महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, वे ही बुद्धिमान् हैं। जो इन सब बातोंको सोच-विचारकर धर्मको बढ़ाता रहता है, वह विद्वान् है। जो धर्मसे गिर जाता है, वही मोहग्रस्त अथवा मूढ़ है ॥ प्रयुक्तयोः कर्मपथि स्वकर्मणोः फलं प्रयोक्ता लभते यथाकृतम् । निहीनकर्मा निरयं प्रपद्यते त्रिविष्टपं गच्छति धर्मपारगः ॥ ७९ ॥ कर्मके मार्गपर प्रयोग (आचरण) में लाये गये जो अपने शुभाशुभ कर्म हैं, उनका फल कर्ताको उस कर्मके अनुसार प्राप्त होता है। नीच कर्म करनेवाला नरकमें पड़ता है और धर्माचरणमें पारङ्गत पुरुष स्वर्गलोकको जाता है ॥ ७९ ॥ सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् । तथाऽऽत्मानं समादध्याद् भ्रश्यते न पुनर्यथा ॥ ८० ॥ यह दुर्लभ मानव-शरीर स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीके समान है। इसे पाकर अपने-आपको इस प्रकार धर्ममें एकाग्र करे, जिससे फिर उसे स्वर्गसे नीचे न गिरना पड़े ॥ ८० ॥ यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी । तमाहुः पुण्यकर्माणमशोच्यं पुत्रबान्धवैः ॥ ८१ ॥ स्वर्गलोकके मार्गका अनुसरण करनेवाली जिसकी बुद्धि धर्मका कभी उल्लंघन नहीं करती, उसको पुण्यात्मा कहते हैं। वह पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके लिये कदापि शोचनीय नहीं है ॥ ८१ ॥ यस्य नोपहता बुद्धिर्निश्चये ह्यवलम्बते । स्वर्गे कृतावकाशस्य नास्ति तस्य महद् भयम् ॥ ८२ ॥ जिसकी बुद्धि दूषित न होकर दृढ़ निश्चयका सहारा लेती है, उसने स्वर्गमें अपने लिये स्थान बना लिया है। उसे नरकका महान् भय नहीं प्राप्त होता ॥ ८२ ॥ तपोवनेषु ये जातास्तत्रैव निधनं गताः । तेषामल्पतरो धर्मः कामभोगानजानताम् ॥ ८३ ॥ जो लोग तपोवनोंमें पैदा हुए और वहीं मृत्युको प्राप्त हो गये, उन्हें थोड़े-से ही धर्मकी प्राप्ति होती है; क्योंकि वे काम-भोगोंको जानते ही नहीं थे (अतः उन्हें त्यागनेके लिये उनको कष्ट सहन नहीं करना पड़ता) ॥ यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् । न तेन किंचिन्न प्राप्तं तन्मे बहु मतं फलम् ॥ ८४ ॥ जो भोगोंका परित्याग करके तपोवनमें जाकर शरीरसे तपस्या करता है, उसके लिये कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो प्राप्त न हो। वही फल मुझे अधिक जान