महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे दोनों तपस्वी पृथवीतलपर विचरते और मानवीय भोगोंका उपभोग करते हुए यहाँ यथावत्रूपसे परिभ्रमण करने लगे ॥ ७ ॥
प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः ।
यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ॥ ८ ॥
अन्योन्यस्य स आख्येयो मृषा शापोऽन्यथा भवेत् ।
उन दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रेमपूर्वक यह शर्त कर रखी थी कि हमलोगोंके मनमें शुभ या अशुभ जो भी संकल्प प्रकट हो, उसे हम एक दूसरेसे कह दें; अन्यथा झूठे ही शापका भागी होना पड़ेगा ॥ ८ १/२ ॥
तौ तथेति प्रतिज्ञाय महर्षी लोकपूजितौ ॥ ९ ॥
सृंजयं शैत्यमभेत्य राजानमिदमूचतुः ।
वे दोनों लोकपूजित महर्षि 'तथास्तु' कहकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करनेके पश्चात् श्वेतपुत्र राजा सृंजयके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ९ १/२ ॥
आवां भवति वत्स्यावः कञ्चित् कालं हिताय ते ॥ १० ॥
यथावत् पृथिवीपाल आवयोः प्रगुणीभव ।
'भूपाल! हम दोनों तुम्हारे हितके लिये कुछ कालतक तुम्हारे पास ठहरेंगे। तुम हमारे अनुकूल होकर रहो' ॥ १० १/२ ॥
तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥ ११ ॥
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ ।
अब्रवीत् परमप्रीतः सुतेयं वरवर्णिनी ॥ १२ ॥
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यसि ।
दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता ॥ १३ ॥
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा ।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजाने उन दोनोंका सत्कारपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर एक दिन राजा सृंजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों तपस्वी महात्माओंसे कहा—'महर्षियो! यह मेरी एक ही कन्या है, जो परम सुन्दरी, दर्शनीय, निर्दोष अङ्गोंवाली तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न है। कमल-केसरके समान कान्तिवाली यह सुकुमारी कुमारी आजसे आप दोनोंकी सेवा करेगी' ॥ ११—१३ १/२ ॥
परमं सौम्यमित्युक्तं ताभ्यां राजा शशास ताम् ॥ १४ ॥
कन्ये विप्रावुपचर देववत् पितृवच्च ह ।
तब उन दोनोंने कहा—'बहुत अच्छा।' इसके बाद राजाने उस कन्याको आदेश दिया—'बेटी! तुम इन दोनों महर्षियोंकी देवता और पितरोंके समान सेवा किया करो'।
सा तु कन्या तथेत्युक्त्वा पितरं धर्मचारिणी ॥ १५ ॥
यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ।