेत्ता, योग-धर्मपरायण योगी तथा दूसरे जो मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको यह उपदेश ज्ञानका प्रत्यक्ष फल देनेवाला है ॥ ८६ ॥

ज्ञानान्मोक्षो जायते राजसिंह नास्त्यज्ञानादेवमाहुर्नरिन्द्र । तस्माज्ज्ञानं तत्त्वतोऽन्वेषितव्यं येनात्मानं मोक्षयेज्जन्ममृत्योः ॥ ८७ ॥

राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी नरेन्द्र! ज्ञानसे ही मोक्ष होता है, अज्ञानसे नहीं— ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। इसलिये यथार्थ ज्ञानका अनुसंधान करना चाहिये, जिससे अपने-आपको जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुड़ाया जा सके ॥ ८७ ॥

प्राप्य ज्ञानं ब्राह्मणात् क्षत्रियाद् वा वैश्याच्छूद्रादपि नीचादभीक्ष्णम् । श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं

न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम् ॥ ८८ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा नीच वर्णमें उत्पन्न हुए पुरुषसे भी यदि ज्ञान मिलता हो तो उसे प्राप्त करके श्रद्धालु मनुष्यको सदा उसपर श्रद्धा रखनी चाहिये। जिसके भीतर श्रद्धा है, उस मनुष्यमें जन्म-मृत्युका प्रवेश नहीं हो सकता ॥ ८८ ॥

सर्वे वर्णा ब्राह्मणा ब्रह्मजाश्च सर्वे नित्यं व्याहरन्ते च ब्रह्म । तत्त्वं शास्त्रं ब्रह्मबुद्ध्या ब्रवीमि सर्वं विश्वं ब्रह्म चैतत् समस्तम् ॥ ८९ ॥ ब्रह्मसे उत्पन्न होनेके कारण सभी वर्ण ब्राह्मण हैं। सभी सदा ब्रह्मका उच्चारण करते हैं। मैं ब्रह्मबुद्धिसे यथार्थ शास्त्रका सिद्धान्त बता रहा हूँ। यह सम्पूर्ण जगत्, यह सारा दृश्यप्रपंच ब्रह्म ही है ॥ ८९ ॥

ब्रह्मास्यतो ब्राह्मणाः सम्प्रसूता बाहुभ्यां वै क्षत्रियाः सम्प्रसूताः । नाभ्यां वैश्याः पादतश्चापि शूद्राः सर्वे वर्णा नान्यथा वेदितव्याः ॥ ९० ॥ ब्रह्मके मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए हैं, ब्रह्मकी ही भुजाओंसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, ब्रह्मकी ही नाभिसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं, अतः सभी वर्णके लोग ब्रह्मरूप ही हैं। किसी भी वर्णको ब्रह्मसे भिन्न नहीं समझना चाहिये ॥ ९० ॥

अज्ञानतः कर्मयोनिं भजन्ते तां तां राजंस्ते तथा यान्त्यभावम् । तथा वर्णा ज्ञानहीनाः पतन्ते घोरदज्ञानात् प्राकृतं योनिजालम् ॥ ९१ ॥ राजन्! मनुष्य अज्ञानके कारण ही कर्मानुष्ठानसे भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं। ज्ञानहीन मनुष्य ही अपने भयंकर अज्ञानके कारण नाना प्रकारकी प्राकृत योनियोंमें गिरते हैं ॥ ९१ ॥

तस्माज्ज्ञानं सर्वतो मार्गितव्यं सर्वत्रस्थं चैतदुक्तं मया ते । तत्स्थो ब्रह्मा तस्थिवांश्चापरो य- स्तस्मै नित्यं मोक्षमाहुर्नरेन्द्र ॥ ९२ ॥ नरेन्द्र! अतः सब ओरसे ज्ञान प्राप्त करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। यह तो मैं तुमसे बता ही चुका हूँ कि सभी वर्णोंके लोग अपने-अपने आश्रममें रहते हुए ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं; अतः जो ब्राह्मण ज्ञानमें स्थित है अथवा जो दूसरे वर्णका मनुष्य भी ज्ञाननिष्ठ है, उसके लिये नित्य मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥

यत् ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व। राजन् गच्छस्वैतदर्थस्य पारं सम्यक् प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम्॥ ९३॥ राजन्! तुमने जो पूछा था उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानका उपदेश किया है; अतः अब तुम शोकरहित हो जाओ और इस तत्त्वज्ञानमें पारंगत बनो। मैंने तुम्हें ज्ञानका भलीभाँति उपदेश कर दिया है। जाओ, तुम्हारा सदा कल्याण हो॥ ९३॥

भीष्म उवाच

स एवमनुशास्तस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता। प्रीतिमानभवद् राजा मिथिलाधिपतिस्तदा॥ ९४॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बुद्धिमान् याज्ञ-वल्क्यजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर मिथिलापति राजा जनक उस समय बहुत प्रसन्न हुए॥ ९४॥ गते मुनिवरे तस्मिन् कृते चापि प्रदक्षिणम्। दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित्॥ ९५॥ गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यं तु तथैव च। रत्नाञ्जलिमथैकं च ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा॥ ९६॥ उन्होंने सत्कारपूर्वक मुनिकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा किया। जब वे मुनिवर याज्ञवल्क्य चले गये, तब मोक्षके ज्ञाता देवरातनन्दन राजा जनकने वहीं बैठे-बैठे एक करोड़ गौएँ छूकर ब्राह्मणोंको दान कर दीं तथा प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक अंजलि रत्न और सुवर्ण प्रदान किये॥ ९५-९६॥ विदेहराज्यं च तदा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै। यतिधर्ममुपासंश्राप्यवसन्मिथिलाधिपः॥ ९७॥ इसके बाद मिथिलानरेशने विदेहदेशका राज्य अपने पुत्रको सौंप दिया और स्वयं वे यति-धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ९७॥ सांख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः। धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन्॥ ९८॥ अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च। धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च॥ ९९॥ जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत्। व्यक्ताव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप॥ १००॥ राजेन्द्र! नरेश्वर! उन्होंने सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्रका स्वाध्याय करके प्राकृत धर्म और अधर्मको त्याज्य मानते हुए यह निश्चय किया कि 'मैं अनन्त हूँ।' ऐसा निश्चय

करके वे धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सत्य-असत्य तथा जन्म और मृत्युको व्यक्त (बुद्धि आदि) और अव्यक्त (प्रकृति) का कार्य मानकर सबको प्राकृत (प्रकृतिजन्य एवं मिथ्या) समझते हुए प्रकृतिसंसर्गसे रहित अपने शुद्ध एवं नित्य स्वरूपका ही चिन्तन करने लगे ।। ९८—१०० ।।

पश्यन्ति योगाः सांख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः ।
इष्टानिष्टविमुक्तं हि तस्थौ ब्रह्म परात्परम् ।। १०१ ।।
युधिष्ठिर! सांख्य और योगके विद्वान् अपने-अपने शास्त्रोंमें वर्णित लक्षणोंके अनुसार ऐसा देखते और समझते हैं कि वह ब्रह्म इष्ट और अनिष्टसे मुक्त, अचल-भावसे स्थित एवं परात्पर है ।। १०१ ।।

नित्यं तदाहुर्विद्वांसः शुचि तस्माच्छुचिर्भव ।
दीयते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते ।। १०२ ।।
ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह ।
ददात्यव्यक्त इत्येतत् प्रतिगृह्णाति तच्च वै ।। १०३ ।।
विद्वान् पुरुष उस ब्रह्मको नित्य एवं पवित्र बताते हैं; अतः तुम भी उसे जानकर पवित्र हो जाओ। नरश्रेष्ठ! जो कुछ दिया जाता है, जो दी हुई वस्तु किसीको प्राप्त होती है, जो दानका अनुमोदन करता है, जो देता है तथा जो उस दानको ग्रहण करता है, वह सब अव्यक्त परमात्मा ही है। परमात्मा ही यह सब कुछ देता और लेता है ।। १०२-१०३ ।।

आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत् ।
एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय ।। १०४ ।।
युधिष्ठिर! एकमात्र परमात्मा ही अपना है। उससे बढ़कर आत्मीय दूसरा कौन हो सकता है। तुम सदा ऐसा ही मानो और इसके विपरीत दूसरी किसी बातका चिन्तन न करो ।। १०४ ।।

यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः ।
तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्या विपश्चिता ।। १०५ ।।
जिसे अव्यक्त प्रकृतिका ज्ञान न हुआ हो, सगुण-निर्गुण परमात्माकी पहचान न हुई हो, उस विद्वान्‌को तीर्थोंका सेवन और यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ।। १०५ ।।

न स्वाध्यायैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन ।
लभतेऽव्यक्तिकं स्थानं ज्ञात्वा व्यक्तं महीयते ।। १०६ ।।
कुरुनन्दन! स्वाध्याय, तप अथवा यज्ञोंद्वारा मोक्ष या परमात्मपदकी प्राप्ति नहीं होती (ये तो उनके तत्त्वको जाननेमें सहायक होते हैं)। इनके द्वारा परमात्माका स्पष्ट (अपरोक्ष) ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य महिमान्वित होता है ।। १०६ ।।

तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च ।
अहङ्कारात् परं चापि स्थानानि समवाप्नुयात् ।। १०७ ।।

महत्तत्त्वकी उपासना करनेवाले महत्तत्त्वको और अहंकारके उपासक अहंकारको प्राप्त होते हैं; परंतु महत्तत्त्व और अहंकारसे भी श्रेष्ठ जो स्थान हैं, उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ १०७ ॥

ये त्वव्यक्तात् परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः ।
जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं सदसच्च यत् ॥ १०८ ॥
जो शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होते हैं, वे ही प्रकृतिसे पर, नित्य, जन्म-मृत्युसे रहित, मुक्त एवं सदसत्स्वरूप परमात्माका ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १०८ ॥

एतन्मयाऽऽप्तं जनकात् पुरस्तात्
तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् ।
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा
ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ॥ १०९ ॥
युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकालमें राजा जनकसे मिला था और जनकको याज्ञवल्क्यजीसे प्राप्त हुआ था। ज्ञान सबसे उत्तम साधन है। यज्ञ इसकी समानता नहीं कर सकते। ज्ञानसे ही मनुष्य इस दुर्गम संसार-सागरसे पार हो सकता है; यज्ञोंद्वारा नहीं ॥ १०९ ॥

दुर्गं जन्म निधनं चापि राजन्
न भौतिकं ज्ञानविदो वदन्ति ।
यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्व्रतैश्च
दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ॥ ११० ॥
राजन्! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भौतिक जन्म और मृत्युको पार करना अत्यन्त कठिन है। यज्ञ आदिके द्वारा भी मनुष्य उस दुर्गम संकटसे पार नहीं हो सकता। यज्ञ, तप, नियम और व्रतोंद्वारा तो लोग स्वर्गलोकमें जाते और पुण्य क्षीण होनेपर फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं ॥ ११० ॥

तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि
शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् ।
क्षेत्रं ज्ञात्वा पार्थिव ज्ञानयज्ञ-
मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ॥ १११ ॥
इसलिये तुम प्रकृतिसे पर, महत्, पवित्र, कल्याणमय, निर्मल, शुद्ध तथा मोक्षस्वरूप ब्रह्मकी उपासना करो। पृथ्वीनाथ! क्षेत्रको जानकर और ज्ञानयज्ञका आश्रय लेकर तुम निश्चय ही तत्त्वज्ञानी ऋषि बन जाओगे ॥ १११ ॥

यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ
जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः ।
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त-

च्छुभममृतत्वमशोकमर्च्छति ॥ ११२ ॥

पूर्वकालमें याज्ञवल्क्य मुनिने राजा जनकको जिस उपनिषद् (ज्ञान) का उपदेश दिया था, उसका मनन करनेसे मनुष्य पूर्वकथित सनातन अविनाशी, शुभ, अमृतमय तथा शोकरहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ११२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादसमाप्तौ
अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य-जनक-संवादकी समाप्तिविषयक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं)

जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद

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एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

ऐश्वर्यं वा महत् प्राप्य धनं वा भरतर्षभ ।
दीर्घमायुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! महान् ऐश्वर्य या प्रचुर धन अथवा बहुत बड़ी आयु पाकर मनुष्य किस तरह मृत्युका उल्लंघन कर सकता है? ॥ १ ॥

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा ।
रसायनप्रयोगैर्वा कैर्नाप्नोति जरान्तकौ ॥ २ ॥
वह गुरुतर तपस्या करके, महान् कर्मोंका अनुष्ठान करके, वेद-शास्त्रोंका अध्ययन करके अथवा नाना प्रकारके रसायनोंका प्रयोग करके किन उपायोंद्वारा जरा और मृत्युको प्राप्त नहीं होता है? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भिक्षोः पञ्चशिखस्येह संवादं जनकस्य च ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष संन्यासी पंचशिख तथा राजा जनकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

वैदेहो जनको राजा महर्षिं वेदवित्तमम् ।
पर्यपृच्छत् पञ्चशिखं छिन्नधर्मार्थसंशयम् ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, विदेहदेशके राजा जनकने वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि पंचशिखसे, जिनके धर्म और अर्थ-विषयक संदेह नष्ट हो गये थे, इस प्रकार प्रश्न किया— ॥

केन वृत्तेन भगवन्नतिक्रामेज्जरान्तकौ ।
तपसा वाथ बुद्ध्या वा कर्मणा वा श्रुतेन वा ॥ ५ ॥
‘भगवन्! किस आचार, तपस्या, बुद्धि, कर्म अथवा शास्त्रज्ञानके द्वारा मनुष्य जरा और मृत्युको लाँघ सकता है?’ ॥ ५ ॥

एवमुक्तः स वैदेहं प्रत्युवाचापरोक्षवित् ।
निवृत्तिर्न तयोरस्ति नानिवृत्तिः कथञ्चन ॥ ६ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर अपरोक्ष ज्ञानसे सम्पन्न महर्षि पंचशिखने विदेहराजको इस प्रकार उत्तर दिया—‘जरा और मृत्युकी निवृत्ति नहीं होती है, परंतु ऐसा भी नहीं है कि

किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती (धन और ऐश्वर्य आदिसे उनकी निवृत्ति नहीं

होती, परंतु ज्ञानसे तो पुनर्जन्मकी भी निवृत्ति हो जाती है; फिर जरा और मृत्युकी तो बात

ही क्या?) ।। ६ ।।

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः ।

सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुवः ।। ७ ।।

दिन, रात और महीनोंके जो चक्र चल रहे हैं, वे किसीके टाले नहीं टलते हैं। इसी

प्रकार जन्म, मृत्यु और जरा आदिके क्रम प्रायः चलते ही रहते हैं। जिसके जीवनका कुछ

ठिकाना नहीं, वह मरणधर्मा मानव कभी दीर्घ-कालके पश्चात् नित्यपथ (मोक्षमार्ग) का

आश्रय लेता है ।।

सर्वभूतसमुच्छेदः स्रोतसेवोह्यते सदा ।

ऊह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे ।। ८ ।।

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदभिपद्यते ।

काल समस्त प्राणियोंका उच्छेद कर डालता है। जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको

बहाये लिये जाता है, उसी प्रकार काल सदा ही प्राणियोंको अपने वेगसे बहाया करता है।

यह काल बिना नौकाके समुद्रकी भाँति लहरा रहा है। जरा और मृत्यु विशाल ग्राहका रूप

धारण करके उसमें बैठे हुए हैं। उस काल-सागरमें बहते और डूबते हुए जीवको कोई भी

बचा नहीं सकता ।। ८ १/२ ।।

नैवास्य कश्चिद् भवति नासौ भवति कस्यचित् ।। ९ ।।

पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ।

नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित् ।। १० ।।

यहाँ इस जीवका कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसीका अपना नहीं है। रास्तेमें

मिले हुए राहगीरोंके समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंका साथ हो जाता है, परंतु

यहाँ पहले कभी किसीने किसीके साथ चिरकालतक सहवासका सुख नहीं उठाया है ।।

क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निघ्नन्तः पुनः पुनः ।

कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचयाः ।। ११ ।।

जैसे गर्जते हुए बादलोंको हवा बारंबार उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार

काल यहाँ जन्म लेनेवाले प्राणियोंको उनके रोने-चिल्लानेपर भी विनाशी आगमें झोंक

देता है ।। ११ ।।

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।

बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १२ ।।

कोई बलवान् हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत

व्याघ्रकी भाँति खा जाती है ।। १२ ।।

एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूतोऽध्रुवेषु च ।

कथं हि हृष्येज्जातेषु मृतेषु च कथं ज्वरेत् ॥ १३ ॥
इस प्रकार जब सभी प्राणी विनाशशील ही हैं, तब नित्य-स्वरूप जीवात्मा उन प्राणियोंके लिये जन्म लेनेपर हर्ष किसलिये माने और मर जानेपर शोक क्यों करे? ।। १३ ।।

कुतोऽहमागतः कोऽस्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा ।
कस्मिन् स्थितः क्व भविता कस्मात्किमनुशोचसि ॥ १४ ॥
मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? कहाँ जाऊँगा? किसके साथ मेरा क्या सम्बन्ध है? किस स्थानमें स्थित होकर कहाँ फिर जन्म लूँगा? इन सब बातोंको लेकर तुम किसलिये क्या शोक कर रहे हो? ।। १४ ।।

द्रष्टा स्वर्गस्य कोऽन्योऽस्ति तथैव नरकस्य च ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च ॥ १५ ॥
जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, उसके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और नरकका दर्शन एवं उपभोग करेगा; अतः शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए सब लोगोंको दान और यज्ञ आदि सत्कर्म करते रहना चाहिये ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखजनकसंवादे
एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिख और जनकका संवादविषयक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१९ ।।

३२०-

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विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना

युधिष्ठिर उवाच

अपरित्यज्य गार्हस्थ्यं कुरुराजर्षिसत्तम ।
कः प्राप्तो विनयं बुद्ध्या मोक्षतत्त्वं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुकुलराजर्षिशिरोमणि! जहाँ बुद्धिका लय हो जाता है, उस मोक्षतत्त्वको गृहस्थाश्रमका त्याग बिना किये कौन पुरुष प्राप्त हुआ है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

संन्यस्यते यथाऽऽत्मायं व्यक्तस्यात्मा यथा च यत् ।
परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! यह मनुष्यशरीर जिस प्रकार स्थूल शरीरका त्याग करता है और जिस प्रकार स्थूल शरीरका आत्मा सूक्ष्म शरीरका त्याग करता है अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म—इन दोनों शरीरोंके अभिमानसे जिस प्रकार रहित हो सकता है एवं उनके त्यागका जो स्वरूप है और जो मोक्षका तत्त्व है, वह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
जनकस्य च संवादं सुलभायाश्च भारत ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें जानकार मनुष्य जनक और सुलभाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

संन्यासफलिकः कश्चिद् बभूव नृपतिः पुरा ।
मैथिलो जनको नाम धर्मध्वज इति श्रुतः ॥ ४ ॥
प्राचीन कालमें मिथिलापुरीके कोई एक राजा जनक हो गये हैं, जो धर्मध्वज नामसे प्रसिद्ध थे। उन्हें (गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी) संन्यासका जो सम्यग्ज्ञानरूप फल है, वह प्राप्त हो गया था ॥ ४ ॥

स वेदे मोक्षशास्त्रे च स्वे च शास्त्रे कृतश्रमः ।
इन्द्रियाणि समाधाय शशास वसुधामिमाम् ॥ ५ ॥

उन्होंने वेदमें, मोक्षशास्त्रमें तथा अपने शास्त्र (दण्डनीति)-में भी बड़ा परिश्रम किया था। वे इन्द्रियोंको एकाग्र करके इस वसुन्धराका शासन करते थे ।। ५ ।। तस्य वेदविदः प्राज्ञाः श्रुत्वा तां साधुवृत्तताम् । लोकेषु स्पृहयन्त्यन्ये पुरुषाः पुरुषेश्वर ॥ ६ ॥ नरेश्वर! वेदोंके ज्ञाता विद्वान् पुरुष उनकी उस साधुवृत्तिका समाचार सुनकर उन्हींके समान सज्जन होनेकी इच्छा करते थे ।। ६ ।। अथ धर्मयुगे तस्मिन् योगधर्ममनुष्ठिता । महीमनुचचारैका सुलभा नाम भिक्षुकी ॥ ७ ॥ वह धर्मप्रधान युगका समय था। उन दिनों सुलभा नामवाली एक संन्यासिनी योगधर्मके अनुष्ठानद्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही इस पृथ्वीपर विचरण करती थी ।। ७ ।। तया जगदिदं कृत्स्नमटन्त्या मिथिलेश्वरः । तत्र तत्र श्रुतो मोक्षे कथ्यमानस्त्रिदण्डिभिः ॥ ८ ॥ इस सम्पूर्ण जगत्में घूमती हुई सुलभाने यत्र-तत्र अनेक स्थानोंमें त्रिदण्डी संन्यासियोंके मुखसे मोक्षतत्त्वकी जानकारीके विषयमें मिथिलापति राजा जनककी प्रशंसा सुनी ।। ८ ।। सातिसूक्ष्मां कथां श्रुत्वा तथ्यं नेति ससंशया । दर्शने जातसंकल्पा जनकस्य बभूव ह ॥ ९ ॥ उनके द्वारा कही जानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म-विषयक वार्ता दूसरोंके मुखसे सुनकर सुलभाके मनमें यह संदेह हुआ कि पता नहीं जनकके सम्बन्धमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे सत्य हैं या नहीं। यह संशय उत्पन्न होनेपर उसके हृदयमें राजा जनकके दर्शनका संकल्प उदित हुआ ।। ९ ।। तत्र सा विप्रहायाथ पूर्वरूपं हि योगतः । अबिभ्रदनवद्याङ्गी रूपमन्यदनुत्तमम् ॥ १० ॥ चक्षुर्निमेषमात्रेण लघ्वस्त्रगतिगामिनी । विदेहानां पुरीं सुभ्रूर्जगाम कमलेक्षणा ॥ ११ ॥ उसने योगशक्तिसे अपना पहला शरीर छोड़कर दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया। अब उसका प्रत्येक अंग अनिन्द्य सौन्दर्यसे प्रकाशित होने लगा। सुन्दर भौंहोंवाली वह कमलनयनी बाला बाणोंके समान तीव्र गतिसे चलकर पलभरमें विदेहदेशकी राजधानी मिथिलामें जा पहुँची ।। १०-११ ।। सा प्राप्य मिथिलां रम्यां प्रभूतजनसंकुलाम् । भैक्ष्यचर्यापदेशेन ददर्श मिथिलेश्वरम् ॥ १२ ॥ प्रचुर जनसमुदायसे भरी हुई उस रमणीय मिथिलानगरीमें पहुँचकर संन्यासिनी सुलभाने भिक्षा लेनेके बहाने मिथिलानरेशका दर्शन किया ।। १२ ।। राजा तस्याः परं दृष्ट्वा सौकुमार्यं वपुस्तदा ।

केयं कस्य कुतो वेति बभूवागतविस्मयः ॥ १३ ॥
उसके परम सुकुमार शरीर और सौन्दर्यको देखकर राजा जनक आश्चर्यसे चकित हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे, 'यह कौन है, किसकी है अथवा कहाँसे आयी है?' ॥ १३ ॥
ततोऽस्याः स्वागतं कृत्वा व्यादिश्य च वरासनम् ।
पूजितां पादशौचेन वरान्नेनाप्यतर्पयत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर उसका स्वागत करके राजाने उसे सुन्दर आसन समर्पित किया और पैर धुलाकर उसका यथोचित पूजन करनेके पश्चात् उत्तमोत्तम अन्न देकर उसे तृप्त किया ॥ १४ ॥
अथ भुक्तवती प्रीता राजानं मन्त्रिभिर्वृतम् ।
सर्वभाष्यविदां मध्ये चोदयामास भिक्षुकी ॥ १५ ॥
भोजन करके संतुष्ट हुई संन्यासिनी सुलभाने सम्पूर्ण भाष्यवेत्ता विद्वानोंके बीचमें मन्त्रियोंसे घिरकर बैठे हुए राजा जनकसे कुछ प्रश्न करनेका विचार किया ॥ १५ ॥
सुलभा त्वस्य धर्मेषु मुक्तो नेति ससंशया ।
सत्त्वं सत्त्वेन योगज्ञा प्रविवेश महीपतेः ॥ १६ ॥
सुलभा मोक्षधर्मके विषयमें राजासे कुछ पूछना चाहती थी। उसके मनमें यह संदेह था कि राजा जनक जीवन्मुक्त हैं या नहीं। वह योगशक्तियोंकी जानकार तो थी ही, अपनी सूक्ष्म बुद्धिद्वारा राजाकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो गयी ॥ १६ ॥
नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्य रश्मीन् संयम्य रश्मिभिः ।
सा स्म तं चोदयिष्यन्ती योगबन्धैर्बबन्ध ह ॥ १७ ॥
राजा जनकसे प्रश्न करनेके लिये उद्यत हो उसने अपने नेत्रोंकी किरणोंद्वारा उनके नेत्रोंकी किरणोंको संयत करके योगबलसे उनके चित्तको बाँधकर उन्हें वशमें कर लिया ॥ १७ ॥
जनकोऽप्युत्स्मयन् राजा भावमस्या विशेषयन् ।
प्रतिजग्राह भावेन भावमस्या नृपोत्तम ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! तब राजा जनकने सुलभाके अभिप्रायको जानकर उसका आदर करते हुए मुस्कराकर अपने भावद्वारा उसके भावको ग्रहण कर लिया ॥ १८ ॥
तदेकस्मिन्नधिष्ठाने संवादः श्रूयतामयम् ।
छत्रादिषु विमुक्तस्य मुक्तायाश्च त्रिदण्डके ॥ १९ ॥
फिर छत्र आदि राजचिह्नोंसे रहित हुए राजा जनक और त्रिदण्डरूप संन्यास-चिह्नसे मुक्त हुई सुलभाका एक ही शरीरमें रहकर जो संवाद हुआ था, उसे सुनो ॥ १९ ॥

जनक उवाच