महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्ममें स्थित रहती हूँ ॥ १८७ ॥ नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी । नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥ १८८ ॥ जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञासे कभी विचलित नहीं होती हूँ। बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलती हूँ और आपके पास भी यहाँ खूब सोच-विचारकर ही आयी हूँ ॥ १८८ ॥ मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाहं कुशलैषिणी । तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥ १८९ ॥ मैंने सुना था कि आपकी बुद्धि मोक्षधर्ममें लगी हुई है, अतः आपकी मंगलाकांक्षिणी होकर आपके इस मोक्षज्ञानका मर्म जाननेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ ॥ १८९ ॥ न वर्गस्था ब्रवीम्येतत् स्वपक्षपरपक्षयोः । मुक्तो व्यायच्छते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्यति ॥ १९० ॥ मैं स्वपक्ष और परपक्षमेंसे अपने पक्षमें स्थित हो पक्षपातपूर्वक यह बात नहीं कह रही हूँ, आपके हितको दृष्टिमें रखकर बोलती हूँ; क्योंकि जो वाणीका व्यायाम नहीं करता और जो शान्त परब्रह्ममें निमग्न रहता है, वही मुक्त है ॥ १९० ॥ यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् । तथाहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥ १९१ ॥ जैसे नगरके किसी सूने घरमें संन्यासी एक रात निवास कर लेता है, इसी तरह आपके इस शरीरमें मैं आजकी रात रहूँगी ॥ १९१ ॥ साहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता । सुप्ता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥ १९२ ॥ आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया। अपनी वाणीरूप आतिथ्यके द्वारा मेरा भलीभाँति सत्कार किया। मिथिलानरेश! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके शरीररूपी सुन्दर गृहमें सोकर कल सबेरे यहाँसे चली जाऊँगी ॥ १९२ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च । श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ॥ १९३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! सुलभाके ये युक्तियुक्त और सार्थक वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद और कोई बात नहीं बोले ॥ १९३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सुलभाजनकसंवादे विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सुलभा और जनकका संवादविषयक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥