भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2131

मैं समझती हूँ कि आपने पंचशिखाचार्यसे शास्त्रका श्रवण करके भी श्रवण नहीं किया है अथवा उनसे यदि कोई शास्त्र सुना है तो उसे सुनकर भी मिथ्या कर दिया है; या यह भी हो सकता है कि आपने वेदशास्त्र-जैसा प्रतीत होनेवाला कोई और ही शास्त्र उनसे सुना हो ॥ १६७ ॥ अथापीमासु संज्ञासु लौकिकीषु प्रतिष्ठसे । अभिषङ्गावरोधाभ्यां बद्धस्त्वं प्राकृतो यथा ॥ १६८ ॥ इतनेपर भी यदि आप 'विदेहराज' 'मिथिलापति' आदि इन लौकिक नामोंमें ही प्रतिष्ठित हो रहे हैं तो आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति आसक्ति और अवरोधसे ही बँधे हुए हैं ॥ १६८ ॥ सत्त्वेनानुप्रवेशो हि योऽयं त्वयि कृतो मया । किं तवापकृतं तत्र यदि मुक्तोऽसि सर्वशः ॥ १६९ ॥ यदि आप सर्वथा मुक्त हैं तो मैंने जो बुद्धिके द्वारा आपके भीतर प्रवेश किया है, इसमें आपका क्या अपराध किया है? ॥ १६९ ॥ नियमो ह्येष वर्णेषु यतीनां शून्यवासिता । शून्यमावेशयन्त्या च मया किं कस्य दूषितम् ॥ १७० ॥ इन सभी वर्णोंमें यह नियम प्रसिद्ध है कि संन्यासियोंको एकान्त स्थानमें रहना चाहिये। मैंने भी आपके शून्य शरीरमें निवास करके किसकी किस वस्तुको दूषित कर दिया है? ॥ १७० ॥ न पाणिभ्यां न बाहुभ्यां पादोरुभ्यां न चानघ । न गात्रावयवैरन्यैः स्पृशामि त्वां नराधिप ॥ १७१ ॥ निष्पाप नरेश! न तो हाथोंसे, न भुजाओंसे, न पैरोंसे, न जाँघोंसे और न शरीरके दूसरे ही अवयवोंसे मैं आपका स्पर्श कर रही हूँ ॥ १७१ ॥ कुले महति जातेन ह्रीमता दीर्घदर्शिना । नैतत्सदसि वक्तव्यं सद्वाऽसद्वा मिथः कृतम् ॥ १७२ ॥ आप महान् कुलमें उत्पन्न, लज्जाशील तथा दीर्घदर्शी पुरुष हैं। हम दोनोंने परस्पर भला या बुरा जो कुछ भी किया है, उसे आपको इस भरी सभामें नहीं कहना चाहिये ॥ १७२ ॥ ब्राह्मणा गुरवश्चेमे तथा मान्या गुरूत्तमाः । त्वं चाथ गुरुरप्येषामेवमन्योन्यगौरवम् ॥ १७३ ॥ यहाँ ये सभी वर्णोंके गुरु ब्राह्मण विद्यमान हैं। इन गुरुओंकी अपेक्षा भी उत्तम कितने ही माननीय महापुरुष यहाँ बैठे हैं तथा आप भी राजा होनेके कारण इन सबके लिये गुरुस्वरूप हैं। इस प्रकार आप सबका गौरव एक दूसरेपर अवलम्बित है ॥ १७३ ॥ तदेवमनुसंदृश्य वाच्यावाच्यं परीक्षता ।