भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2142, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2142

तुम ब्रह्मलोक आदि बड़े-बड़े स्थानोंकी बातें तो बनाते हो, परंतु परमपदपर तुम्हारी दृष्टि नहीं है। भविष्यमें जो मृत्युकी परिचारिका वृद्धावस्था आनेवाली है, उसका तुम्हें पता ही नहीं है ।। ३३ ।। प्रयायतां किमास्यते समुत्थितं महत् भयम् । अतिप्रमाथि दारुणं सुखस्य संविधीयताम् ।। ३४ ।। वत्स! चुपचाप क्यों बैठे हो? जल्दीसे आगे बढ़ो। तुम्हारे ऊपर हृदयको अत्यन्त मथ डालनेवाला, भयंकर एवं महान् भय उठ खड़ा हुआ है; अतः परमानन्दकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करो ।। ३४ ।। पुरा मृतः प्रणीयते यमस्य राजशासनात् । त्वमन्तकाय दारुणैः प्रयत्नमार्जवे कुरु ।। ३५ ।। तुम्हें मरनेपर यमराजकी आज्ञासे भयानक यमदूतोंद्वारा उनके सामने उपस्थित किया जाय, इसके पहले ही सरलतारूप धर्मके सम्पादनके लिये प्रयत्न करो ।। ३५ ।। पुरा समूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यदुःखवित् । तवेह जीवितं यमो न चास्ति तस्य वारकः ।। ३६ ।। यमराज सबके स्वामी हैं। वे किसीका दुःख-दर्द नहीं समझते हैं। वे मूल और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारे प्राण हर लेंगे। उन्हें रोकनेवाला कोई नहीं है। वह समय आनेके पहले ही तुम अपनी रक्षाके लिये प्रबन्ध कर लो ।। ३६ ।। पुराऽभिवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः । पुरैक एव नीयसे कुरुष्व साम्परायिकम् ।। ३७ ।। जिस समय यमराजके आगे-आगे चलनेवाला प्रचण्ड कालरूपी पवन चल पड़ेगा, उस समय वह अकेले तुम्हींको वहाँ ले जायगा; अतः तुम पहलेसे ही परलोकमें सुख देनेवाले धर्मका आचरण करो ।। ३७ ।। पुरा स हि क्व एव ते प्रवाति मारुतोऽन्तकः । पुरा च विभ्रमन्ति ते दिशो महाभयागमे ।। ३८ ।। पूर्वजन्ममें तुम्हारे सामने जो प्राणनाशक पवन चल रहा था, आज वह कहाँ है? अब भी जब मृत्युरूप महान् भय उपस्थित होगा, तब तुम्हें सम्पूर्ण दिशाएँ घूमती दिखायी देंगी; अतः पहलेसे ही सावधान हो जाओ ।। ३८ ।। श्रुतिश्च संनिरुध्यते पुरा तवेह पुत्रक । समाकुलस्य गच्छतः समाधिमुत्तमं कुरु ।। ३९ ।। बेटा! जब तुम इस शरीरको छोड़कर चलने लगोगे, उस समय व्याकुलताके कारण तुम्हारी श्रवणशक्ति भी नष्ट हो जायगी। इसलिये तुम सुदृढ़ समाधि प्राप्त कर लो ।। ३९ ।।