भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 212

धर्माचरणमें तत्पर रहनेवाली उस कन्याने पितासे 'ऐसा ही होगा' यों कहकर राजाकी आज्ञाके अनुसार उन दोनोंकी सत्कारपूर्वक सेवा आरम्भ कर दी ॥ १५१/२ ॥ तस्यास्तेनोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च ॥ १६ ॥ नारदं हृच्छयस्तूर्णं सहसैवाभ्यपद्यत । उसकी उस सेवा तथा अनुपम रूप-सौन्दर्यसे नारदके हृदयमें सहसा कामभावका संचार हो गया ॥ १६१/२ ॥ ववृधे हि ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः ॥ १७ ॥ यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तौ चन्द्रमाः शनैः । उन महामनस्वी नारदके हृदयमें काम उसी प्रकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष आरम्भ होनेपर शनैः-शनैः चन्द्रमाकी वृद्धि होती है ॥ १७१/२ ॥ न च तं भागिनेयाय पर्वताय महात्मने ॥ १८ ॥ शशंस हृच्छयं तीव्रं व्रीडमानः स धर्मवित् । धर्मज्ञ नारदने लज्जावश भानजे महात्मा पर्वतको अपने बढ़े हुए दुःसह कामकी बात नहीं बतायी ॥ तपसा चेङ्गितैश्चैव पर्वतोऽथ बुबोध तम् ॥ १९ ॥ कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् । परंतु पर्वतने अपनी तपस्या और नारदजीकी चेष्टाओंसे जान लिया कि नारद कामवेदनासे पीड़ित हैं; फिर तो उन्होंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप देते हुए कहा—॥ १९१/२ ॥ कृत्वा समयमव्यग्रो भवान् वै सहितो मया ॥ २० ॥ यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः । अन्योन्यस्य स आख्येय इति तद् वै मृषा कृतम् ॥ २१ ॥ भवता वचनं ब्रह्मंस्तस्मादेष शपाम्यहम् । 'आपने मेरे साथ स्वस्थचित्तसे यह शर्त की थी कि 'हम दोनोंके हृदयमें जो भी शुभ या अशुभ संकल्प हो, उसे हम दोनों एक दूसरेसे कह दें।' परंतु ब्रह्मन्! आपने अपने उस वचनको मिथ्या कर दिया; इसलिये मैं शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ ॥ २०-२११/२ ॥ न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा ॥ २२ ॥ सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मादेष शपाम्यहम् । 'जब आपके मनमें पहले इस सुकुमारी कुमारीके प्रति कामभावका उदय हुआ तो आपने मुझे नहीं बताया; इसलिये यह मैं आपको शाप दे रहा हूँ ॥ २२१/२ ॥ ब्रह्मचारी गुरुर्यस्मात् तपस्वी ब्राह्मणश्च सन् ॥ २३ ॥ अकार्षीः समयभ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ।