महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2150, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपड़ता है ।। ८४ ।।
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
अनागतान्यतीतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ।। ८५ ।।
हजारों माता-पिता और सैकड़ों स्त्री-पुत्र पहले जन्मोंमें हो चुके हैं और भविष्यमें होंगे। वे हममेंसे किसके हैं और हम उनमेंसे किसके हैं? ।। ८५ ।।
अहमेको न मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् ।
न तं पश्यामि यस्याहं तन्न पश्यामि यो मम ।। ८६ ।।
मैं अकेला हूँ। न तो दूसरा कोई मेरा है और न मैं दूसरे किसीका हूँ। मैं ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जिसका मैं होऊँ तथा ऐसा भी कोई नहीं दिखायी देता, जो मेरा हो ।। ८६ ।।
न तेषां भवता कार्यं न कार्यं तव तैरपि ।
स्वकृतैस्तानि यातानि भवांश्चैव गमिष्यति ।। ८७ ।।
न उनका तुम कुछ कर सकते हो और न वे तुम्हारे किसी काम आ सकते हैं। वे अपने कर्मोंके साथ चले गये और तुम भी चले जाओगे ।। ८७ ।।
इह लोके हि धनिनां स्वजनः स्वजनायते ।
स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामपि नश्यति ।। ८८ ।।
इस संसारमें जो धनवान् हैं, उन्हींके स्वजन उनके साथ स्वजनोचित बर्ताव करते हैं; दरिद्रोंके स्वजन तो उनके जीते-जी ही उन्हें छोड़कर उनकी आँखसे ओझल हो जाते हैं ।। ८८ ।।
संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः ।
ततः क्लेशमवाप्नोति परत्रेह तथैव च ।। ८९ ।।
मनुष्य अपनी स्त्रीके लिये अशुभ कर्मका संचय करता है, फिर उसके फलस्वरूपमें इहलोक और परलोकमें भी कष्ट उठाता है ।। ८९ ।।
पश्यति च्छिन्नभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा ।
तत् कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत् समुदाहृतम् ।। ९० ।।
मनुष्य अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही इस जीव-जगत्को छिन्न-भिन्न हुआ देखता है, अतः बेटा! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब काममें लाओ ।। ९० ।।
तदेतत् सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रपश्यतः ।
शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ।। ९१ ।।
इहलोक कर्मभूमि है—ऐसा समझकर इसकी ओर देखते हुए दिव्य लोकोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शुभ कर्मोंका ही आचरण करना चाहिये ।। ९१ ।।
मासर्तुसंज्ञापरिवर्तकेण