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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती (धन और ऐश्वर्य आदिसे उनकी निवृत्ति नहीं

होती, परंतु ज्ञानसे तो पुनर्जन्मकी भी निवृत्ति हो जाती है; फिर जरा और मृत्युकी तो बात

ही क्या?) ।। ६ ।।

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः ।

सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुवः ।। ७ ।।

दिन, रात और महीनोंके जो चक्र चल रहे हैं, वे किसीके टाले नहीं टलते हैं। इसी

प्रकार जन्म, मृत्यु और जरा आदिके क्रम प्रायः चलते ही रहते हैं। जिसके जीवनका कुछ

ठिकाना नहीं, वह मरणधर्मा मानव कभी दीर्घ-कालके पश्चात् नित्यपथ (मोक्षमार्ग) का

आश्रय लेता है ।।

सर्वभूतसमुच्छेदः स्रोतसेवोह्यते सदा ।

ऊह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे ।। ८ ।।

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदभिपद्यते ।

काल समस्त प्राणियोंका उच्छेद कर डालता है। जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको

बहाये लिये जाता है, उसी प्रकार काल सदा ही प्राणियोंको अपने वेगसे बहाया करता है।

यह काल बिना नौकाके समुद्रकी भाँति लहरा रहा है। जरा और मृत्यु विशाल ग्राहका रूप

धारण करके उसमें बैठे हुए हैं। उस काल-सागरमें बहते और डूबते हुए जीवको कोई भी

बचा नहीं सकता ।। ८ १/२ ।।

नैवास्य कश्चिद् भवति नासौ भवति कस्यचित् ।। ९ ।।

पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ।

नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित् ।। १० ।।

यहाँ इस जीवका कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसीका अपना नहीं है। रास्तेमें

मिले हुए राहगीरोंके समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंका साथ हो जाता है, परंतु

यहाँ पहले कभी किसीने किसीके साथ चिरकालतक सहवासका सुख नहीं उठाया है ।।

क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निघ्नन्तः पुनः पुनः ।

कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचयाः ।। ११ ।।

जैसे गर्जते हुए बादलोंको हवा बारंबार उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार

काल यहाँ जन्म लेनेवाले प्राणियोंको उनके रोने-चिल्लानेपर भी विनाशी आगमें झोंक

देता है ।। ११ ।।

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।

बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १२ ।।

कोई बलवान् हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत

व्याघ्रकी भाँति खा जाती है ।। १२ ।।

एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूतोऽध्रुवेषु च ।

कथं हि हृष्येज्जातेषु मृतेषु च कथं ज्वरेत् ॥ १३ ॥
इस प्रकार जब सभी प्राणी विनाशशील ही हैं, तब नित्य-स्वरूप जीवात्मा उन प्राणियोंके लिये जन्म लेनेपर हर्ष किसलिये माने और मर जानेपर शोक क्यों करे? ।। १३ ।।

कुतोऽहमागतः कोऽस्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा ।
कस्मिन् स्थितः क्व भविता कस्मात्किमनुशोचसि ॥ १४ ॥
मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? कहाँ जाऊँगा? किसके साथ मेरा क्या सम्बन्ध है? किस स्थानमें स्थित होकर कहाँ फिर जन्म लूँगा? इन सब बातोंको लेकर तुम किसलिये क्या शोक कर रहे हो? ।। १४ ।।

द्रष्टा स्वर्गस्य कोऽन्योऽस्ति तथैव नरकस्य च ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च ॥ १५ ॥
जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, उसके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और नरकका दर्शन एवं उपभोग करेगा; अतः शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए सब लोगोंको दान और यज्ञ आदि सत्कर्म करते रहना चाहिये ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखजनकसंवादे
एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिख और जनकका संवादविषयक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१९ ।।

३२०-

⬅ विषय-सूची (TOC)

विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना

युधिष्ठिर उवाच

अपरित्यज्य गार्हस्थ्यं कुरुराजर्षिसत्तम ।
कः प्राप्तो विनयं बुद्ध्या मोक्षतत्त्वं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुकुलराजर्षिशिरोमणि! जहाँ बुद्धिका लय हो जाता है, उस मोक्षतत्त्वको गृहस्थाश्रमका त्याग बिना किये कौन पुरुष प्राप्त हुआ है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

संन्यस्यते यथाऽऽत्मायं व्यक्तस्यात्मा यथा च यत् ।
परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! यह मनुष्यशरीर जिस प्रकार स्थूल शरीरका त्याग करता है और जिस प्रकार स्थूल शरीरका आत्मा सूक्ष्म शरीरका त्याग करता है अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म—इन दोनों शरीरोंके अभिमानसे जिस प्रकार रहित हो सकता है एवं उनके त्यागका जो स्वरूप है और जो मोक्षका तत्त्व है, वह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
जनकस्य च संवादं सुलभायाश्च भारत ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें जानकार मनुष्य जनक और सुलभाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

संन्यासफलिकः कश्चिद् बभूव नृपतिः पुरा ।
मैथिलो जनको नाम धर्मध्वज इति श्रुतः ॥ ४ ॥
प्राचीन कालमें मिथिलापुरीके कोई एक राजा जनक हो गये हैं, जो धर्मध्वज नामसे प्रसिद्ध थे। उन्हें (गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी) संन्यासका जो सम्यग्ज्ञानरूप फल है, वह प्राप्त हो गया था ॥ ४ ॥

स वेदे मोक्षशास्त्रे च स्वे च शास्त्रे कृतश्रमः ।
इन्द्रियाणि समाधाय शशास वसुधामिमाम् ॥ ५ ॥

उन्होंने वेदमें, मोक्षशास्त्रमें तथा अपने शास्त्र (दण्डनीति)-में भी बड़ा परिश्रम किया था। वे इन्द्रियोंको एकाग्र करके इस वसुन्धराका शासन करते थे ।। ५ ।। तस्य वेदविदः प्राज्ञाः श्रुत्वा तां साधुवृत्तताम् । लोकेषु स्पृहयन्त्यन्ये पुरुषाः पुरुषेश्वर ॥ ६ ॥ नरेश्वर! वेदोंके ज्ञाता विद्वान् पुरुष उनकी उस साधुवृत्तिका समाचार सुनकर उन्हींके समान सज्जन होनेकी इच्छा करते थे ।। ६ ।। अथ धर्मयुगे तस्मिन् योगधर्ममनुष्ठिता । महीमनुचचारैका सुलभा नाम भिक्षुकी ॥ ७ ॥ वह धर्मप्रधान युगका समय था। उन दिनों सुलभा नामवाली एक संन्यासिनी योगधर्मके अनुष्ठानद्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही इस पृथ्वीपर विचरण करती थी ।। ७ ।। तया जगदिदं कृत्स्नमटन्त्या मिथिलेश्वरः । तत्र तत्र श्रुतो मोक्षे कथ्यमानस्त्रिदण्डिभिः ॥ ८ ॥ इस सम्पूर्ण जगत्में घूमती हुई सुलभाने यत्र-तत्र अनेक स्थानोंमें त्रिदण्डी संन्यासियोंके मुखसे मोक्षतत्त्वकी जानकारीके विषयमें मिथिलापति राजा जनककी प्रशंसा सुनी ।। ८ ।। सातिसूक्ष्मां कथां श्रुत्वा तथ्यं नेति ससंशया । दर्शने जातसंकल्पा जनकस्य बभूव ह ॥ ९ ॥ उनके द्वारा कही जानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म-विषयक वार्ता दूसरोंके मुखसे सुनकर सुलभाके मनमें यह संदेह हुआ कि पता नहीं जनकके सम्बन्धमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे सत्य हैं या नहीं। यह संशय उत्पन्न होनेपर उसके हृदयमें राजा जनकके दर्शनका संकल्प उदित हुआ ।। ९ ।। तत्र सा विप्रहायाथ पूर्वरूपं हि योगतः । अबिभ्रदनवद्याङ्गी रूपमन्यदनुत्तमम् ॥ १० ॥ चक्षुर्निमेषमात्रेण लघ्वस्त्रगतिगामिनी । विदेहानां पुरीं सुभ्रूर्जगाम कमलेक्षणा ॥ ११ ॥ उसने योगशक्तिसे अपना पहला शरीर छोड़कर दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया। अब उसका प्रत्येक अंग अनिन्द्य सौन्दर्यसे प्रकाशित होने लगा। सुन्दर भौंहोंवाली वह कमलनयनी बाला बाणोंके समान तीव्र गतिसे चलकर पलभरमें विदेहदेशकी राजधानी मिथिलामें जा पहुँची ।। १०-११ ।। सा प्राप्य मिथिलां रम्यां प्रभूतजनसंकुलाम् । भैक्ष्यचर्यापदेशेन ददर्श मिथिलेश्वरम् ॥ १२ ॥ प्रचुर जनसमुदायसे भरी हुई उस रमणीय मिथिलानगरीमें पहुँचकर संन्यासिनी सुलभाने भिक्षा लेनेके बहाने मिथिलानरेशका दर्शन किया ।। १२ ।। राजा तस्याः परं दृष्ट्वा सौकुमार्यं वपुस्तदा ।

केयं कस्य कुतो वेति बभूवागतविस्मयः ॥ १३ ॥
उसके परम सुकुमार शरीर और सौन्दर्यको देखकर राजा जनक आश्चर्यसे चकित हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे, 'यह कौन है, किसकी है अथवा कहाँसे आयी है?' ॥ १३ ॥
ततोऽस्याः स्वागतं कृत्वा व्यादिश्य च वरासनम् ।
पूजितां पादशौचेन वरान्नेनाप्यतर्पयत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर उसका स्वागत करके राजाने उसे सुन्दर आसन समर्पित किया और पैर धुलाकर उसका यथोचित पूजन करनेके पश्चात् उत्तमोत्तम अन्न देकर उसे तृप्त किया ॥ १४ ॥
अथ भुक्तवती प्रीता राजानं मन्त्रिभिर्वृतम् ।
सर्वभाष्यविदां मध्ये चोदयामास भिक्षुकी ॥ १५ ॥
भोजन करके संतुष्ट हुई संन्यासिनी सुलभाने सम्पूर्ण भाष्यवेत्ता विद्वानोंके बीचमें मन्त्रियोंसे घिरकर बैठे हुए राजा जनकसे कुछ प्रश्न करनेका विचार किया ॥ १५ ॥
सुलभा त्वस्य धर्मेषु मुक्तो नेति ससंशया ।
सत्त्वं सत्त्वेन योगज्ञा प्रविवेश महीपतेः ॥ १६ ॥
सुलभा मोक्षधर्मके विषयमें राजासे कुछ पूछना चाहती थी। उसके मनमें यह संदेह था कि राजा जनक जीवन्मुक्त हैं या नहीं। वह योगशक्तियोंकी जानकार तो थी ही, अपनी सूक्ष्म बुद्धिद्वारा राजाकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो गयी ॥ १६ ॥
नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्य रश्मीन् संयम्य रश्मिभिः ।
सा स्म तं चोदयिष्यन्ती योगबन्धैर्बबन्ध ह ॥ १७ ॥
राजा जनकसे प्रश्न करनेके लिये उद्यत हो उसने अपने नेत्रोंकी किरणोंद्वारा उनके नेत्रोंकी किरणोंको संयत करके योगबलसे उनके चित्तको बाँधकर उन्हें वशमें कर लिया ॥ १७ ॥
जनकोऽप्युत्स्मयन् राजा भावमस्या विशेषयन् ।
प्रतिजग्राह भावेन भावमस्या नृपोत्तम ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! तब राजा जनकने सुलभाके अभिप्रायको जानकर उसका आदर करते हुए मुस्कराकर अपने भावद्वारा उसके भावको ग्रहण कर लिया ॥ १८ ॥
तदेकस्मिन्नधिष्ठाने संवादः श्रूयतामयम् ।
छत्रादिषु विमुक्तस्य मुक्तायाश्च त्रिदण्डके ॥ १९ ॥
फिर छत्र आदि राजचिह्नोंसे रहित हुए राजा जनक और त्रिदण्डरूप संन्यास-चिह्नसे मुक्त हुई सुलभाका एक ही शरीरमें रहकर जो संवाद हुआ था, उसे सुनो ॥ १९ ॥

जनक उवाच

भगवत्याः क्व चर्यैयं कृता क्व च गमिष्यसि ।
कस्य च त्वं कुतो वेति पप्रच्छैनां महीपतिः ॥ २० ॥
**जनकने पूछा—**भगवति! आपको यह संन्यासकी दीक्षा कहाँसे प्राप्त हुई है, आप कहाँ जायँगी? किसकी हैं और कहाँसे यहाँ आपका शुभागमन हुआ है? ये सब बातें राजा जनकने सुलभासे पूछीं ॥ २० ॥

श्रुते वयसि जातौ च सद्भावो नाधिगम्यते ।
एष्वर्थेषूत्तरं तस्मात् प्रवेद्यं मत्समागमे ॥ २१ ॥
वे बोले, किसीसे पूछे बिना उसके शास्त्रज्ञान, अवस्था और जातिके विषयमें सच्ची बात नहीं मालूम होती; अतः मेरे साथ जो तुम्हारा समागम हुआ है, इस अवसरपर इन सब विषयोंकी जानकारीके लिये यथार्थ उत्तर जानना आवश्यक है ॥ २१ ॥

छत्रादिषु विशेषेषु मुक्तं मां विद्धि तत्त्वतः ।
स त्वां सम्मन्तुमिच्छामि मानार्हा हि मतासि मे ॥ २२ ॥
छत्र आदि जो विशेष राजोचित चिह्न हैं, उन्हें इस समय मैं त्याग चुका हूँ; अतः अब आप मुझे यथार्थरूपसे जान लें। मैं आपका सम्मान करना चाहता हूँ; क्योंकि आप मुझे सम्मानके योग्य जान पड़ती हैं ॥ २२ ॥

यस्माच्चैतन्मया प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा ।
यस्य नान्यः प्रवक्तास्ति मोक्षं तमपि मे शृणु ॥ २३ ॥
मैंने पूर्वकालमें सर्वश्रेष्ठ मोक्षविषयक ज्ञान जिनसे प्राप्त किया था, जिसका उनके सिवा दूसरा कोई प्रतिपादन करनेवाला नहीं है, उस ज्ञान और ज्ञानदाता गुरुका भी परिचय आप मुझसे सुनो ॥ २३ ॥

पराशरसगोत्रस्य वृद्धस्य सुमहात्मनः ।
भिक्षोः पञ्चशिखस्याहं शिष्यः परमसंमतः ॥ २४ ॥
पराशरगोत्री संन्यास-धर्मावलम्बी वृद्ध महात्मा पंचशिख मेरे गुरु हैं। मैं उनका परम प्रिय शिष्य हूँ ॥

सांख्यज्ञाने च योगे च महीपालविधौ तथा ।
त्रिविधे मोक्षधर्मेऽस्मिन् गताध्वा छिन्नसंशयः ॥ २५ ॥
सांख्यज्ञान, योगविद्या तथा राजधर्म—इन तीन प्रकारके मोक्षधर्ममें मुझे गन्तव्य मार्ग गुरुदेवसे प्राप्त हो चुका है। इन विषयोंके मेरे सारे संशय दूर हो गये हैं ॥

स यथाशास्त्रदृष्टेन मार्गेणेह परिभ्रमन् ।
वार्षिकांश्चतुरो मासान् पुरा मयि सुखोषितः ॥ २६ ॥
पहलेकी बात है, वे आचार्यचरण शास्त्रोक्त मार्गसे चलते हुए घूमते-घामते इधर आ निकले और वर्षा-ऋतुके चार महीने मेरे यहाँ सुखपूर्वक रहे ॥ २६ ॥

तेनाहं सांख्यमुख्येन सुदृष्टार्थेन तत्त्वतः ।

श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्धि चालितः ॥ २७ ॥
वे सांख्यशास्त्रके प्रमुख विद्वान् हैं और सारा सिद्धान्त उन्हें यथावत् रूपसे प्रत्यक्षकी भाँति ठीक-ठीक ज्ञात है। उन्होंने मुझे त्रिविध मोक्षधर्म श्रवण कराया है, परंतु राज्यसे दूर हटनेकी आज्ञा नहीं दी है ॥ २७ ॥
सोऽहं तामखिलां वृत्तिं त्रिविधां मोक्षसंहिताम् ।
मुक्तरागश्चराम्येकः पदे परमके स्थितः ॥ २८ ॥
इस प्रकार उपदेश पाकर मैं विषयोंकी आसक्तिसे रहित हो मुक्तिविषयक तीन प्रकारकी समस्त वृत्तियोंका आचरण करता हूँ और अकेला ही परमपदमें स्थित हूँ ॥
वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमो विधिः ।
ज्ञानादेव च वैराग्यं जायते येन मुच्यते ॥ २९ ॥
वैराग्य ही इस मुक्तिका प्रधान कारण है और ज्ञानसे ही वह वैराग्य प्राप्त होता है, जिससे मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ २९ ॥
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् ।
महद् द्वन्द्वप्रमोक्षाय सा सिद्धिर्या वयोऽतिगा ॥ ३० ॥
मनुष्य ज्ञानके द्वारा मुक्ति पानेके लिये यत्न करता है। उस यत्नसे महान् आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है। वह महान् आत्मज्ञान ही सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे छुटकारा दिलानेका साधन है, वही सिद्धि है, जो काल (मृत्यु)-को भी लाँघ जानेवाली है ॥ ३० ॥
सेयं परमिका बुद्धेः प्राप्ता निर्द्वन्द्वता मया ।
इहैव गतमोहेन चरता मुक्तसङ्गिना ॥ ३१ ॥
मेरा मोह दूर हो गया है। मैं समस्त संसर्गोंका त्याग कर चुका हूँ; इसलिये मैंने इस गृहस्थधर्ममें रहते हुए ही बुद्धिकी परम निर्द्वन्द्वता प्राप्त कर ली है ॥ ३१ ॥
यथा क्षेत्रं मृदूभूतमद्भिराप्लावितं तथा ।
जनयत्यङ्कुरं कर्म नृणां तद्वत् पुनर्भवम् ॥ ३२ ॥
जैसे जिस खेतको जोतकर खूब मुलायम बना दिया गया हो और यथासमय उसे पानीसे सींचा गया हो, वही बोये हुए बीजमें अंकुर उत्पन्न करता है, उसी प्रकार मनुष्योंका शुभ-अशुभ कर्म ही पुनर्जन्मका उत्पादन करता है ॥ ३२ ॥
यथा चोत्तापितं बीजं कपाले यत्र तत्र वा ।
प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमबीजत्वान्न जायते ॥ ३३ ॥
तद्वद् भगवनानेन शिखा प्रोक्तेन भिक्षुणा ।
ज्ञानं कृतमबीजं मे विषयेषु न जायते ॥ ३४ ॥
जैसे मिट्टीके खपरेमें या और किसी भी बर्तनमें भूना गया बीज बीज न रह जानेके कारण अंकुर उगाने योग्य खेतमें पड़कर भी नहीं जमता है, उसी प्रकार मेरे संन्यासी गुरु

भगवान् पंचशिखने मुझे जो ज्ञान प्रदान किया है, वह निर्बीज है। इसलिये विषयोंके क्षेत्रमें अंकुरित नहीं होता है ॥ ३३-३४ ॥ नाभिरज्यति कस्मिंश्चिन्नानर्थे न परिग्रहे । नाभिरज्यति चैतेषु व्यर्थत्वाद् रागरोषयोः ॥ ३५ ॥ मेरी बुद्धि किसी अनर्थमें अथवा भोगोंके संग्रहमें भी आसक्त नहीं होती है। स्त्री आदिके विषयमें जो अनुराग और शत्रु आदिके विषयमें जो क्रोध होता है, वह व्यर्थ होनेके कारण उसकी ओर मेरी बुद्धिकी प्रवृत्ति नहीं होती है ॥ ३५ ॥ यश्च मे दक्षिणं बाहुं चन्दनेन समुक्षयेत् । सव्यं वास्यापि यस्तक्षेत समावेतावुभौ मम ॥ ३६ ॥ जो मेरी दाहिनी बाँहपर चन्दन छिड़के और जो बायीं बाँहको बसूलेसे काटे तो ये दोनों ही मनुष्य मेरे लिये एक समान हैं ॥ ३६ ॥ सुखी सोऽहमवाप्तार्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । मुक्तसङ्गः स्थितो राज्ये विशिष्टोऽन्यैस्त्रिदण्डिभिः ॥ ३७ ॥ मैं आप्तकाम होकर सदा सुखका अनुभव करता हूँ। मेरी दृष्टिमें मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्ण सब एक-से हैं। मैं आसक्तिरहित होकर राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ। अतः अन्य त्रिदण्डी साधुओंसे मेरा स्थान विशिष्ट है ॥ ३७ ॥ मोक्षे हि त्रिविधा निष्ठा दृष्टान्यैर्मोक्षवित्तमैः । ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥ ३८ ॥ अलौकिक जो ज्ञान है, अलौकिक जो संन्यास है तथा जो कर्मोंका अलौकिक अनुष्ठान है अर्थात् निष्काम भावसे कर्मोंका करना है—इन तीन प्रकारकी निष्ठाओंको ही मोक्षवेत्ता विद्वानोंने मोक्षका उपाय देखा और समझा है ॥ ३८ ॥ ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः । कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ३९ ॥ मोक्षशास्त्रका ज्ञान रखनेवाले एक श्रेणीके लोग कहते हैं कि ज्ञाननिष्ठा ही मोक्षका साधन है तथा दूसरे सूक्ष्मदर्शी यति लोग कर्मनिष्ठाको ही मुक्तिका उपाय बताते हैं ॥ ३९ ॥ प्रहायोभयमप्येव ज्ञानं कर्म च केवलम् । तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥ ४० ॥ किंतु उन महात्मा पंचशिखाचार्यने पूर्वोक्त केवल ज्ञान और केवल कर्म—इन दोनों पक्षोंका परित्याग करके एक तीसरी निष्ठा बतायी है ॥ ४० ॥ यमे च नियमे चैव कामे द्वेषे परिग्रहे । माने दम्भे तथा स्नेहे सदृशास्ते कुटुम्बिभिः ॥ ४१ ॥ यम, नियम, काम, द्वेष, परिग्रह, मान, दम्भ तथा स्नेह करके उनसे होनेवाले लाभ और हानिमें संन्यासी भी गृहस्थोंके ही तुल्य है अर्थात् यम-नियम आदिका अभ्यास करनेपर

गृहस्थ भी मोक्षलाभ कर सकते हैं और कामना तथा द्वेष होनेपर संन्यासी भी मुक्तिसे वंचित हो सकते हैं॥ ४१॥

त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञानेन कस्यचित्।
छत्रादिषु कथं न स्यात् तुल्यहेतौ परिग्रहे॥ ४२॥
संन्यासी त्रिदण्ड आदि धारण करते हैं और गृहस्थ नरेश छत्र-चाँवर आदि। यदि त्रिदण्ड धारण करनेपर किसीको ज्ञानद्वारा मोक्ष प्राप्त हो सकता है तो छत्र आदि धारण करनेपर दूसरेको उसी ज्ञानके द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त नहीं हो सकता? क्योंकि प्रतिबन्धका कारण परिग्रह दोनोंके लिये समान है—एक त्रिदण्ड आदिका संग्रह करता है और दूसरा छत्र आदिका॥ ४२॥

येन येन हि यस्यार्थः कारणेनेह कर्मणि।
तत्तदालम्बते सर्वः स्वे स्वे स्वार्थपरिग्रहे॥ ४३॥
अपने-अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये जिस मनुष्यको जिस-जिस साधनभूत वस्तुसे प्रयोजन होता है, वे सभी अपना-अपना काम बनानेके लिये उन-उन वस्तुओंका आश्रय लेते हैं॥ ४३॥

दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरे।
उत्सृजन् परिगृह्णांश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते॥ ४४॥
जो गृहस्थ-आश्रममें दोष देखकर उसका परित्याग करके दूसरे आश्रममें चला जाता है, वह भी कुछ छोड़ता है और कुछ ग्रहण करता है; अतः उसे भी संगदोषसे छुटकारा नहीं मिलता है॥ ४४॥

आधिपत्ये तथा तुल्ये निग्रहानुग्रहात्मके।
राजभिर्भिक्षुकास्तुल्या मुच्यन्ते केन हेतुना॥ ४५॥
किसीका निग्रह और किसीपर अनुग्रह करना ही आधिपत्य (प्रभुत्व) कहलाता है। यह जैसे राजाओंमें है, वैसे संन्यासियोंमें भी है। इस दृष्टिसे जब संन्यासी भी राजाओंके ही समान हैं, तब केवल वे ही मुक्त होते हैं—ऐसा माननेका क्या कारण है?॥ ४५॥

अथ सत्याधिपत्येऽपि ज्ञानेनैवेह केवलम्।
मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो देहे परमके स्थिताः॥ ४६॥
मनुष्यरूप उत्तम शरीरमें स्थित हुए प्राणी प्रभुत्व रखते हुए भी केवल ज्ञानके ही बलसे यहाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ४६॥

काषायधारणं मौण्ड्यं त्रिविष्टब्धं कमण्डलुम्।
लिङ्गान्युत्पथभूतानि न मोक्षायेति मे मतिः॥ ४७॥
मेरी तो यह धारणा है कि गेरुआ वस्त्र पहनना, मस्तक मुड़ा लेना तथा त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करना—ये सब उत्कृष्ट संन्यासमार्गका परिचय देनेवाले चिह्नमात्र हैं। इनके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं होती॥

यदि सत्यपि लिङ्गेऽस्मिन् ज्ञानमेवात्र कारणम् । निर्मोक्षायेह दुःखस्य लिङ्गमात्रं निरर्थकम् ॥ ४८ ॥ यदि इन चिह्नोंके रहते हुए भी यहाँ दुःखसे सर्वथा मोक्ष पानेके लिये एकमात्र ज्ञान ही उपाय है तो जितने भी चिह्न धारण किये जाते हैं, वे सब निरर्थक हैं ॥ ४८ ॥ अथवा दुःखशैथिल्यं वीक्ष्य लिङ्गे कृता मतिः । किं तदेवार्थसामान्यं छात्रादिषु न लक्ष्यते ॥ ४९ ॥ अथवा यदि कहें कि त्रिदण्ड और गैरिक वस्त्र आदि धारण करनेसे कुछ सुविधा प्राप्त होती है और कष्ट कम होता है, इसलिये संन्यासियोंने उन चिह्नोंको धारण करनेका विचार किया है तो छत्र आदि धारण करनेमें भी इसी सामान्य प्रयोजनकी ओर क्यों न दृष्टि रखी जाय? ॥ ४९ ॥ आकिंचन्ये न मोक्षोऽस्ति किंचन्ये नास्ति बन्धनम् । किंचन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते ॥ ५० ॥ न तो अकिंचनता (दरिद्रता)-में मोक्ष है और न किंचनता (आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होने)-में बन्धन ही है। धन और निर्धनता दोनों ही अवस्थाओंमें ज्ञानसे ही जीवको मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ५० ॥ तस्माद् धर्मार्थकामेषु तथा राज्यपरिग्रहे । बन्धनायतनेष्वेषु विद्ध्यबन्धे पदे स्थितम् ॥ ५१ ॥ इसलिये धर्म, अर्थ, काम तथा राज्यपरिग्रह—इन बन्धनके स्थानोंमें रहते हुए भी मुझे आप बन्धनरहित (जीवन्मुक्त) पदपर प्रतिष्ठित समझें ॥ ५१ ॥ राज्यैश्वर्यमयः पाशः स्नेहायतनबन्धनः । मोक्षाश्मनिशितेनेह छिन्नस्त्यागासिना मया ॥ ५२ ॥ मैंने मोक्षरूपी पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए त्याग-वैराग्यरूपी तलवारसे राज्य और ऐश्वर्यरूपी पाशको तथा स्नेहके आश्रयभूत स्त्री-पुत्र आदिके ममत्वरूपी बन्धनको काट डाला है ॥ ५२ ॥ सोऽहमेवंगतो मुक्तो जातास्थस्त्वयि भिक्षुकि । अयथार्थं हि ते वर्णं वक्ष्यामि शृणु तन्मम ॥ ५३ ॥ संन्यासिनि! इस प्रकार मैं जीवन्मुक्त हूँ। आपमें योगका प्रभाव देखकर यद्यपि आपके प्रति मेरी आस्था और आदर-बुद्धि हो गयी है तथापि मैं आपके इस रूप और सौन्दर्यको योगसाधनाके योग्य नहीं मानता, अतः इस विषयमें मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरे उस वचनको आप सुनिये ॥ ५३ ॥ सौकुमार्यं तथा रूपं वपुरग्र्यं तथा वयः । तवैतानि समस्तानि नियमश्चेति संशयः ॥ ५४ ॥

सुकुमारता, सौन्दर्य, मनोहर शरीर तथा यौवनावस्था—ये सारी वस्तुएँ योगके विरुद्ध हैं; फिर भी आपमें इन सब गुणोंके साथ-साथ योग और नियम भी हैं ही, यह कैसे सम्भव हुआ? यही मेरे मनमें संदेह है ।। ५४ ।। यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् । मुक्तोऽयं स्यान्न वेति स्याद् धर्षितो मत्परिग्रहः ।। ५५ ।। यह जो त्रिदण्डधारणरूप चिह्न है, उसके अनुरूप आपकी कोई चेष्टा नहीं है। यह मुक्त है या नहीं, इसकी परीक्षा लेनेके लिये आपने मेरे शरीरको अभिभूत कर दिया है—उसपर बलात् अधिकार जमा लिया है ।। ५५ ।। न च कामसमायुक्ते युक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डके । न रक्ष्यते त्वया चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ।। ५६ ।। मनुष्य योगयुक्त होकर भी यदि कामभोगमें आसक्त हो जाय तो उसका त्रिदण्ड धारण करना अनुचित एवं व्यर्थ है। आप अपने इस बर्तावद्वारा संन्यास-आश्रमके नियमकी रक्षा नहीं कर रही हैं। यदि अपने स्वरूपको छिपानेके लिये आपने ऐसा किया हो तो जीवन्मुक्त पुरुषके लिये आत्मगोपन आवश्यक नहीं है ।। ५६ ।। मत्यक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रमः । आश्रयन्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ।। ५७ ।। आपने स्वभावतः सोच-समझकर मेरे पूर्व-शरीरका आश्रय लेनेकी चेष्टा की है, अतः मेरे पक्षका आश्रय लेने—मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो व्यतिक्रम बन गया है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। ५७ ।। प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरेऽपि वा । कस्य वा संनिकर्षात् त्वं प्रविष्टा हृदयं मम ।। ५८ ।। आपने किस कारणसे मेरे राज्य अथवा नगरमें प्रवेश किया है अथवा किसके संकेतसे आप मेरे हृदयमें घुस आयी हैं? ।। ५८ ।। वर्णप्रवरमुख्यासि ब्राह्मणी क्षत्रियस्त्वहम् । नावयोरेकयोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसंकरम् ।। ५९ ।। वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी जो कन्याएँ हैं, उन सबमें आप प्रमुख हैं। आप ब्राह्मणी हैं और मैं क्षत्रिय हूँ; अतः हम दोनोंका एकत्र संयोग होना कदापि उचित नहीं है; इसलिये आप वर्णसंकर नामक दोषका उत्पादन न कीजिये ।। ५९ ।। वर्तसे मोक्षधर्मेण त्वं गार्हस्थ्येऽहमाश्रमे । अयं चापि सुकष्टस्ते द्वितीयोऽऽश्रमसंकरः ।। ६० ।। आप मोक्षधर्म (संन्यास-आश्रम)-के अनुसार बर्ताव करती हैं और मैं गृहस्थ-आश्रममें स्थित हूँ; अतः आपके द्वारा यह दूसरा आश्रमसंकर नामक दोषका उत्पादन किया जा रहा है, जो अत्यन्त कष्टप्रद है ।।

सगोत्रां वासगोत्रां वा न वेद त्वां न वेत्थ माम् । सगोत्रमाविशन्त्यास्ते तृतीयो गोत्रसंकरः ॥ ६१ ॥ मैं यह भी नहीं जानता कि आप सगोत्रा हैं या असगोत्रा। इसी प्रकार आप भी मेरे विषयमें कुछ नहीं जानतीं। अतः मुझ सगोत्रमें प्रवेश करनेके कारण आपके द्वारा तीसरा गोत्रसंकर नामक दोष उत्पन्न किया गया है ॥ ६१ ॥

अथ जीवति ते भर्ता प्रोषितोऽप्यथवा क्वचित् । अगम्या परभार्येति चतुर्थो धर्मसंकरः ॥ ६२ ॥ यदि आपके पति जीवित हैं अथवा कहीं परदेशमें चले गये हैं तो आप परायी स्त्री होनेके कारण मेरे लिये सर्वथा अगम्य हैं। ऐसी दशामें आपका यह बर्ताव धर्मसंकर नामक चौथा दोष है ॥ ६२ ॥

सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि । अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुनः ॥ ६३ ॥ आप कार्य-साधनकी अपेक्षा रखकर अज्ञान अथवा मिथ्याज्ञानसे युक्त हो ये सब न करने योग्य कार्य कर डालनेको उद्यत हो गयी हैं ॥ ६३ ॥

अथवापि स्वतन्त्रासि स्वदोषेणेह कर्हिचित् । यदि किंचिच्छ्रुतं तेऽस्ति सर्वं कृतमनर्थकम् ॥ ६४ ॥ अथवा यदि आप स्वतन्त्र हैं तो कभी आपके द्वारा यदि कुछ शास्त्रका श्रवण किया गया हो तो आपने अपने ही दोषसे वह सब व्यर्थ कर दिया है ॥ ६४ ॥

इदमन्यच्चतुर्थं ते भावस्पर्शविघातकम् । दुष्टाया लक्ष्यते लिङ्गं विवृण्वत्याप्रकाशितम् ॥ ६५ ॥ आपका जो दोष छिपा हुआ था, उसे आपने स्वयं ही प्रकाशित कर दिया। इससे आप दुष्टा जान पड़ती हैं। आपकी दुष्टताका यह और चौथा चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहा है, जो हृदयकी प्रीतिपर आघात करनेवाला है ॥ ६५ ॥

न मय्येवाभिसंधिस्ते जयैषिण्या जये कृतः । येयं मत्परिषत् कृत्स्ना जेतुमिच्छसि तामपि ॥ ६६ ॥ आप अपनी विजय चाहती हैं। आपने केवल मुझे ही जीतनेकी इच्छा नहीं की है, अपितु यह जो मेरी सारी सभा बैठी है, इसे भी जीतना चाहती हैं ॥ ६६ ॥

तथार्हत्तस्ततश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि । मत्पक्षप्रतिघाताय स्वपक्षोद्भावनाय च ॥ ६७ ॥ आप मेरे पक्षकी पराजय और अपने पक्षकी विजयके लिये इन माननीय सभासदोंपर भी बारंबार अपनी दृष्टि फेंक रही हैं ॥ ६७ ॥

सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता । भूयः सृजसि योगांस्त्वं विषामृतमिवैकताम् ॥ ६८ ॥

आप अपनी असहिष्णुताजनित योगसमृद्धिके मोहसे मोहित हो विष और अमृतको एक करनेके समान कामके साथ योगका सम्बन्ध जोड़ रही हैं ॥ ६८ ॥ इच्छतोरत्र यो लाभः स्त्रीपुंसोरमृतोपमः । अलाभश्चापि रक्तस्य सोऽपि दोषो विषोपमः ॥ ६९ ॥ स्त्री और पुरुष जब एक-दूसरेको चाहते हों, उस समय उन्हें जो संयोग-सुखका लाभ होता है, वह अमृतके समान मधुर है। यदि अनुरक्त नारीको अनुरक्त पुरुषकी प्राप्ति नहीं हुई तो वह दोष विषके समान भयंकर होता है ॥ ६९ ॥ मा स्प्राक्षीः साधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय । कृतेयं हि विजिज्ञासा मुक्तो नेति त्वया मम । एतत् सर्वं प्रतिच्छन्नं मयि नार्हसि गूहितुम् ॥ ७० ॥ आप मेरा स्पर्श न करें। मेरे चरित्रको उत्तम और निष्कलंक समझें और अपने शास्त्र (संन्यास-धर्म)-का निरन्तर पालन करती रहें। आपने मेरे विषयमें यह जाननेकी इच्छा की थी कि यह राजा जीवन्मुक्त है या नहीं। यह सारा भाव आपके हृदयमें प्रच्छन्नभावसे स्थित था, अतः इस समय आप मुझसे इसको छिपा नहीं सकतीं ॥ ७० ॥ सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपतेः । तत् त्वं सत्रप्रतिच्छन्ना मयि नार्हसि गूहितुम् ॥ ७१ ॥ यदि आप अपने कार्यसे या किसी दूसरे राजाके कार्यसे यहाँ वेष बदलकर आयी हों तो अब आपके लिये यथार्थ बातको गुप्त रखना उचित नहीं है ॥ ७१ ॥ न राजानं मृषा गच्छेन्न द्विजातिं कथंचन । न स्त्रियं स्त्रीगुणोपेतां हन्युर्ह्येते मृषा गताः ॥ ७२ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह किसी राजाके पास या किसी ब्राह्मणके निकट अथवा स्त्रीजनोचित पातिव्रत्य गुणसे सम्पन्न किसी सती-साध्वी नारीके समीप छद्मवेष धारण करके न जाय; क्योंकि ये राजा, ब्राह्मण और पतिव्रता स्त्री उस छद्मवेषधारी मनुष्यके धोखा देनेपर उसपर कुपित हो उसका विनाश कर देते हैं ॥ ७२ ॥ राज्ञां हि बलमैश्वर्यं ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् । रूपयौवनसौभाग्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम् ॥ ७३ ॥ राजाओंका बल ऐश्वर्य है, वेदज्ञ ब्राह्मणोंका बल वेद है तथा स्त्रियोंका परम उत्तम बल रूप, यौवन और सौभाग्य है ॥ ७३ ॥ अत एतैर्बलैरेव बलिनः स्वार्थमिच्छता । आर्जवेनाभिगन्तव्या विनाशाय ह्यनार्जवम् ॥ ७४ ॥ ये इन्हीं बलोंसे बलवान् होते हैं। अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि चाहनेवाले पुरुषको इनके पास सरलभावसे जाना चाहिये; क्योंकि इनके प्रति किया हुआ कुटिल भाव विनाशका कारण बन जाता है ॥ ७४ ॥

सा त्वं जातिं श्रुतं वृत्तं भावं प्रकृतिमात्मनः । कृत्यमागपने चैव वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ७५ ॥ अतः संन्यासिनी! आपको अपनी जाति, शास्त्रज्ञान, चरित्र, अभिप्राय, स्वभाव एवं यहाँ आगमनका प्रयोजन भी यथार्थरूपसे बताना उचित है ॥ ७५ ॥

भीष्म उवाच

इत्येतैरसुखैर्वाक्यैरयुक्तैरसमञ्जसैः । प्रत्यादिष्टा नरेन्द्रेण सुलभा न व्यकम्पत ॥ ७६ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजा जनकने इन दुःखजनक, अयोग्य और असंगत वचनोंद्वारा उसका बड़ा तिरस्कार किया, तो भी सुलभा अपने मनमें तनिक भी विचलित नहीं हुई ॥ ७६ ॥

उक्तवाक्ये तु नृपतौ सुलभा चारुदर्शना । ततश्चारुतरं वाक्यं प्रचक्रमाथ भाषितुम् ॥ ७७ ॥ जब राजाकी बात समाप्त हो गयी, तब परम सुन्दरी सुलभाने अत्यन्त मधुर वचनोंमें भाषण देना आरम्भ किया ॥ ७७ ॥

सुलभोवाच

नवभिर्नवभिश्चैव दोषैर्वाग्बुद्धिदूषणैः । अपेतमुपपन्नार्थमष्टादशगुणान्वितम् ॥ ७८ ॥ सौक्ष्म्यं सांख्यक्रमौ चोभौ निर्णयः सप्रयोजनः । पञ्चैतान्यर्थजातानि वाक्यमित्युच्यते नृप ॥ ७९ ॥ सुलभा बोली—राजन्! वाणी और बुद्धिको दूषित करनेवाले जो नौ-नौ दोष हैं, उनसे रहित, अठारह गुणोंसे सम्पन्न और युक्तिसंगत अर्थसे युक्त पदसमूहको वाक्य कहते हैं। उस वाक्यमें सौक्ष्म्य, सांख्य, क्रम, निर्णय और प्रयोजन-ये पाँच प्रकारके अर्थ रहने चाहिये ॥ ७८-७९ ॥

एषामेकैकशोऽर्थानां सौक्ष्म्यादीनां स्वलक्षणम् । शृणु संसार्यमाणानां पदार्थपदवाक्यतः ॥ ८० ॥ ये जो सौक्ष्म्य आदि अर्थ हैं, ये पद, वाक्य, पदार्थ और वाक्यार्थरूपसे खोलकर बताये जा रहे हैं। आप इनमेंसे एक-एकका अलग-अलग लक्षण सुनिये ॥ ८० ॥

ज्ञानं ज्ञेयेषु भिन्नेषु यदा भेदेन वर्तते । तत्रातिशायिनी बुद्धिस्तत् सौक्ष्म्यमिति वर्तते ॥ ८१ ॥ जहाँ अनेक भिन्न-भिन्न ज्ञेय (अर्थ) उपस्थित हों और 'यह घट है, यह पट है' इस प्रकार वस्तुओंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता हो, ऐसे स्थलोंमें यथार्थ निर्णय करनेवाली जो बुद्धि है, उसीका नाम सौक्ष्म्य है ॥ ८१ ॥

दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतः । कंचिदर्थमभिप्रेत्य सा संख्येत्युपधार्यताम् ॥ ८२ ॥ जहाँ किसी विशेष अर्थको अभीष्ट मानकर उसके दोषों और गुणोंकी विभागपूर्वक गणना की जाती है, उस अर्थको संख्या अथवा सांख्य समझना चाहिये ॥

इदं पूर्वमिदं पश्चाद् वक्तव्यं यद् विवक्षितम् । क्रमयोगं तमप्याहुर्वाक्यं वाक्यविदो जनाः ॥ ८३ ॥ परिगणित गुणों और दोषोंमेंसे अमुक गुण या दोष पहले कहना चाहिये और अमुकको पीछे कहना अभीष्ट है। इस प्रकार जो पूर्वापरके क्रमका विचार होता है, उसका नाम क्रम है और जिस वाक्यमें ऐसा क्रम हो, उस वाक्यको वाक्यवेत्ता विद्वान् क्रमयुक्त कहते हैं ॥

धर्मकामार्थमोक्षेषु प्रतिज्ञाय विशेषतः । इदं तदिति वाक्यान्ते प्रोच्यते स विनिर्णयः ॥ ८४ ॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें किसी एकका विशेषरूपसे प्रतिपादन करनेकी प्रतिज्ञा करके प्रवचनके अन्तमें 'यही वह अभीष्ट विषय है' ऐसा कहकर जो सिद्धान्त स्थिर किया जाता है, उसीका नाम निर्णय है ॥ ८४ ॥

इच्छाद्वेषभवैर्दुःखैः प्रकर्षो यत्र जायते । तत्र या नृपते वृत्तिस्तत् प्रयोजनमिष्यते ॥ ८५ ॥ नरेश्वर! इच्छा अथवा द्वेषसे उत्पन्न हुए दुःखोंद्वारा जहाँ किसी एक प्रकारके दुःखकी प्रधानता हो जाय, वहाँ जो वृत्ति उदय होती है, उसीको प्रयोजन कहते हैं ॥ ८५ ॥

तान्येतानि यथोक्तानि सौक्ष्म्यादीनि जनाधिप । एकार्थसमवेतानि वाक्यं मम निशामय ॥ ८६ ॥ जनेश्वर! जिस वाक्यमें पूर्वोक्त सौक्ष्म्य आदि गुण एक अर्थमें सम्मिलित हों, मेरे वैसे ही वाक्यको आप श्रवण करें ॥ ८६ ॥

उपेतार्थमभिन्नार्थं न्यायवृत्तं न चाधिकम् । नाश्लक्ष्णं न च संदिग्धं वक्ष्यामि परमं ततः ॥ ८७ ॥ मैं ऐसा वाक्य बोलूँगी, जो सार्थक होगा। उसमें अर्थभेद नहीं होगा। वह न्याययुक्त होगा। उसमें आवश्यकतासे अधिक, कर्णकटु एवं संदेह-जनक पद नहीं होंगे। इस प्रकार मैं परम उत्तम वाक्य बोलूँगी ॥

न गुर्वक्षरसंयुक्तं पराङ्मुखसुखं न च । नानृतं न त्रिवर्गेण विरुद्धं नाप्यसंस्कृतम् ॥ ८८ ॥ मेरे इस वचनमें गुरु एवं निष्ठुर अक्षरोंका संयोग नहीं होगा; उसमें कोमलकान्त सुकुमार पदावली होगी। वह पराङ्मुख व्यक्तियोंके लिये सुखद नहीं होगा। वह न तो झूठ होगा न धर्म, अर्थ और कामके विरुद्ध और संस्कारशून्य ही होगा ॥ ८८ ॥

न न्यूनं कष्टशब्दं वा विक्रमाभिहितं न च ।

न शेषमनु कल्प्येन निष्कारणमहेतुकम् ।। ८९ ।।
मेरे उस वाक्यमें न्यूनपदत्व नामक दोष नहीं रहेगा, कष्टकर शब्दोंका प्रयोग नहीं होगा, उसका क्रमरहित उच्चारण नहीं होगा। उसमें दूसरे पदोंके अध्याहार और लक्षणकी आवश्यकता नहीं होगी। यह वाक्य निष्प्रयोजन और युक्तिशून्य भी नहीं होगा ।। ८९ ।।
कामात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् दैन्याच्चानार्यकात् तथा ।
ह्रीतोऽनुक्रोशतो मानान्न वक्ष्यामि कथंचन ।। ९० ।।
मैं काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्यता, लज्जा, दया तथा अभिमानसे किसी तरह कोई बात नहीं बोलूँगी ।। ९० ।।
वक्ता श्रोता च वाक्यं च यदा त्वविकलं नृप ।
सममेति विवक्षायां तदा सोऽर्थः प्रकाशते ।। ९१ ।।
नरेश्वर! बोलनेकी इच्छा होनेपर जब वक्ता, श्रोता और वाक्य—तीनों अविकलभावसे सम-स्थितिमें आ जाते हैं, तब वक्ताका कहा हुआ अर्थ प्रकाशित होता है (श्रोताके समझमें आ जाता है) ।। ९१ ।।
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्य वै ।
स्वार्थमाह परार्थं तत् तदा वाक्यं न रोहति ।। ९२ ।।
जब बोलते समय वक्ता श्रोताकी अवहेलना करके दूसरेके लिये अपनी बात कहने लगता है, उस समय वह वाक्य श्रोताके हृदयमें प्रवेश नहीं करता है ।।
अथ यः स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानवः ।
विशङ्का जायते तस्मिन् वाक्यं तदपि दोषवत् ।। ९३ ।।
और जो मनुष्य स्वार्थ त्यागकर दूसरेके लिये कुछ कहता है, उस समय उसके प्रति श्रोताके हृदयमें आशंका उत्पन्न होती है, अतः वह वाक्य भी दोषयुक्त ही है ।। ९३ ।।
यस्तु वक्ता द्वयोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते ।
श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ।। ९४ ।।
परंतु नरेश्वर! जो वक्ता अपने और श्रोता दोनोंके लिये अनुकूल विषय ही बोलता है, वही वास्तवमें वक्ता है, दूसरा नहीं ।। ९४ ।।
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसम्पदा ।
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ।। ९५ ।।
अतः राजन्! आप स्थिरचित्त एवं एकाग्र होकर यह वाक्यसम्पत्तिसे युक्त सार्थक वचन सुनिये ।। ९५ ।।
कासि कस्य कुतश्चेति त्वयाहमभिचोदिता ।
तत्रोत्तरमिदं वाक्यं राजन्नेकमनाः शृणु ।। ९६ ।।
महाराज! आपने मुझसे पूछा था कि आप कौन हैं, किसकी हैं और कहाँसे आयी हैं? अतः इसके उत्तरमें मेरा यह कथन एकचित्त होकर सुनिये ।। ९६ ।।

यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदबिन्दवः ।
संश्लिष्टानि तथा राजन् प्राणिनामिह सम्भवः ॥ ९७ ॥
राजन्! जैसे काठके साथ लाह और धूलके साथ पानीकी बूंदें मिलकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार इस जगत्में प्राणियोंका जन्म कई तत्त्वोंके मेलसे होता है ॥

शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रियाणि च ।
पृथगात्मान आत्मानं संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ॥ ९८ ॥
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चयः ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ये आत्मासे पृथक् होनेपर भी काष्ठमें सटे हुए लाहके समान आत्माके साथ जुड़े हुए हैं; परंतु इनमें स्वतन्त्र कोई प्रेरणा-शक्ति नहीं है। यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ ९८ १/२ ॥

एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे ॥ ९९ ॥
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते ।
इनमेंसे एक-एक इन्द्रियको न तो अपना ज्ञान है और न दूसरेका। नेत्र अपने नेत्रत्वको नहीं जानता। इसी प्रकार कान भी अपने विषयमें कुछ नहीं जानता ॥ ९९ १/२ ॥

तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् ॥ १०० ॥
प्रश्लिष्टं च न जानन्ति यथाऽऽप इव पांसवः ।
इसी तरह ये इन्द्रियाँ और विषय परस्पर एक-दूसरेसे मिल-जुलकर भी नहीं जान सकते। जैसे कि जल और धूल परस्पर मिलकर भी अपने सम्मिश्रणको नहीं जानते ॥ १०० १/२ ॥

बाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु ॥ १०१ ॥
रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रयः ।
शरीरस्थ इन्द्रियाँ विषयोंका प्रत्यक्ष अनुभव करते समय अन्यान्य बाह्य गुणोंकी अपेक्षा रखती हैं। उन गुणोंको आप मुझसे सुनिये। रूप, नेत्र और प्रकाश—ये तीन किसी वस्तुको प्रत्यक्ष देखनेमें हेतु हैं ॥ १०१ १/२ ॥

यथैवात्र तथान्येषु ज्ञानज्ञयेषु हेतवः ॥ १०२ ॥
ज्ञानज्ञेयान्तरे तस्मिन् मनो नामापरो गुणः ।
विचारयति येनायं निश्चये साध्वसाधुनी ॥ १०३ ॥
जैसे प्रत्यक्ष दर्शनमें ये तीन हेतु हैं, उसी प्रकार अन्यान्य ज्ञान और ज्ञेयमें भी तीन-तीन हेतु जानने चाहिये। ज्ञान और ज्ञातव्य विषयोंके बीचमें किसी ज्ञानेन्द्रियके अतिरिक्त मन नामक एक दूसरा गुण भी रहता है, जिससे यह जीवात्मा किसी विषयमें भले-बुरेका निश्चय करनेके लिये विचार करता है ॥

द्वादशस्त्वपरस्तत्र बुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः ।
येन संशयपूर्वेषु बोद्धव्येषु व्यवस्यति ॥ १०४ ॥

वहीं एक और बारहवाँ गुण भी है, जिसका नाम है बुद्धि। जिससे किसी ज्ञातव्य विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर मनुष्य एक निश्चयपर पहुँचता है ।। १०४ ।।
अथ द्वादशके तस्मिन् सत्त्वं नामापरो गुणः ।
महासत्त्वोऽल्पसत्त्वो वा जन्तुर्येनानुमीयते ।। १०५ ।।
उस बारहवें गुण बुद्धिमें सत्त्वनामक एक (तेरहवाँ) गुण है, जिससे महासत्त्व और अल्पसत्त्व प्राणीका अनुमान किया जाता है ।। १०५ ।।
अहं कर्तेति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः ।
ममायमिति येनायं मन्यते न ममेति च ।। १०६ ।।
उस सत्त्वमें 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे अभिमानसे युक्त अहंकार नामक एक अन्य चौदहवाँ गुण है, जिससे जीवात्मा 'यह वस्तु मेरी है और यह वस्तु मेरी नहीं है' ऐसा मानता है ।। १०६ ।।
अथ पञ्चदशो राजन् गुणस्तत्रापरः स्मृतः ।
पृथक्कलासमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ।। १०७ ।।
गुणस्त्वेवापरस्तत्र संघात इव षोडशः ।
राजन्! उस अहंकारमें वासना नामक एक गुण और माना गया है, जो पंद्रहवाँ है। वहाँ पृथक्-पृथक् कलाओंके समूहकी जो समग्रता है, वह एक अन्य गुण है। वह संघातकी भाँति यहाँ सोलहवाँ कहा जाता है ।। १०७ १/२ ।।
प्रकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन् समाश्रितौ ।। १०८ ।।
जिसमें प्रकृति (माया) और व्यक्ति (प्रकाश)—ये दो गुण आश्रित हैं (यहाँतक सब अठारह हुए) ।। १०८ ।।
सुखासुखे जरामृत्यू लाभालाभौ प्रियाप्रिये ।
इति चैकोनविंशोऽयं द्वन्द्वयोग इति स्मृतः ।। १०९ ।।
सुख और दुःख, जरा और मृत्यु, लाभ और हानि तथा प्रिय और अप्रिय इत्यादि द्वन्द्वोंका जो योग है, यह उन्नीसवाँ गुण माना गया है ।। १०९ ।।
ऊर्ध्वं चैकोनविंशत्या कालो नामापरो गुणः ।
इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ।। ११० ।।
इस उन्नीसवें गुणसे परे काल नामक दूसरा गुण और है। इसे बीसवाँ गुण समझिये। इसीसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और लय होते हैं ।। ११० ।।
विंशकश्चैव संघातो महाभूतानि पञ्च च ।
सदसद्भावयोगौ तु गुणावन्यौ प्रकाशकौ ।। १११ ।।
इन बीस गुणोंका समुदाय एवं पाँच महाभूत तथा सद्भावयोग३. और असद्भावयोग३—ये दो अन्य प्रकाशक गुण, ये सब मिलकर सत्ताईस हैं ।। १११ ।।
इत्येवं विंशकश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः ।

विधिः शुक्लं बलं चेति त्रय एते गुणाः परे ।। ११२ ।।
ये जो बीस और सात गुण बताये गये हैं, इनके सिवा तीन गुण और हैं—विधि³, शुक्र४ और बल५ ।।

विंशतिर्दश चैवं हि गुणाः संख्यानतः स्मृताः ।
समग्रा यत्र वर्तते तच्छरीरमिति स्मृतम् ।। ११३ ।।
इस प्रकार गणना करनेसे बीस और दस तीस गुण होते हैं। ये सारे-के-सारे गुण जहाँ विद्यमान हैं, उसको शरीर कहा गया है ।। ११३ ।।

अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति ।
व्यक्तं चासां तथा चान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ।। ११४ ।।
कोई-कोई विद्वान् अव्यक्त प्रकृतिको इन तीस कलाओंका उपादान कारण मानते हैं। दूसरे स्थूलदर्शी विचारक व्यक्त अर्थात् परमाणुओंको कारण मानते हैं तथा कोई-कोई अव्यक्त और व्यक्तको अर्थात् प्रकृति और परमाणु—इन दोनोंको उनका उपादान कारण समझते हैं ।। ११४ ।।

अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयीमथ चतुष्टयीम् ।
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ।। ११५ ।।
अव्यक्त हो, व्यक्त हो, दोनों हों अथवा चारों (ब्रह्म, माया, जीव और अविद्या) कारण हों, अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले विद्वान् प्रकृतिको ही सम्पूर्ण भूतोंका उपादान कारण समझते हैं ।। ११५ ।।

येयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता ।
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ।। ११६ ।।
राजेन्द्र! यह जो अव्यक्त प्रकृति सबका उपादान कारण है, यही पूर्वोक्त तीस कलाओंके रूपमें व्यक्तभावको प्राप्त हुई है। मैं, आप तथा जो अन्य शरीरधारी हैं, उन सबके शरीरोंकी उत्पत्ति प्रकृतिसे ही हुई है ।। ११६ ।।

बिन्दुन्यासादयोऽवस्थाः शुक्रशोणितसम्भवाः ।
यासामेव निपातेन कललं नाम जायते ।। ११७ ।।
प्राणियोंकी वीर्यस्थापनासे लेकर रजोवीर्यसंयोग-सम्भूत कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं, जिनके सम्मिश्रणसे ही 'कलल' नामक एक पदार्थ उत्पन्न होता है ।। ११७ ।।

कललाद् बुद्बुदोत्पत्तिः पेशी च बुद्बुदात् स्मृता ।
पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः ।। ११८ ।।
कललसे बुद्बुदकी उत्पत्ति होती है। बुद्बुदसे मांसपेशीका प्रादुर्भाव माना गया है। पेशीसे विभिन्न अंगोंका निर्माण होता है और अंगोंसे रोमावलियाँ तथा नख प्रकट होते हैं ।। ११८ ।।

सम्पूर्णे नवमे मासि जन्तोर्जातस्य मैथिल । जायते नामरूपत्वं स्त्री पुमान् वेति लिङ्गतः ॥ ११९ ॥ मिथिलानरेश! गर्भमें नौ मास पूर्ण हो जानेपर जीव जन्म ग्रहण करता है। उस समय उसे नाम और रूप प्राप्त होता है तथा वह विशेष प्रकारके चिह्नसे स्त्री अथवा पुरुष समझा जाता है ॥ ११९ ॥

जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि । कौमारं रूपमापन्नं रूपतो नोपलभ्यते ॥ १२० ॥ जिस समय बालकका जन्म होता है, उस समय उसका जो रूप देखनेमें आता है, उसके नख और अंगुलियाँ ताँबेके समान लाल-लाल होती हैं, फिर जब वह कुमारावस्थाको प्राप्त होता है तो उस समय उसका पहलेका वह रूप नहीं उपलब्ध होता है ॥ १२० ॥

कौमाराद् यौवनं चापि स्थावीर्यं चापि यौवनात् । अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ॥ १२१ ॥ इसी प्रकार कुमारावस्थासे जवानीको और जवानीसे बुढ़ापेको वह प्राप्त होता है। इस क्रमसे उत्तरोत्तर अवस्थामें पहुँचनेपर पूर्व पूर्व अवस्थाका रूप नहीं देखनेमें आता है ॥

कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे । वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात् तु न विभाव्यते ॥ १२२ ॥ सभी प्राणियोंमें विभिन्न प्रयोजनकी सिद्धिके लिये जो पूर्वोक्त कलाएँ हैं, उनके स्वरूपमें प्रतिक्षण भेद या परिवर्तन हो रहा है; परंतु वह इतना सूक्ष्म है कि जान नहीं पड़ता ॥ १२२ ॥

न चैषामत्ययो राजन् लक्ष्यते प्रभवो न च । अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गतिः ॥ १२३ ॥ राजन्! प्रत्येक अवस्थामें इन कलाओंका लय और उद्भव होता रहता है, किंतु दिखायी नहीं देता है; ठीक उसी तरह जैसे दीपककी लौ क्षण-क्षणमें मिटती और उत्पन्न होती रहती है, पर दिखायी नहीं देती ॥ १२३ ॥

तस्याप्येवंप्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः । अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ॥ १२४ ॥ कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः । सम्बन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवयवैरिह ॥ १२५ ॥ जैसे दौड़ता हुआ अच्छा घोड़ा इतनी तीव्र गतिसे एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानपर पहुँच जाता है कि कुछ कहते नहीं बनता, उसी प्रकार यह प्रभावशाली लोक निरन्तर वेगपूर्वक एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें जा रहा है, अतः उसके विषयमें यह प्रश्न नहीं बन सकता कि 'कौन कहाँसे आता है और कौन कहाँसे नहीं आता है, यह किसका है? किसका