महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2143, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुभाशुभे पुरा कृते प्रमादकर्मविप्लुते । स्मरन् पुरा न तप्यसे निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४० ॥ तुम पहले असावधानतावश जो अनुचितरूपसे शुभाशुभ कर्म कर चुके हो, उसे स्मरण करके उनके फलभोगसे संतप्त होनेके पहले ही अपने लिये केवल ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४० ॥
पुरा जरा कलेवरं विजर्जरीकरोति ते । बलाङ्गरूपहारिणी निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४१ ॥ देखो, बल, अंग और रूपका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था एक दिन तुम्हारे शरीरको जर्जर कर डालेगी, उसके पहले ही तुम अपने लिये ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४१ ॥
पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसारथिः । प्रसह्य जीवितक्षये तपो महत् समाचर ॥ ४२ ॥ रोग जिसका सारथि है, वह काल हठात् तुम्हारे शरीरको विदीर्ण कर डालेगा, इसलिये इस जीवनका नाश होनेसे पूर्व ही तुम महान् तपका अनुष्ठान कर लो ॥ ४२ ॥
पुरा वृका भयंकरा मनुष्यदेहगोचराः । अभिद्रवन्ति सर्वतो यतस्व पुण्यशीलने ॥ ४३ ॥ इस मानव-शरीरमें रहनेवाले काम-क्रोध आदि भयंकर व्याघ्र तुमपर चारों ओरसे आक्रमण कर रहे हैं, इसलिये पहलेसे ही तुम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥
पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसि त्वरस्व वै । पुरा हिरण्मयान् नगान् निरीक्षसेऽद्रिमूर्धनि ॥ ४४ ॥ मरनेके समय तुम्हें पहले घोर अन्धकार दिखलायी देगा। फिर पर्वतके शिखरपर सुनहरे वृक्ष दृष्टिगोचर होंगे। वह समय आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र प्रयत्न करो ॥ ४४ ॥
पुरा कुसङ्गतानि ते सुहृन्मुखाश्च शत्रवः । विचालयन्ति दर्शनाद् घटस्व पुत्र यत्परम् ॥ ४५ ॥ इस संसारमें दुष्ट पुरुषोंके संग तथा ऊपरसे मित्रभाव एवं भीतरसे शत्रुता रखनेवाले लोग दर्शनमात्रसे तुम्हें कर्तव्यपथसे विचलित कर देंगे, इसलिये तुम पहलेसे ही परम उत्तम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥
धनस्य यस्य राजतो भयं न चास्ति चोरतः । मृतं च यन्न मुञ्चति समर्जयस्व तद् धनम् ॥ ४६ ॥