महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिन्हें देवपूजा और अतिथि-सत्कार प्रिय है, जो उदार हैं तथा श्रेष्ठ पुरुष जिन्हें अच्छे लगते हैं, वे पुण्यात्मा मनुष्य अपने दाहिने हाथके समान मंगलकारी एवं मनको वशमें रखनेवाले योगियोंको ही प्राप्त होने योग्य मार्गपर आरूढ़ होते हैं ।। ६ ।। पुलाका इव धान्येषु पुत्यण्डा इव पक्षिषु । तद्विधास्ते मनुष्येषु येषां धर्मो न कारणम् ।। ७ ।। जिनका उद्देश्य धर्मपालन नहीं है, ऐसे मनुष्य मानव-समाजके भीतर वैसे ही समझे जाते हैं, जैसे धानोंमें थोथा धान और पक्षियोंमें सड़ा हुआ अंडा ।। ७ ।। सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति । शेते सह शयानेन येन येन यथा कृतम् ।। ८ ।। उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति । करोति कुर्वतः कर्म छायेवानुविधीयते ।। ९ ।। जिस-जिस मनुष्यने जैसा कर्म किया है, वह उसके पीछे लगा रहता है। यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजीके साथ उसके पीछे जाता है। जब वह सोता है, तब उसका कर्मफल भी उसीके साथ सो जाता है। जब वह खड़ा होता है, तब वह भी उसके पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है, तब वह भी उसके पीछे-पीछे चलने लगता है। इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म-संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता। सदा छायाके समान पीछे लगा रहता है ।। ८-९ ।। येन येन यथा यद् यत्पुरा कर्म सुनिश्चितम् । तत् तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ।। १० ।। जिस-जिस मनुष्यने अपने-अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे-जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ।। १० ।। स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् । भूतग्राममिमं कालः समन्तादपकर्षति ।। ११ ।। अपने-अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, वह शास्त्रविधानके अनुसार सुरक्षित रहता है। उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस प्राणिसमुदायको कर्मानुसार खींच ले जाता है ।। ११ ।। अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च । स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ।। १२ ।। जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते हैं ।। १२ ।। सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ । प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पदे पदे ।। १३ ।।