भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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त्रिंशोऽध्यायः

महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान

युधिष्ठिर उवाच

स कथं कांचनष्ठीवी सृंजयस्य सुतोऽभवत् ।
पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सृंजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया? ॥ १ ॥

यदा वर्षसहस्रायुस्तदा भवति मानवः ।
कथमप्राप्तकौमारः सृंजयस्य सुतो मृतः ॥ २ ॥
जब उस समय मनुष्यकी एक हजार वर्षकी आयु होती थी, तब सृंजयका पुत्र कुमारावस्था आनेसे पहले ही क्यों मर गया? ॥ २ ॥

उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् ।
कथं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
उस बालकका नाममात्र ही सुवर्णष्ठीवी था या उसमें वैसा ही गुण भी था। सुवर्णष्ठीवी नाम पड़नेका कारण क्या था? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर ।
नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण बोले— जनेश्वर! इस विषयमें जो बात है, वह यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये। नारद और पर्वत—ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ॥

मातुलो भागिनेयश्च देवलोकादिहागतौ ।
विहर्तुकामौ सम्प्रीत्या मानुषेषु पुरा विभो ॥ ५ ॥
ये दोनों परस्पर मामा और भानजे लगते हैं! प्रभो! पहलेकी बात है ये दोनों महर्षि मनुष्यलोकमें भ्रमण करनेके लिये प्रेमपूर्वक देवलोकसे यहाँ आये थे ॥ ५ ॥

हविःपवित्रभोज्येन देवभोज्येन चैव हि ।
नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वतः ॥ ६ ॥
वे यहाँ पवित्र हविष्य तथा देवताओंके भोजन करनेयोग्य पदार्थ खाकर रहते थे। नारदजी मामा हैं और पर्वत इनके भानजे हैं ॥ ६ ॥

तावुभौ तपसोपेताववनीतलचारिणौ ।
भुञ्जानौ मानुषान् भोगान् यथावत् पर्यधावताम् ॥ ७ ॥