महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2133, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहाथमें कुंडी है, कुंडीमें दूध है और दूधमें मक्खी पड़ी हुई है। ये तीनों परस्पर पृथक् होते हुए भी आधाराधेय-भाव सम्बन्धसे एक दूसरेके आश्रित हो एक साथ हो गये हैं॥ १८०॥
न तु कुण्डे पयोभावः पयश्चापि न मक्षिका। स्वयमेवाप्नुवन्त्येते भावा ननु पराश्रयम्॥ १८१॥ फिर भी कुंडीमें दुग्धत्व नहीं आया है और दूध भी मक्खी नहीं बन गया है। ये सारे आधेय पदार्थ स्वयं ही अपनेसे भिन्न आधारको प्राप्त होते हैं॥ १८१॥
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च। परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकरः॥ १८२॥ सारे आश्रम पृथक्-पृथक् हैं तथा चारों वर्ण भी भिन्न हैं। जब इनमें परस्पर पार्थक्य बना हुआ है, तब पृथक्त्वको जाननेवाले आपके वर्णका संकर कैसे हो सकता है?॥ १८२॥
नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा। तव राजन् सवर्णास्मि शुद्धयोनिरविप्लुता॥ १८३॥ राजन्! मैं जातिसे ब्राह्मणी नहीं हूँ और न वैश्या अथवा शूद्रा ही हूँ। मैं तो आपके समान वर्णवाली क्षत्रिया ही हूँ। मेरा जन्म शुद्ध वंशमें हुआ है और मैंने अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया है॥ १८३॥
प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः। कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम्॥ १८४॥ आपने प्रधान नामक राजर्षिका नाम अवश्य सुना होगा। मैं उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि मेरा नाम सुलभा है॥ १८४॥
द्रोणश्च शतशृङ्गश्च चक्रद्वारश्च पर्वतः। मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह॥ १८५॥ मेरे पूर्वजोंके यज्ञोंमें देवराज इन्द्रके सहयोगसे द्रोण, शतशृंग और चक्रद्वार नामक पर्वत यज्ञवेदीमें ईंटोंकी जगह चुने गये थे॥ १८५॥
साहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे। विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम्॥ १८६॥ मेरा जन्म उसी महान् कुलमें हुआ है। मैंने अपने योग्य पतिके न मिलनेपर मोक्षधर्मकी शिक्षा ली तथा मुनिव्रत धारण करके मैं अकेली विचरती रहती हूँ॥
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वापहारिणी। न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता॥ १८७॥ मैंने संन्यासिनीका छद्मवेष नहीं धारण किया है। मैं पराये धनका अपहरण नहीं करती हूँ और न धर्मसंकरता ही फैलाती हूँ। मैं दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हुई अपने