भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 214

वैवाहिक मन्त्रोंका प्रयोग होते ही वह राजकन्या शापके अनुसार नारद मुनिको वानराकार मुखसे युक्त देखने लगी ॥ ३१ १/२ ॥
सुकुमारी च देवर्षिं वानरप्रतिमाननम् ॥ ३२ ॥
नैवावामन्यत तदा प्रीतिमत्येव चाभवत् ।
देवर्षिका मुँह वानरके समान देखकर भी सुकुमारीने उनकी अवहेलना नहीं की। वह उनके प्रति अपना प्रेम बढ़ाती ही गयी ॥ ३२ १/२ ॥
उपतस्थे च भर्तारं न चान्यं मनसाप्यगात् ॥ ३३ ॥
देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला ।
पतिपर स्नेह रखनेवाली सुकुमारी अपने स्वामीकी सेवामें सदा उपस्थित रहती और दूसरे किसी पुरुषका, वह यक्ष, मुनि अथवा देवता ही क्यों न हो, मनके द्वारा भी पतिरूपसे चिन्तन नहीं करती थी ॥ ३३ १/२ ॥
ततः कदाचिद् भगवान् पर्वतोऽनुचचार ह ॥ ३४ ॥
वनं विरहितं किंचित् तत्रापश्यत् स नारदम् ।
तदनन्तर किसी समय भगवान् पर्वत घूमते हुए किसी एकान्त वनमें आ गये। वहाँ उन्होंने नारदजीको देखा ॥
ततोऽभिवाद्य प्रोवाच नारदं पर्वतस्तदा ॥ ३५ ॥
भगवान् प्रसादं कुरुतात् स्वर्गदिशाय मे प्रभो ।
तब पर्वतने नारदजीको प्रणाम करके कहा—'प्रभो! आप मुझे स्वर्गमें जानेके लिये आज्ञा देनेकी कृपा करें' ॥ ३५ १/२ ॥ ॥
तमुवाच ततो दृष्ट्वा पर्वतं नारदस्तथा ॥ ३६ ॥
कृताञ्जलिमुपासीनं दीनं दीनतरः स्वयम् ।
नारदजीने देखा, पर्वत दीनभावसे हाथ जोड़कर मेरे पास खड़ा है; फिर तो वे स्वयं भी अत्यन्त दीन होकर उनसे बोले— ॥ ३६ १/२ ॥
त्वयाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि ॥ ३७ ॥
इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ।
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह ॥ ३८ ॥
तव नैतद्धि विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् ।
'वत्स! पहले तुमने मुझे यह शाप दिया था कि 'तुम वानर हो जाओ।' तुम्हारे ऐसा कहनेके बाद मैंने भी मत्सरतावश तुम्हें शाप दे दिया, जिससे आजतक तुम स्वर्गमें नहीं जा सके। यह तुम्हारे योग्य कार्य नहीं था; क्योंकि तुम मेरे पुत्रकी जगहपर हो' ॥ ३७-३८ १/२ ॥
न्यवर्तयेतां तौ शापावन्योन्येन तदा मुनी ॥ ३९ ॥
श्रीसमृद्धं तदा दृष्ट्वा नारदं देवरूपिणम् ।

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