भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2141, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2141

बलगृध्रकुलपक्षिणां च संघाः । नरकदने रुधिरपा गुरुवचन- नुदमुपरतं विशसन्ति ॥ २९ ॥ परंतु जो गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं, उनके मरणके पश्चात् नरकमें स्थित भयानक शरीरवाले कुत्ते, लौहमुख पक्षी, कौए-गीध आदि पक्षियोंके समुदाय तथा रक्त पीनेवाले कीट उनके यातना-शरीरपर आक्रमण करके उसे नोचते और काटते हैं ॥ २९ ॥

मर्यादा नियताः स्वयम्भुवा य इहेमाः प्रभिनत्ति दशगुणा मनोऽनुगत्वात् । निवसति भृशमसुखं पितृविषय- विपिनमवगाह्य स पापः ॥ ३० ॥ जो मनुष्य मनचाही करनेके कारण स्वायम्भुवमनुकी बाँधी हुई धर्मकी दस* प्रकारकी मर्यादाओंको तोड़ता है, वह पापात्मा पितृलोकके असिपत्रवनमें जाकर वहाँ अत्यन्त दुःख भोगता रहता है ॥ ३० ॥

यो लुब्धः सुभृशं प्रयानृतश्च मनुष्यः सततनिकृतिवञ्चनाभिरतिः स्यात् । उपनिधिभिरसुखकृत्स परमनिरयगो भृशमसुखमनुभवति दुष्कृतकर्मा ॥ ३१ ॥ जो पुरुष अत्यन्त लोभी, असत्यसे प्रेम करनेवाला और सर्वदा कपटभरी बातें बनानेवाला और ठगाईमें रत है तथा जो तरह-तरहके साधनोंसे दूसरोंको दुःख देता है, वह पापात्मा घोर नरकमें पड़कर अत्यन्त दुःख भोगता है ॥ ३१ ॥

उष्णां वैतरणीं महानदी- मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः । परशुवनशयो निपतितो वसति च महानिरये भृशार्तः ॥ ३२ ॥ उसे अत्यन्त उष्ण महानदी वैतरणीमें गोता लगाना पड़ता है। असिपत्रवनमें उसका अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो जाता है और परशुवनमें उसे शयन करना पड़ता है। इस प्रकार महानरकमें पड़कर वह अत्यन्त आतुर हो उठता है और विवश होकर उसीमें निवास करता है ॥ ३२ ॥

महापदानि कत्थसे न चाप्यवेक्षसे परम् । चिरस्य मृत्युकारिकामनागतां न बुध्यसे ॥ ३३ ॥

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