महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशप्स्ये तस्मात् सुसंक्रुद्धो भवन्तं तं निबोध मे ।। २४ ।। 'आप ब्रह्मचारी, मेरे गुरुजन, तपस्वी और ब्राह्मण हैं तो भी आपने हमलोगोंमें जो शर्त हुई थी, उसे तोड़ दिया है; इसलिये मैं अत्यन्त कुपित होकर आपको जो शाप दे रहा हूँ उसे सुनिये— ।। २३-२४ ।। सुकुमारी च ते भार्या भविष्यति न संशयः । वानरं चैव ते रूपं विवाहात् प्रभृति प्रभो ।। २५ ।। संद्रेक्ष्यन्ति नराश्चान्ये स्वरूपेण विनाकृतम् । 'प्रभो! यह सुकुमारी आपकी भार्या होगी, इसमें संशय नहीं है, परंतु विवाहके बादसे ही कन्या तथा अन्य सब लोग आपका रूप (मुख) वानरके समान देखने लगेंगे। बंदर जैसा-मुँह आपके स्वरूपको छिपा देगा' ।। २५ १/२ ।। स तद् वाक्यं तु विज्ञाय नारदः पर्वतं तथा ।। २६ ।। अशपत्तमापि क्रोधाद् भागिनेयं स मातुलः । तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ।। २७ ।। युक्तोऽपि नित्यधर्मज्ञ न वै स्वर्गमवाप्स्यसि । उस बातको समझकर मामा नारदजी भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने भानजे पर्वतको शाप देते हुए कहा—'अरे! तू तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय-संयमसे युक्त एवं नित्य धर्मपरायण होनेपर भी स्वर्गलोकमें नहीं जा सकेगा' ।। २६-२७ १/२ ।। तौ तु शप्त्वा भृशं क्रुद्धौ परस्परममर्षणौ ।। २८ ।। प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ । इस प्रकार अत्यन्त कुपित हो एक दूसरेको शाप दे वे दोनों क्रोधमें भरे हुए दो हाथियोंके समान अमर्षपूर्वक प्रतिकूल दिशाओंमें चल दिये ।। २८ १/२ ।। पर्वतः पृथिवीं कृत्स्नां विचचार महामतिः ।। २९ ।। पूज्यमानो यथान्यायं तेजसा स्वेन भारत । भारत! परम बुद्धिमान् पर्वत अपने तेजसे यथोचित सम्मान पाते हुए सारी पृथ्वीपर विचरने लगे ।। २९ १/२ ।। अथ तामलभत् कन्यां नारदः सृंजयात्मजाम् ।। ३० ।। धर्मेण विप्रप्रवरः सुकुमारीमनिन्दिताम् । इधर विप्रवर नारदजीने उस अनिन्द्य सुन्दरी सृंजय-कुमारी सुकुमारीको धर्मके अनुसार पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। सा तु कन्या यथाशापं नारदं तं ददर्श ह ।। ३१ ।। पाणिग्रहणमन्त्राणां नियोगादेव नारदम् ।