महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2130, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो राजा महान् उत्साही और क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर होता है, वह 'कर' के रूपमें प्रजाकी आयका दसवाँ भाग लेकर संतुष्ट हो जाता है तथा उससे भिन्न साधारण भूपाल दसवें भागसे कम लेकर भी संतोष कर लेते हैं ।। १६० ।।
नास्त्यसाधारणो राजा नास्ति राज्यमराजकम् ।
राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ।। १६१ ।।
साधारण प्रजा न हो तो कोई राजा नहीं हो सकता। राजा न हो तो राज्य नहीं टिक सकता। राज्य न हो तो धर्म कैसे रह सकता है और धर्म न हो तो परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? ।। १६१ ।।
योऽप्यत्र परमो धर्मः पवित्रं राजराज्ययोः ।
पृथिवी दक्षिणा यस्य सोऽश्वमेधेन युज्यते ।। १६२ ।।
यहाँ राजा और राज्यके लिये जो परम धर्म और परम पवित्र वस्तु है, उसे सुनिये। जिसकी पृथिवी दक्षिणा-रूपमें दे दी जाती है अर्थात् जो अपनी राज्यभूमिका दान कर देता है, वह अश्वमेध यज्ञके पुण्यफलका भागी होता है ।।
साहमेतानि कर्माणि राजदुःखानि मैथिल ।
समर्था शतशो वक्तुमथवापि सहस्रशः ।। १६३ ।।
मिथिलानरेश! जो राजाको दुःख देनेवाले हैं, ऐसे सैकड़ों और हजारों कर्म मैं यहाँ बता सकती हूँ ।। १६३ ।।
स्वदेहेनाभिषङ्गो मे कुतः परपरिग्रहे ।
न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि ।। १६४ ।।
मेरी तो अपने ही शरीरमें आसक्ति नहीं है, फिर दूसरेके शरीरमें कैसे हो सकती है? इस प्रकार योगयुक्त रहनेवाली मुझ संन्यासिनीके प्रति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।। १६४ ।।
ननु नाम त्वया मोक्षः कृत्स्नः पञ्चशिखाच्छ्रुतः ।
सोपायः सोपनिषदः सोपासङ्गः सनिश्चयः ।। १६५ ।।
तस्य ते मुक्तसङ्गस्य पाशानाक्रम्य तिष्ठतः ।
छत्रादिषु विशेषेषु पुनः सङ्गः कथं नृप ।। १६६ ।।
नरेश्वर! जब आपने महर्षि पंचशिखाचार्यसे उपाय (निदिध्यासन), उपनिषद् (उसके श्रवण-मनन), उपासंग (यम-नियम आदि योगाङ्ग) और निश्चय (ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका अनुभव)—इन सबके सहित सम्पूर्ण मोक्षशास्त्रका श्रवण किया है, आप आसक्तियोंसे मुक्त हो गये हैं और सम्पूर्ण बन्धनोंको काटकर खड़े हैं, तब आपकी छत्र-चवँर आदि विशेष-विशेष वस्तुओंमें आसक्ति कैसे हो रही है? ।। १६५-१६६ ।।
श्रुतं ते न श्रुतं मन्ये मृषा वापि श्रुतं श्रुतम् ।
अथवा श्रुतसंकाशं श्रुतमन्यच्छ्रुतं त्वया ।। १६७ ।।