भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2105

किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती (धन और ऐश्वर्य आदिसे उनकी निवृत्ति नहीं

होती, परंतु ज्ञानसे तो पुनर्जन्मकी भी निवृत्ति हो जाती है; फिर जरा और मृत्युकी तो बात

ही क्या?) ।। ६ ।।

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः ।

सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुवः ।। ७ ।।

दिन, रात और महीनोंके जो चक्र चल रहे हैं, वे किसीके टाले नहीं टलते हैं। इसी

प्रकार जन्म, मृत्यु और जरा आदिके क्रम प्रायः चलते ही रहते हैं। जिसके जीवनका कुछ

ठिकाना नहीं, वह मरणधर्मा मानव कभी दीर्घ-कालके पश्चात् नित्यपथ (मोक्षमार्ग) का

आश्रय लेता है ।।

सर्वभूतसमुच्छेदः स्रोतसेवोह्यते सदा ।

ऊह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे ।। ८ ।।

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदभिपद्यते ।

काल समस्त प्राणियोंका उच्छेद कर डालता है। जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको

बहाये लिये जाता है, उसी प्रकार काल सदा ही प्राणियोंको अपने वेगसे बहाया करता है।

यह काल बिना नौकाके समुद्रकी भाँति लहरा रहा है। जरा और मृत्यु विशाल ग्राहका रूप

धारण करके उसमें बैठे हुए हैं। उस काल-सागरमें बहते और डूबते हुए जीवको कोई भी

बचा नहीं सकता ।। ८ १/२ ।।

नैवास्य कश्चिद् भवति नासौ भवति कस्यचित् ।। ९ ।।

पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ।

नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित् ।। १० ।।

यहाँ इस जीवका कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसीका अपना नहीं है। रास्तेमें

मिले हुए राहगीरोंके समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंका साथ हो जाता है, परंतु

यहाँ पहले कभी किसीने किसीके साथ चिरकालतक सहवासका सुख नहीं उठाया है ।।

क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निघ्नन्तः पुनः पुनः ।

कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचयाः ।। ११ ।।

जैसे गर्जते हुए बादलोंको हवा बारंबार उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार

काल यहाँ जन्म लेनेवाले प्राणियोंको उनके रोने-चिल्लानेपर भी विनाशी आगमें झोंक

देता है ।। ११ ।।

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।

बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १२ ।।

कोई बलवान् हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत

व्याघ्रकी भाँति खा जाती है ।। १२ ।।

एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूतोऽध्रुवेषु च ।